देवादिदेव महादेव जी की आरती और चालीसा अर्थ सहित पढ़ें। जानें प्रमुख मंत्र, लाभ और भोलेनाथ जी की कृपा पाने का सरल तरीका। सम्पूर्ण जानकारी एक ही स्थान पर।
भगवान शिव का संक्षिप्त परिचय
भगवान शिव हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं और त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में उन्हें ‘महेश’ (विनाशक या संहारक) माना जाता है। वे सृष्टि के संहार और पुनरुत्थान के देवता हैं। शिव जी को ‘महादेव’ (देवों के देव), ‘भोलेनाथ’ (अत्यंत दयालु और शीघ्र प्रसन्न होने वाले), ‘नीलकंठ’ और ‘नटराज’ जैसे अनेक नामों से जाना जाता है।
उनका स्वरूप अत्यंत वैरागी और शक्तिशाली है। उनके सिर पर जटाएं हैं जिनसे पवित्र गंगा नदी बहती है, माथे पर तीसरा नेत्र (ज्ञान और विनाश का प्रतीक) और अर्धचंद्र सुशोभित है। उनके गले में वासुकि नाग लिपटा रहता है। उनके हाथों में त्रिशूल (तीनों गुणों- सत्व, रज, तम का प्रतीक) और डमरू (सृष्टि की ध्वनि का प्रतीक) होता है। वे कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं और माता पार्वती उनकी अर्धांगिनी हैं। भगवान शिव अत्यंत सरल हैं, इसलिए वे मात्र एक लोटा जल और बेलपत्र से भी प्रसन्न हो जाते हैं।
श्री शिव जी की आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव…
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव…
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव…
अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहे भाले शशिधारी॥
ॐ जय शिव…
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव…
कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधर्ता।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥
ॐ जय शिव…
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥
ॐ जय शिव…
त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय शिव…
शिव आरती के लाभ:
शिव जी की आरती मन की चंचलता को दूर करती है और परम शांति का अनुभव कराती है। भगवान शिव महाकाल हैं। उनकी आरती और पूजा से मृत्यु का भय और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। शिव आरती के नित्य गान से अनजाने में हुए पाप कट जाते हैं और आत्मा पवित्र होती है। भोलेनाथ बहुत जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता हैं, उनकी आरती से जीवन में सुख, समृद्धि और वैराग्य की प्राप्ति होती है।
श्री शिव चालीसा (अर्थ सहित)
शिव चालीसा भगवान शिव की स्तुति में रचित 40 चौपाइयों का एक अत्यंत पवित्र पाठ है।
॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥
॥ चौपाई ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥
अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥
मैना मातु की हवे दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥
किया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥
तुरत षडानन आप पठायउ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥
आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥
किया तपहिं भागीरथ भारी।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥
वेद माहि महिमा तुम गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥
सहस कमल में हो रहे धारी।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी।
करत कृपा सब के घटवासी ॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।
संकट ते मोहि आन उबारो ॥
मात-पिता भ्राता सब होई।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरहु मम संकट भारी ॥
धन निर्धन को देत सदा हीं।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥
शंकर हो संकट के नाशन।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।
शारद नारद शीश नवावैं ॥
नमो नमो जय नमः शिवाय।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥
जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावन हारी ॥
पुत्र होन कर इच्छा जोई।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥
जन्म जन्म के पाप नसावे।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥
॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥
श्री शिव चालीसा का अर्थ:
प्रारंभिक दोहा:
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥ जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
दोहे का अर्थ: माता पार्वती के पुत्र और कल्याण के मूल भगवान गणेश की जय हो। अयोध्यादास (चालीसा के रचयिता) कहते हैं कि हे प्रभु, मुझे अभय (निडर होने का) वरदान दें। हे माता पार्वती के पति, दीनों (गरीबों) पर दया करने वाले शिव जी, आपकी जय हो। आप हमेशा संतों और सज्जनों का पालन-पोषण करते हैं।
चालीसा का विस्तृत भावार्थ (संपूर्ण 40 चौपाइयों का सार):
- दिव्य स्वरूप का वर्णन: शिव जी के माथे पर चंद्रमा है, गले में सांपों की माला है और सिर से गंगा की पवित्र धारा बहती है। उनके शरीर पर भस्म लगी है और बाघ की खाल उनके वस्त्र हैं। उनका रूप अत्यंत मोहक और शांतिदायक है।
- संसार की रक्षा (समुद्र मंथन): चालीसा में उस घटना का वर्णन है जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया था। उसमें से भयंकर हलाहल विष निकला था जिससे पूरी सृष्टि नष्ट हो सकती थी। शिव जी ने उस विष को पीकर अपने गले में रोक लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए।
- भक्तों पर असीम कृपा: शिव जी अत्यंत कृपालु हैं। जो भी उन्हें सच्चे मन से पुकारता है, वे उसकी सहायता के लिए तुरंत आते हैं। उन्होंने अपने परम भक्त मार्कण्डेय को यमराज से बचाया था। रावण और बाणासुर जैसे असुरों ने भी उनकी भक्ति करके अपार शक्तियां प्राप्त की थीं।
- सभी कष्टों का निवारण: जो भी व्यक्ति शिव जी का नाम लेता है, उसके जीवन से दरिद्रता, रोग, संकट और शत्रु स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। शिव जी की कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।
- फलश्रुति (पाठ का फल): अंत में बताया गया है कि जो भी व्यक्ति सुबह-शाम नियम से शिव चालीसा का पाठ करता है, उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं। शिव जी की कृपा से उसे इस लोक में सब सुख मिलते हैं और अंत में शिवलोक (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
भगवान शिव के प्रमुख मंत्र और उनके अर्थ
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पंचाक्षरी मंत्र (सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली मंत्र)
ॐ नमः शिवाय॥
अर्थ: मैं भगवान शिव को नमस्कार करता हूँ। (‘नमः शिवाय’ का अर्थ है शिव के प्रति समर्पण। यह मंत्र शरीर के पांच तत्वों – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को संतुलित करता है और मन को शुद्ध करता है।)
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महामृत्युंजय मंत्र (रोग मुक्ति और आयु वृद्धि के लिए)
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
अर्थ: हम तीन नेत्रों वाले (भगवान शिव) की पूजा करते हैं, जो सुगंधित हैं और हमारे जीवन का पोषण करते हैं। जैसे खरबूजा (ककड़ी) पकने पर अपनी बेल से स्वतंत्र हो जाता है, वैसे ही हे प्रभु, आप हमें जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करें और हमें अमरता (मोक्ष) प्रदान करें।
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शिव गायत्री मंत्र (बुद्धि और आध्यात्मिक जागृति के लिए)
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम उस परम पुरुष को जानते हैं, हम महादेव का ध्यान करते हैं। हे भगवान रुद्र (शिव), कृपया हमारी बुद्धि को प्रकाशित करें और हमें आध्यात्मिक ज्ञान की ओर प्रेरित करें।
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शिव स्तुति मंत्र (क्षमा याचना और रक्षा के लिए)
करचरणकृतं वाक् कायजं कर्मजं वा। श्रवणनयनजं वा मानसंवापराधं।
विहितं विहितं वा सर्वमेतत् क्षमस्व। जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥
अर्थ: हे प्रभु! मेरे हाथों, पैरों, वाणी, शरीर या कर्मों से जो भी पाप हुए हों; जो मैंने कानों से सुना हो, आँखों से देखा हो या मन से जो भी अपराध किया हो; चाहे वे जाने-अनजाने में हुए हों, कृपया उन सभी को क्षमा करें। हे करुणा के सागर श्री महादेव शम्भो, आपकी जय हो!
|| हर हर महादेव ||
