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श्री कृष्ण जी की आरती और कृष्ण चालीसा अर्थ सहित पढ़ें। जानें शक्तिशाली मंत्र, लाभ और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा पाने का सरल तरीका।

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भगवान श्री कृष्ण का संक्षिप्त परिचय

भगवान श्री कृष्ण हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के आठवें अवतार (पूर्ण अवतार) माने जाते हैं। उनका जन्म द्वापर युग में मथुरा के कारागार (जेल) में माता देवकी और वसुदेव के घर हुआ था, लेकिन उनके प्राणों की रक्षा के लिए रातों-रात उन्हें गोकुल पहुँचाया गया, जहाँ उनका पालन-पोषण माता यशोदा और नंद बाबा ने किया।

श्री कृष्ण को ‘माखन चोर’, ‘गोपाल’, ‘मुरलीधर’, ‘कन्हैया’ और ‘द्वारकाधीश’ जैसे अनेक मनमोहक नामों से पुकारा जाता है। उनका स्वरूप अत्यंत आकर्षक है – वे सांवले रंग (मेघवर्ण) के हैं, पीले वस्त्र धारण करते हैं (पीतांबरधारी), सिर पर मोर मुकुट सजाते हैं और होठों पर हमेशा बांसुरी रहती है।

उन्होंने अपने जीवन में अनेक लीलाएं रचीं – बचपन में पूतना जैसे राक्षसों का वध किया, कालिया नाग का घमंड तोड़ा और गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर इंद्र के प्रकोप से गोकुलवासियों की रक्षा की। युवावस्था में उन्होंने कंस का वध करके मथुरा को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया। महाभारत के युद्ध में वे अर्जुन के सारथी बने और कुरुक्षेत्र के मैदान में उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता का वह परम ज्ञान दिया, जो आज भी संपूर्ण मानव जाति के लिए कर्म, भक्ति और ज्ञान का सबसे बड़ा मार्गदर्शक है। वे प्रेम, आनंद और धर्म की स्थापना के सर्वोच्च प्रतीक हैं।

 श्री कृष्ण जी की आरती

(आरती कुंजबिहारी की)

आरती कुंजबिहारी की । 

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।

गले में बैजन्ती माला । 

बजावैं मुरलि मधुर बाला ।

श्रवण में कुंडल झलकाता । 

नंद के आनंद नन्दलाला ।

गगन सम अंग कान्ति काली। 

राधिका चमक रही आली

लतन में ठाढ़े बनमाली । 

भ्रमर-सी अलक ।

कस्तूरी तिलक,चंद्र-सी झलक। 

ललित छबि श्यामा प्यारी की ।

आरती…

कनकमय मोर मुकुट बिलसै । 

देवता दरसन को तरसैं।

गगन सों सुमन राशि बरसैं । 

बजै मुरचंग ।

मधुर मृदंग,ग्वालिनी संग । 

अतुल रति गोपकुमारी की ।

आरती…

जहां से प्रगट भई गंगा । 

कलुष कलिहारिणी श्री गंगा।

स्मरण से होत मोह भंगा । 

बसी शिव शीश जटा के बीच।

हरै अघ-कीच ,चरण छवि श्री बनवारी की ।

आरती…

चमकती उज्ज्वल तट रेनू । 

बज रही बृंदावन बेनू।

चहुं  दिसि गोपि  ग्वाल धेनु । 

हंसत मृदु मन्द चांदनी चंद।

कटत भव फन्द ,टेर सुन दीन भिखारी की ।

आरती…

कृष्ण आरती के लाभ: श्री कृष्ण आनंद के सागर हैं। उनकी आरती गाने से मन की उदासी दूर होती है और हृदय में ईश्वरीय प्रेम और खुशी का संचार होता है। आरती में बताया गया है कि कृष्ण के स्मरण से ‘मोह भंग’ होता है और ‘भव फंद’ (संसार के बंधन) कट जाते हैं, जिससे वैराग्य और शांति मिलती है। जिस प्रकार कृष्ण के चरणों से निकली गंगा पापों को हरती है, उसी प्रकार उनकी आरती का नित्य गान करने से अनजाने में हुए पाप मिट जाते हैं। सच्चे मन से भगवान की आरती करने से वे अपने भक्तों की पुकार (‘दीन भिखारी की टेर’) अवश्य सुनते हैं और उनके सभी कष्ट दूर करते हैं।

श्री कृष्ण चालीसा (अर्थ सहित)

श्री कृष्ण चालीसा भगवान कृष्ण की स्तुति और उनकी लीलाओं का मधुर गान है।

॥ दोहा॥
वंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम ।
अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम ॥

पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज ।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज ॥
॥ चौपाई ॥
जय यदुनन्दन जय जगवन्दन ।

जय वसुदेव देवकी नन्दन ॥

जय यशुदा सुत नन्द दुलारे ।

जय प्रभु भक्तन के दृग तारे ॥

जय नट-नागर नाग नथैया ।

कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया ॥

पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो ।

आओ दीनन कष्ट निवारो ॥

वंशी मधुर अधर धरी तेरी ।

होवे पूर्ण मनोरथ मेरो ॥

आओ हरि पुनि माखन चाखो ।

आज लाज भारत की राखो ॥

गोल कपोल, चिबुक अरुणारे ।

मृदु मुस्कान मोहिनी डारे 
रंजित राजिव नयन विशाला ।

मोर मुकुट वैजयंती माला ॥

कुण्डल श्रवण पीतपट आछे ।

कटि किंकणी काछन काछे ॥

नील जलज सुन्दर तनु सोहे ।

छवि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे ॥

मस्तक तिलक, अलक घुंघराले ।

आओ कृष्ण बांसुरी वाले ॥

करि पय पान, पुतनहि तारयो ।

अका बका कागासुर मारयो ॥

मधुवन जलत अग्नि जब ज्वाला ।

भै शीतल, लखितहिं नन्दलाला ॥

सुरपति जब ब्रज चढ़यो रिसाई ।

मसूर धार वारि वर्षाई ॥

लगत-लगत ब्रज चहन बहायो ।

गोवर्धन नखधारि बचायो ॥
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई ।

मुख महं चौदह भुवन दिखाई ॥

दुष्ट कंस अति उधम मचायो ।

कोटि कमल जब फूल मंगायो ॥

नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें ।

चरणचिन्ह दै निर्भय किन्हें ॥

करि गोपिन संग रास विलासा ।

सबकी पूरण करी अभिलाषा ॥

केतिक महा असुर संहारयो ।

कंसहि केस पकड़ि दै मारयो ॥

मात-पिता की बन्दि छुड़ाई ।

उग्रसेन कहं राज दिलाई ॥
महि से मृतक छहों सुत लायो ।

मातु देवकी शोक मिटायो ॥

भौमासुर मुर दैत्य संहारी ।

लाये षट दस सहसकुमारी ॥

दे भीमहिं तृणचीर सहारा ।

जरासिंधु राक्षस कहं मारा ॥

असुर बकासुर आदिक मारयो ।

भक्तन के तब कष्ट निवारियो ॥

दीन सुदामा के दुःख टारयो ।

तंदुल तीन मूंठ मुख डारयो ॥

प्रेम के साग विदुर घर मांगे ।

दुर्योधन के मेवा त्यागे ॥

लखि प्रेम की महिमा भारी ।

ऐसे श्याम दीन हितकारी ॥

भारत के पारथ रथ हांके ।

लिए चक्र कर नहिं बल ताके ॥

निज गीता के ज्ञान सुनाये ।

भक्तन ह्रदय सुधा वर्षाये ॥

मीरा थी ऐसी मतवाली ।

विष पी गई बजाकर ताली ॥

राना भेजा सांप पिटारी ।

शालिग्राम बने बनवारी ॥

निज माया तुम विधिहिं दिखायो ।

उर ते संशय सकल मिटायो ॥

तब शत निन्दा करी तत्काला ।

जीवन मुक्त भयो शिशुपाला ॥

जबहिं द्रौपदी टेर लगाई ।

दीनानाथ लाज अब जाई ॥

तुरतहिं वसन बने ननन्दलाला ।

बढ़े चीर भै अरि मुँह काला ॥

अस नाथ के नाथ कन्हैया ।

डूबत भंवर बचावत नैया ॥

सुन्दरदास आस उर धारी ।

दयादृष्टि कीजै बनवारी ॥

नाथ सकल मम कुमति निवारो ।

क्षमहु बेगि अपराध हमारो ॥

खोलो पट अब दर्शन दीजै ।

बोलो कृष्ण कन्हैया की जै ॥

॥ दोहा ॥

यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥

श्री कृष्ण चालीसा का अर्थ 

प्रारंभिक दोहा अर्थ: वंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम। अरुण अधर जन बिम्ब फल, नयन कमल अभिराम॥ पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज। जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥

दोहे का अर्थ: जिनके हाथों में मधुर बांसुरी सुशोभित है, जिनका शरीर नीले बादलों के समान सांवला है, जिनके लाल होंठ बिम्ब फल के समान हैं और जिनकी आंखें कमल के समान सुंदर हैं। जिनका मुख पूर्ण चंद्रमा के समान है, जो पीले वस्त्रों में अत्यंत सुंदर लग रहे हैं। ऐसे मन को मोह लेने वाले, कामदेव के समान छवि वाले महाराज श्री कृष्णचन्द्र की जय हो!

चालीसा का विस्तृत भावार्थ (संपूर्ण चौपाइयों का सार):

  1. जन्म और बाल लीलाएं: चालीसा में देवकी-वसुदेव के घर अवतार लेने और गोकुल में यशोदा माता द्वारा पाले जाने का वर्णन है। कृष्ण ने बचपन में ही पूतना राक्षसी को मुक्ति दी और कालिया नाग को नाथ कर यमुना नदी को शुद्ध किया।
  2. गोपियों के संग लीला: उन्होंने ब्रज में माखन चुराने की लीलाएं कीं, गोपियों के संग महारास रचाया और गोवर्धन पर्वत धारण करके देवराज इंद्र का अहंकार तोड़ा।
  3. कंस वध और महाभारत: बड़े होकर उन्होंने अत्याचारी कंस को मारा और अपने माता-पिता व नाना उग्रसेन को मुक्त कराया। महाभारत के युद्ध में उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर की रक्षा की, दुशासन से द्रौपदी की लाज बचाई (चीर हरण के समय वस्त्र बढ़ाकर), और अर्जुन को गीता का उपदेश देकर धर्म की जीत सुनिश्चित की।
  4. भक्तों के प्रति प्रेम: भगवान कृष्ण अपने भक्तों के अधीन हैं। उन्होंने सुदामा की मित्रता निभाई और मुट्ठी भर चावल खाकर उन्हें तीनों लोकों का ऐश्वर्य दे दिया। उन्होंने गजराज (हाथी) को मगरमच्छ से बचाया।
  5. फलश्रुति (पाठ का फल): अंत में कहा गया है कि जो भी भक्त प्रातः उठकर नियम से श्री कृष्ण चालीसा का पाठ करता है, उसे तीनों लोकों का सुख प्राप्त होता है। भगवान कृष्ण उसके सभी दुखों को दूर करते हैं और अंत में उसे अपने परम धाम (गोलोक) में स्थान देते हैं।

भगवान कृष्ण के प्रमुख मंत्र और उनके अर्थ

  1. महामंत्र (कलि संतरण मंत्र / कलियुग में मोक्ष का सबसे सिद्ध मंत्र)

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

अर्थ: हे प्रभु (हरे), हे सर्व-आकर्षक कृष्ण, हे आनंद के स्रोत राम! कृपया मुझे अपनी दिव्य प्रेममयी सेवा में लगा लें। (यह मंत्र कलियुग के सभी दोषों को मिटाने वाला और मन को तुरंत शुद्ध करने वाला है)।

  1. वासुदेव मंत्र (शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए)

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

अर्थ: मैं भगवान वासुदेव (श्री कृष्ण) को नमस्कार करता हूँ, जो सब में निवास करते हैं और जिनमें सब निवास करते हैं। (यह श्रीमद्भागवत महापुराण का मुख्य मंत्र है)।

  1. श्री कृष्ण मूल मंत्र (धन, विद्या और सफलता के लिए)

ॐ कृष्णाय नमः॥ (या ‘ॐ क्लीं कृष्णाय नमः’)

अर्थ: मैं भगवान श्री कृष्ण को प्रणाम करता हूँ। (‘क्लीं’ कामराज बीज मंत्र है, जो आकर्षण और भगवान के प्रति प्रेम उत्पन्न करता है। इस मंत्र के जाप से जीवन में सकारात्मकता और सफलता आती है।)

  1. श्री कृष्ण गायत्री मंत्र (ज्ञान और बुद्धि के लिए)

ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम माता देवकी के पुत्र को जानते हैं, हम भगवान वासुदेव का ध्यान करते हैं। हे भगवान श्री कृष्ण, कृपया हमारी बुद्धि को प्रकाशित करें और हमें अंधकार से प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले जाएं।

|| जय श्री कृष्ण ||

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