श्री हनुमान जी की आरती और चालीसा अर्थ सहित पढ़ें। जानें प्रमुख मंत्र, लाभ और हनुमान जी की कृपा पाने का सरल तरीका।
भगवान हनुमान जी का संक्षिप्त परिचय
भगवान हनुमान को हिंदू धर्म में बल, बुद्धि, विद्या और निस्वार्थ भक्ति का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। वे भगवान राम के परम भक्त और सेवक हैं। शास्त्रों के अनुसार, हनुमान जी भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार हैं। उनके पिता का नाम वानरराज केसरी और माता का नाम अंजनी है, इसलिए उन्हें ‘केसरी नंदन’ और ‘आंजनेय’ भी कहा जाता है। वायु देव के आशीर्वाद से उत्पन्न होने के कारण वे ‘पवनपुत्र’ कहलाते हैं।
हनुमान जी अष्ट चिरंजीवियों (अमर अमरत्व प्राप्त) में से एक हैं, जिसका अर्थ है कि वे आज भी पृथ्वी पर सदेह उपस्थित माने जाते हैं। उन्हें ‘संकट मोचन’ भी कहा जाता है क्योंकि वे अपने भक्तों के सभी दुखों और संकटों को दूर करते हैं। भगवान हनुमान जी के जन्मोत्सव (हनुमान जयंती) चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है और उन्हें अष्ट सिद्धि (आठ सिद्धियाँ) और नव निधि (नौ निधियाँ) का दाता माना जाता है।
श्री हनुमान जी की आरती
आरती कीजै हनुमान लला की।
दुष्टदलन रघुनाथ कला की॥
जाके बल से गिरिवर कांपै।
रोग दोष जाके निकट न झांकै॥
अंजनिपुत्र महा बलदाई।
के प्रभु सदा सहाई॥
आरती कीजै हनुमान लला की…
दे बीरा रघुनाथ पठाये।
लंका जारि सिया सुधि लाये॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई।
जात पवनसुत बार न लाई॥
आरती कीजै हनुमान लला की…
लंका जारि असुर संहारे।
सियारामजी के काज संवारे॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।
आनि संजीवन प्रान उबारे॥
आरती कीजै हनुमान लला की…
पैठि पाताल तोरि जमकारे।
अहिरावन की भुजा उखारे॥
बाएं भुजा असुर दल मारे।
दाहिने भुजा संतजन तारे॥
आरती कीजै हनुमान लला की…
सुर नर मुनिजन आरती उतारें।
जय जय जय हनुमान उचारें॥
कंचन थार कपूर लौ छाई।
आरती करत अंजना माई॥
आरती कीजै हनुमान लला की…
जो हनुमान जी की आरती गावै।
बसि बैकुण्ठ परम पद पावै॥
तुलसीदास स्वामी कीर्ति गावैं।
हरि हर शिव मुनि ध्यान लगावैं॥
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
हनुमान आरती के लाभ: हनुमान जी की आरती करने से मन का डर खत्म होता है और भूत-प्रेत या नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है। नियमित आरती और ध्यान से शारीरिक कष्ट और बीमारियां दूर होती हैं (नासै रोग हरै सब पीरा)। आरती व्यक्ति के भीतर असीम साहस, ऊर्जा और कठिन परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता पैदा करती है। जीवन में अचानक आने वाली विपत्तियों से हनुमान जी ढाल बनकर रक्षा करते हैं।
श्री हनुमान चालीसा (अर्थ सहित)
हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 40 चौपाइयों का एक अत्यंत शक्तिशाली पाठ है।
॥ दोहा ॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
॥ चौपाई ॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बंदन॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचंद्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै॥
अन्तकाल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥
॥ दोहा ॥
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
हनुमान चालीसा का अर्थ:
प्रारंभिक दोहा:
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
दोहे का अर्थ: मैं अपने गुरु के चरण कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को साफ करके भगवान राम के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चार फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) देने वाला है। हे पवनपुत्र! मैं स्वयं को बुद्धिहीन जानकर आपका स्मरण करता हूँ। मुझे शारीरिक बल, मानसिक बुद्धि और ज्ञान दीजिए और मेरे सभी दुखों और दोषों को दूर कीजिए।
चालीसा का विस्तृत भावार्थ (संपूर्ण 40 चौपाइयों का सार):
- गुण और प्रताप: हनुमान जी ज्ञान और गुणों के सागर हैं। वे तीनों लोकों में अपनी कीर्ति के लिए जाने जाते हैं। वे राम के दूत हैं और उनके समान कोई दूसरा बलवान नहीं है।
- शारीरिक स्वरूप: उनका शरीर वज्र के समान कठोर (बजरंगबली) और स्वर्ण के समान चमकीला है। उनके कानों में कुंडल हैं, हाथ में वज्र और ध्वजा है, और कंधे पर मूंज का जनेऊ है।
- राम काज के प्रति समर्पण: वे हमेशा भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के हृदय में वास करते हैं। भगवान राम के कार्यों को करने के लिए वे हमेशा आतुर रहते हैं। उन्होंने सूक्ष्म रूप धारण करके सीता जी को दर्शन दिए और भयंकर रूप धरकर लंका जलाई और राक्षसों का संहार किया।
- संजीवनी बूटी और राम का प्रेम: जब लक्ष्मण जी मूर्छित हुए, तो हनुमान जी संजीवनी बूटी लाकर उनके प्राण बचाते हैं। इससे प्रसन्न होकर भगवान राम उन्हें भरत के समान अपना प्रिय भाई मानते हैं और कहते हैं कि हनुमान का उपकार वे कभी नहीं भूल सकते।
- अष्ट सिद्धि और नव निधि: माता सीता ने उन्हें यह वरदान दिया है कि वे किसी को भी आठों सिद्धियां (अणिमा, महिमा आदि) और नौ निधियां (सभी प्रकार की संपत्ति) प्रदान कर सकते हैं।
- भक्तों की रक्षा (फलश्रुति): जो व्यक्ति हनुमान जी का नाम जपता है, उसके सभी रोग और कष्ट दूर हो जाते हैं। जो कोई भी मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, वे उसे हर संकट से बचाते हैं। अंत में तुलसीदास जी कहते हैं कि जो भी इस चालीसा का सौ बार पाठ करेगा, वह सभी बंधनों से मुक्त होकर परम सुख को प्राप्त करेगा।
अंतिम दोहा:
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
अर्थ: हे संकटों को हरने वाले पवनपुत्र! आपका स्वरूप अत्यंत मंगलकारी है। हे देवताओं के राजा! आप भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ हमेशा मेरे हृदय में निवास करें।
भगवान हनुमान के प्रमुख मंत्र और उनके अर्थ
हनुमान मूल मंत्र (कार्य सिद्धि और सफलता के लिए)
ॐ हनुमते नमः॥
अर्थ: मैं भगवान हनुमान जी को नमन करता हूँ। (यह अत्यंत सरल मंत्र है जो मन को एकाग्र करने और हनुमान जी की कृपा पाने के लिए जपा जाता है।)
संकट मोचन मंत्र (कठोर बाधाओं और भय को दूर करने के लिए)
ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्॥
अर्थ: मैं रुद्रावतार (शिव के अंश) भगवान हनुमान का ध्यान करता हूँ। हे प्रभु, मेरी सभी बाधाओं और शत्रुओं (नकारात्मक विचारों) को नष्ट कर दें।
हनुमान गायत्री मंत्र (साहस, बल और बुद्धि के लिए)
ॐ आञ्जनेयाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि। तन्नो हनुमत् प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम माता अंजनी के पुत्र को जानते हैं, हम वायु के पुत्र (हनुमान) का ध्यान करते हैं। हे भगवान हनुमान, कृपया हमारी बुद्धि को जागृत करें और हमें सही मार्ग पर प्रेरित करें।
मनोजवम् मंत्र (मानसिक शांति और चंचलता दूर करने के लिए)
मनोजवम् मारुततुल्यवेगम् जितेन्द्रियम् बुद्धिमताम् वरिष्ठम्।
वातात्मजम् वानरयूथमुख्यम् श्रीरामदूतम् शरणम् प्रपद्ये॥
अर्थ: जिनकी गति मन (सोच) और वायु के समान तेज है, जिन्होंने अपनी सभी इंद्रियों को जीत लिया है (जितेन्द्रिय), जो सभी बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, जो वायु देव के पुत्र हैं और वानरों की सेना के सेनापति हैं, ऐसे भगवान श्री राम के दूत हनुमान जी की मैं शरण लेता हूँ।
|| जय हनुमान ||
