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माँ दुर्गा जी की आरती और चालीसा अर्थ सहित पढ़ें। जानें प्रमुख मंत्र, लाभ और दुर्गा जी की कृपा पाने का सरल तरीका। सम्पूर्ण जानकारी एक ही स्थान पर।

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माता दुर्गा जी का संक्षिप्त परिचय

माता दुर्गा हिंदू धर्म में शक्ति (आदिशक्ति) और स्त्री ऊर्जा का सर्वोच्च प्रतीक हैं। संस्कृत में ‘दुर्गा’ शब्द का अर्थ है “वह जिसे हराना या पार पाना अजेय हो” या “जो दुखों और संकटों को दूर करती है।”

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब महिषासुर नामक राक्षस का अत्याचार बहुत बढ़ गया था और उसे वरदान था कि कोई भी देवता या पुरुष उसे नहीं मार सकता, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) सहित सभी देवताओं ने अपने तेज (ऊर्जा) को मिलाकर माता दुर्गा की रचना की। देवताओं ने उन्हें अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र (जैसे त्रिशूल, सुदर्शन चक्र, शंख, बाण आदि) प्रदान किए।

माता दुर्गा शेर (या बाघ) की सवारी करती हैं, जो शक्ति, साहस और जानवरों की प्रवृत्तियों (अहंकार और क्रोध) पर नियंत्रण का प्रतीक है। उनके आठ या दस हाथ दर्शाए जाते हैं, जो सभी दिशाओं से अपने भक्तों की रक्षा करने का प्रतीक हैं। वे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक हैं। नवरात्रि का नौ दिनों का पावन पर्व मुख्य रूप से माता दुर्गा और उनके नौ रूपों (नवदुर्गा) को समर्पित होता है।

श्री दुर्गा माता की आरती

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।

तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ 

जय अम्बे गौरी…

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।

उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रबदन नीको॥ 

जय अम्बे गौरी…

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।

रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥ 

जय अम्बे गौरी…

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।

सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥ 

जय अम्बे गौरी…

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।

कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥ 

जय अम्बे गौरी…

शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।

धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥ 

जय अम्बे गौरी…

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।

मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥ 

जय अम्बे गौरी…

ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमलारानी।

आग-निगम-बखानी, तुम शिव पटरानी॥ 

जय अम्बे गौरी…

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरू।

बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ 

जय अम्बे गौरी…

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भर्ता।

भक्तन की दुख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥ 

जय अम्बे गौरी…

भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी।

मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ 

जय अम्बे गौरी…

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।

       श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥ 

जय अम्बे गौरी…

श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावै।

कहत शिवानन्द स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावै॥

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।


 दुर्गा आरती के लाभ:

आरती के गायन से घर में सकारात्मक और पवित्र ऊर्जा का संचार होता है। माता दुर्गा की आरती व्यक्ति के भीतर के डर को खत्म करती है और बाहरी व भीतरी शत्रुओं (क्रोध, लोभ, मोह) पर विजय दिलाती है। नियमित रूप से माता की आरती करने से घर-परिवार में सुख, शांति और अखंड समृद्धि का वास होता है। माता अपने भक्तों के जीवन में आने वाले अप्रत्याशित संकटों को हर लेती हैं।


श्री दुर्गा चालीसा (अर्थ सहित)

दुर्गा चालीसा 40 चौपाइयों का एक परम सिद्ध स्तोत्र है, जिसमें माता दुर्गा की महिमा, शक्ति और उनके द्वारा किए गए राक्षसों के संहार का वर्णन है।

नमो नमो दुर्गे सुख करनी।

नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी।

तिहूं लोक फैली उजियारी॥

शशि ललाट मुख महाविशाला।

नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥

रूप मातु को अधिक सुहावे।

दरश करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लै कीना।

पालन हेतु अन्न धन दीना॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला।

तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी।

तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।

ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा।

दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।

परगट भई फाड़कर खम्बा॥

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।

हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।

श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा।

दयासिन्धु दीजै मन आसा॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।

महिमा अमित न जात बखानी॥

मातंगी अरु धूमावति माता।

भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी।

छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी।

लांगुर वीर चलत अगवानी॥

कर में खप्पर खड्ग विराजै।

जाको देख काल डर भाजै॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला।

जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

नगरकोट में तुम्हीं विराजत।

तिहुंलोक में डंका बाजत॥

शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे।

रक्तबीज शंखन संहारे॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी।

जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

रूप कराल कालिका धारा।

सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

परी गाढ़ संतन पर जब जब।

भई सहाय मातु तुम तब तब॥

अमरपुरी अरु बासव लोका।

तब महिमा सब रहें अशोका॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।

तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावें।

दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।

जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।

योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

शंकर आचारज तप कीनो।

काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।

काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

शक्ति रूप का मरम न पायो।

शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी।

जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।

दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो।

तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥

आशा तृष्णा निपट सतावें।

रिपू मुरख मौही डरपावे॥

शत्रु नाश कीजै महारानी।

सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥

करो कृपा हे मातु दयाला।

ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला।

जब लगि जिऊं दया फल पाऊं

तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं ॥

दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।

सब सुख भोग परमपद पावै॥

देवीदास शरण निज जानी।

करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

|| समाप्त ||


श्री दुर्गा चालीसा का अर्थ:

चालीसा का विस्तृत भावार्थ (संपूर्ण 40 चौपाइयों का सार):

  1. स्तुति और महिमा: हे सुख प्रदान करने वाली माता दुर्गा, आपको नमस्कार है। हे दुखों को हरने वाली माता अम्बे, आपको नमस्कार है। आपका प्रकाश (तेज) निराकार है और आपकी चमक तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, और पाताल) में फैली हुई है।
  2. स्वरूप और अस्त्र-शस्त्र: आपके माथे पर चंद्रमा सुशोभित है और मुख अत्यंत विशाल और सुंदर है। आपके हाथों में तलवार, त्रिशूल और अन्य अस्त्र-शस्त्र हैं। आप लाल वस्त्र धारण करती हैं और सिंह (शेर) की सवारी करती हैं।
  3. राक्षसों का संहार: चालीसा में वर्णन है कि कैसे माता ने संसार की रक्षा के लिए अनेक रूप धारण किए। जब-जब पृथ्वी पर राक्षसों का अत्याचार बढ़ा, तब-तब आपने अवतार लिया। आपने महिषासुर, शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे महाभयंकर राक्षसों का वध करके देवताओं और साधु-संतों की रक्षा की।
  4. भक्तों की रक्षा और कृपा: आप ही अन्नपूर्णा रूप में संसार का पालन-पोषण करती हैं। जो भी भक्त सच्चे मन से आपका ध्यान करता है, उसके सारे कष्ट मिट जाते हैं। आप रिद्धि-सिद्धि (समृद्धि और सफलता) प्रदान करने वाली हैं।
  5. फलश्रुति (पाठ का फल): चालीसा के अंत में कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक श्री दुर्गा चालीसा का पाठ करता है, उसे जीवन में कभी कोई कष्ट नहीं सताता। उसे धन, संतान, सुख और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

माता दुर्गा के प्रमुख मंत्र और उनके अर्थ

  1. नवार्ण मंत्र (सर्वोत्तम और सबसे शक्तिशाली मंत्र)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥

अर्थ:

  •  ऐं: ज्ञान की देवी सरस्वती का बीज मंत्र।
  • ह्रीं: धन और ऐश्वर्य की देवी महालक्ष्मी का बीज मंत्र।
  • क्लीं: शक्ति की देवी महाकाली का बीज मंत्र।
  • चामुण्डायै विच्चे: हे चंड और मुंड नामक राक्षसों का वध करने वाली माता, आप हमारे अज्ञान के बंधनों को खोलें और हमें ज्ञान और शक्ति प्रदान करें।
  1. सर्वमंगल मांगल्ये (हर शुभ कार्य और कल्याण के लिए)

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। 

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे नारायणी (माता दुर्गा)! आप सभी मंगलों में मंगल रूप हैं, अत्यंत कल्याणकारी हैं, सभी इच्छाओं और पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को सिद्ध करने वाली हैं। आप ही शरण लेने योग्य हैं और तीनों नेत्रों (अतीत, वर्तमान, भविष्य) को देखने वाली हैं। हे गौरी! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

  1. बाधा मुक्ति मंत्र (कठिनाइयों और संकटों से मुक्ति के लिए)

सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः। 

मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥

अर्थ: माता दुर्गा कहती हैं- जो मनुष्य मेरी शरण में आता है और मेरी कृपा प्राप्त करता है, वह सभी प्रकार की बाधाओं (कष्टों) से मुक्त हो जाता है। वह धन, धान्य (अन्न) और संतान से संपन्न होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

  1. दुर्गा गायत्री मंत्र (सकारात्मकता और मानसिक शांति के लिए)

ॐ गिरिजायै विद्महे शिवप्रियायै धीमहि।

तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम पर्वतराज हिमालय की पुत्री (गिरिजा) को जानते हैं, हम भगवान शिव की प्रिया का ध्यान करते हैं। हे माता दुर्गा! कृपया हमारी बुद्धि को जागृत करें और हमें ज्ञान व सही मार्ग दिखाएं।

|| जय माँ दुर्गा || 

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