वट सावित्री व्रत 2026: तिथि, कथा, महत्व और पूजा विधि
जानें वट सावित्री व्रत से कैसे मिलता है अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु का आशीर्वाद
यह व्रत दो अलग-अलग मान्यताओं के अनुसार मनाया जाता है:
👉 अमावस्या आधारित वट सावित्री व्रत: शनिवार, 16 मई 2026
👉 पूर्णिमा आधारित वट सावित्री व्रत: सोमवार, 29 जून 2026
उदय तिथि की मान्यता के अनुसार, अमावस्या पर आधारित वट सावित्री व्रत 16 मई 2026 को ही रखा जाएगा। तिथि का विवरण इस प्रकार है:
👉 अमावस्या तिथि प्रारंभ: 16 मई 2026 को सुबह 05:11 बजे से
👉 अमावस्या तिथि समाप्त: 17 मई 2026 को रात 01:30 बजे तक
वट सावित्री व्रत क्या है?
यह व्रत सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं।
यह व्रत मुख्य रूप से दो समय पर मनाया जाता है:
- अमावस्या (उत्तर भारत): ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को।
- पूर्णिमा (महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण भारत): ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को।
पूजन: इस दिन वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा की जाती है, क्योंकि पौराणिक कथा के अनुसार, इसी वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति सत्यवान को पुनर्जीवन दिलवाया था।
वट सावित्री व्रत की कथा
वट सावित्री व्रत की कथा सत्यवान और सावित्री के अमर प्रेम, समर्पण और बुद्धिमत्ता पर आधारित है:
कथा का सार:
प्राचीन काल में मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री का नाम सावित्री था। सावित्री अत्यंत रूपवान और तेजस्वी थी। जब वह विवाह योग्य हुईं, तो उन्होंने स्वयं अपने लिए वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को चुना।
जब सावित्री ने सत्यवान को चुना, तो देवर्षि नारद ने उन्हें सूचित किया कि सत्यवान केवल एक वर्ष ही जीवित रहेंगे। इस भविष्यवाणी को सुनकर भी सावित्री विचलित नहीं हुईं और उन्होंने दृढ़ता से सत्यवान से ही विवाह करने का निर्णय लिया।
विवाह के बाद, सावित्री और सत्यवान वन में रहने लगे। सावित्री ने नारद जी की भविष्यवाणी का दिन आने से तीन दिन पहले से ही उपवास शुरू कर दिया।
नारद जी द्वारा बताए गए सत्यवान की मृत्यु के दिन, सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जंगल गए और सावित्री भी उनके साथ गईं। जंगल में सत्यवान को चक्कर आया और वे एक वट वृक्ष (बरगद) के नीचे लेट गए।
कुछ देर बाद, यमराज (मृत्यु के देवता) स्वयं सत्यवान के प्राण हरने के लिए प्रकट हुए। यमराज सत्यवान के सूक्ष्म शरीर को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे।
सावित्री ने यमराज का पीछा करना शुरू कर दिया। यमराज ने सावित्री को कई बार वापस लौटने को कहा, लेकिन सावित्री ने अपने पातिव्रत्य धर्म और ज्ञान भरी बातों से उन्हें प्रभावित कर दिया।
यमराज ने सावित्री की बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा, लेकिन इन वरदानों में सत्यवान का जीवन वापस मांगना शामिल नहीं था।
- पहला वरदान: सावित्री ने अपने अंधे ससुर का नेत्र-ज्योति वापस माँगा।
- दूसरा वरदान: उन्होंने अपने ससुर का छिना हुआ राज्य वापस माँगा।
- तीसरा वरदान: उन्होंने अपने लिए सत्यवान के 100 पुत्रों की माँ बनने का वरदान माँगा।
यमराज ने ‘तथास्तु’ कह दिया। तब सावित्री ने कहा, “हे प्रभु! मैं सत्यवान के 100 पुत्रों की माँ तभी बन सकती हूँ जब मेरे पति जीवित हों।”
यमराज, धर्म के नियमों में बंधे होने के कारण, सावित्री की बुद्धि और पातिव्रत्य से अत्यंत प्रसन्न हुए और सत्यवान को पुनर्जीवित कर दिया।
महत्व और मान्यता
- पतिव्रता का आदर्श: सावित्री को भारतीय संस्कृति में सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता नारी का आदर्श माना जाता है। यह व्रत उनके त्याग, तपस्या और पति के प्रति अगाध प्रेम का प्रतीक है।
- वट वृक्ष का महत्व: वट वृक्ष (बरगद) को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है। मान्यता है कि इसकी लटकती जटाएं जीवन की निरंतरता और दीर्घायु को दर्शाती हैं। वट वृक्ष की पूजा करके सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु और अमरत्व की कामना करती हैं।
- पुण्य और सौभाग्य: यह व्रत करने से स्त्रियों को सौभाग्य की प्राप्ति होती है और उनके जीवन में सुख-शांति आती है। यह व्रत वैवाहिक जीवन की सभी बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है।
वट सावित्री व्रत की विस्तृत पूजा विधि
यह व्रत मुख्य रूप से ज्येष्ठ माह की अमावस्या (उत्तर भारत) या पूर्णिमा (दक्षिण भारत/गुजरात) को मनाया जाता है।
- पूजन सामग्री
- वट वृक्ष के लिए: कच्चा सूत (कलावा/मौली), जल भरा कलश, धूप, दीपक, रोली, कुमकुम, भीगे हुए चने, गुड़, फल (विशेषकर आम), मिठाई, लाल रंग का वस्त्र या ओढ़नी।
- सावित्री और सत्यवान के लिए: उनकी प्रतिमा या चित्र, सिन्दूर, बिंदी, मेहंदी, चूड़ियाँ, आदि सुहाग की सामग्री।
- यमराज के लिए: भोग (गुड़ और चने), जल।
- पूजा की तैयारी (व्रत के दिन)
- व्रत और स्नान: सुहागिन महिलाएं प्रातःकाल उठकर नित्य कर्मों से निवृत हों।
- श्रृंगार: नए वस्त्र और सोलह श्रृंगार करें। यह व्रत सौभाग्य का प्रतीक है, इसलिए पूरा श्रृंगार करना शुभ माना जाता है।
- संकल्प: पूजा सामग्री लेकर वट वृक्ष के पास जाएं। यदि वट वृक्ष न हो, तो घर में वट वृक्ष की टहनी या चित्र की पूजा कर सकती हैं। हाथ में जल, पुष्प और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें:
“हे देवी सावित्री! मैं अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सौभाग्य की वृद्धि के लिए यह व्रत कर रही हूँ। मेरे इस व्रत को सफल करें।”
- वट वृक्ष के नीचे पूजा
- स्थान की शुद्धि: वट वृक्ष के नीचे की जगह को साफ करें और उस पर जल छिड़ककर शुद्ध करें।
- सावित्री-सत्यवान की स्थापना: वट वृक्ष के तने के पास सावित्री और सत्यवान की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
- पूजन:
- जल अर्पण: वट वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें।
- तिलक: वृक्ष को हल्दी, कुमकुम और रोली का तिलक लगाएं।
- वस्त्र और पुष्प: वट वृक्ष को वस्त्र (ओढ़नी या लाल धागा) अर्पित करें और फूल-माला चढ़ाएं।
- धूप-दीप: धूप और घी का दीपक जलाएं।
- भोग: फल, भीगे हुए चने, और मिठाई का भोग लगाएं।
- परिक्रमा और रक्षा सूत्र (सबसे महत्वपूर्ण चरण)
- कच्चा सूत बांधना: वट वृक्ष के तने के चारों ओर कच्चे सूत या मौली को लपेटते हुए परिक्रमा करें।
- परिक्रमा संख्या: परिक्रमा 7, 11, 21, 51 या 108 बार की जाती है।
- मंत्र/कामना: हर परिक्रमा के दौरान पति की दीर्घायु की कामना करें और यह मंत्र बोलें:
“अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते। पुत्रान् पौत्रांश्च सौभाग्यं देहि मे वटशाङ्खिनी।।”
अर्थ: हे सुव्रता, मुझे सौभाग्य और अखंड सुहाग प्रदान करो। हे वट वृक्ष की देवी, मुझे पुत्र और पौत्र प्रदान करो।
- कथा श्रवण और प्रार्थना
- कथा वाचन: पूजा समाप्त होने पर वहीं बैठकर वट सावित्री व्रत की सत्यवान-सावित्री की कथा पढ़ें या सुनें।
- प्रार्थना: कथा के बाद सावित्री देवी और यमराज से प्रार्थना करें कि जिस प्रकार सावित्री ने अपने पति के प्राण वापस लाए, उसी प्रकार आपके पति को भी दीर्घायु प्राप्त हो और आपका सौभाग्य बना रहे।
- व्रत का पारण
- पूजा के बाद ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को फल, वस्त्र और दान-दक्षिणा दें।
- व्रत के अगले दिन (या व्रत के नियमानुसार जब अमावस्या/पूर्णिमा समाप्त हो जाए) पारण किया जाता है।
- वट वृक्ष के पास चढ़ाये गए भीगे हुए चनों का प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण करें।
विशेष मान्यता: वट वृक्ष की पूजा करते समय 108 भीगे हुए चने (या जितनी परिक्रमा करें उतने चने) चढ़ाए जाते हैं और परिक्रमा के बाद इन्हीं में से कुछ चने प्रसाद के रूप में खाकर व्रत खोला जाता है।
वट सावित्री व्रत 2026 – FAQs
प्रश्न 1: वट सावित्री व्रत 2026 कब है?
उत्तर 1: वर्ष 2026 में वट सावित्री व्रत 16 मई (अमावस्या) और 29 जून (पूर्णिमा) को मनाया जाएगा।
प्रश्न 2: वट सावित्री व्रत क्यों रखा जाता है?
उत्तर 2: यह व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य के लिए रखती हैं।
प्रश्न 3: वट सावित्री व्रत में किसकी पूजा की जाती है?
उत्तर 3: इस दिन वट वृक्ष (बरगद), देवी सावित्री, सत्यवान और यमराज की पूजा की जाती है।
प्रश्न 4: वट सावित्री व्रत की कथा क्या है?
उत्तर 4: यह व्रत सावित्री और सत्यवान की कथा पर आधारित है, जिसमें सावित्री ने अपनी बुद्धि और पतिव्रता धर्म से यमराज से अपने पति के प्राण वापस प्राप्त किए थे।
प्रश्न 5: वट सावित्री व्रत में कितनी परिक्रमा करनी चाहिए?
उत्तर 5: वट वृक्ष की 7, 11, 21, 51 या 108 बार परिक्रमा की जाती है, साथ ही कच्चा सूत (मौली) बांधा जाता है।
प्रश्न 6: वट सावित्री व्रत में क्या दान करना चाहिए?
उत्तर 6: इस दिन फल, वस्त्र, भीगे चने, मिठाई और दक्षिणा ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान करना शुभ माना जाता है।
प्रश्न 7: वट सावित्री व्रत का पारण कब और कैसे किया जाता है?
उत्तर 7: व्रत का पारण अगले दिन या तिथि समाप्ति के बाद किया जाता है। वट वृक्ष के चढ़ाए हुए भीगे चनों का प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोला जाता है।
|| हरी शरणम् ||
