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श्रुति पंचमी 2026: पूजा विधि, कथा, महत्व और मान्यता

श्रुति पंचमी (Shruti Panchami) जैन धर्म का एक अत्यंत ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व ज्ञान की उपासना और शास्त्रों के संरक्षण का प्रतीक है।

इसे ज्ञान पंचमी के रूप में भी जाना जाता है (हालांकि कार्तिक मास में भी एक ज्ञान पंचमी होती है, लेकिन ज्येष्ठ मास की यह पंचमी प्रथम ग्रंथ की रचना का उत्सव है)।

श्रुति पंचमी पूजा

श्रुति पंचमी क्या है?

यह पर्व हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। ‘श्रुति’ का अर्थ है ‘सुना हुआ’ (ज्ञान) और ‘पंचमी’ तिथि है। इस दिन जैन धर्म के प्रथम लिखित ग्रंथ की रचना पूरी हुई थी और उसकी पूजा की गई थी।

महत्व: इस दिन से पहले जैन धर्म का ज्ञान केवल गुरु-शिष्य परंपरा में मौखिक रूप (सुनकर याद रखना) से जीवित था। इस दिन उसे पहली बार ताड़पत्रों पर लिखकर लिपिबद्ध किया गया था।

 

श्रुति पंचमी की कथा

श्रुति पंचमी का इतिहास लगभग 2000 वर्ष पुराना है। कथा इस प्रकार है:

भगवान महावीर के निर्वाण के बाद, उनका दिव्य ज्ञान मौखिक रूप से आचार्यों द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा था। समय के साथ, आचार्य धरसेन (जो गिरनार पर्वत, गुजरात की चंद्र गुफा में तपस्या कर रहे थे) को आभास हुआ कि उनकी आयु कम बची है और शिष्यों की स्मरण शक्ति कमजोर होती जा रही है। उन्हें डर था कि यदि इस ज्ञान को लिखा नहीं गया, तो यह लुप्त हो जाएगा।

आचार्य धरसेन ने महिमा नगरी के संघ को संदेश भेजा। वहां से दो योग्य मुनि- मुनि पुष्पदंत और मुनि भूतबलि – आचार्य धरसेन के पास पहुंचे।

आचार्य धरसेन ने इन दोनों मुनियों को ज्ञान दिया। इसके बाद, मुनि पुष्पदंत और मुनि भूतबलि ने अंकलेश्वर (गुजरात) में चातुर्मास के दौरान इस ज्ञान को ताड़पत्रों पर लिखना शुरू किया।

ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन उन्होंने षट्खण्डागम (Shatkhandagama) नामक महान ग्रंथ की रचना पूरी की। यह जैन धर्म का पहला लिखित आगम ग्रंथ बना। ग्रंथ पूरा होने पर देवों और मनुष्यों ने मिलकर इस ग्रंथ की भव्य पूजा की। इसी दिन को ‘श्रुति पंचमी’ या ‘जिनवाणी स्थापना दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा।

 

श्रुति पंचमी का महत्व

श्रुति पंचमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, साहित्य और ज्ञान के संरक्षण का प्रतीक है। इसका महत्व निम्नलिखित कारणों से है:

  • ज्ञान का संरक्षण: यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे पूर्वजों ने ज्ञान को बचाए रखने के लिए कितना कड़ा परिश्रम किया था। यदि उस दिन शास्त्रों को लिखा न गया होता, तो आज हम उस महान दर्शन से वंचित रह जाते।

  • अंधकार से प्रकाश की ओर: शास्त्र हमारे जीवन में दीपक का कार्य करते हैं। श्रुत पंचमी हमें अज्ञानता के अंधकार से सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान) के प्रकाश की ओर ले जाने की प्रेरणा देती है।

  • कृतज्ञता व्यक्त करना: यह दिन उन महान आचार्यों और ऋषियों-मुनियों के प्रति आभार प्रकट करने का दिन है, जिन्होंने मानव कल्याण के लिए ज्ञान का खजाना सौंपा।

प्रमुख मान्यताएं और इस दिन किए जाने वाले कार्य

श्रुति पंचमी के दिन मंदिरों और घरों में विशेष आयोजन किए जाते हैं। इस दिन की प्रमुख मान्यताएं और अनुष्ठान इस प्रकार हैं:

1. शास्त्र पूजा (जिनवाणी वंदना)

इस दिन मंदिरों में प्राचीन ग्रंथों, धार्मिक पुस्तकों और शास्त्रों की विशेष पूजा की जाती है। ग्रंथों को स्वच्छ लाल या पीले वस्त्रों (वेष्टन) में लपेटकर, उन पर पुष्प और चंदन अर्पित कर उनकी आरती उतारी जाती है।

2. शास्त्रों का जीर्णोद्धार (रखरखाव)

श्रुत पंचमी के दिन पुरानी और जर्जर हो चुकी धार्मिक पुस्तकों को धूप दिखाई जाती है, उनके फटे हुए पन्नों को ठीक किया जाता है और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए नए कवर लगाए जाते हैं। यह पुस्तकों के प्रति सम्मान दर्शाने का सबसे सुंदर तरीका है।

3. श्रुत स्कंध शोभा यात्रा

कई स्थानों पर इस दिन शास्त्रों को एक सुंदर पालकी या रथ में विराजमान करके पूरे नगर में शोभा यात्रा निकाली जाती है। इसे ‘श्रुत स्कंध यात्रा’ कहा जाता है। इसमें श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हुए चलते हैं।

4. ज्ञान दान और उपकरणों का वितरण

ज्ञान का दान सबसे बड़ा दान माना गया है। इस दिन धार्मिक पुस्तकों का वितरण किया जाता है। इसके अलावा, गरीब बच्चों को शिक्षा से जुड़ी सामग्री जैसे- कॉपी, पेन, किताबें या उनकी फीस का सहयोग करना बहुत पुण्य का कार्य माना जाता है।

 

आज के युग में श्रुत पंचमी की प्रासंगिकता

डिजिटल युग में, जहाँ हमारे पास इंटरनेट और ई-बुक्स की भरमार है, श्रुत पंचमी का संदेश और भी गहरा हो जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि केवल ‘सूचना’ (Information) जुटाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ‘सच्चे ज्ञान’ (Wisdom) का आदर करना और उसका सही उपयोग करना भी आवश्यक है।

 

निष्कर्ष

श्रुति पंचमी का दिन वास्तव में एक ‘ज्ञान उत्सव’ है। यह पर्व हमें यह शिक्षा देता है कि किताबें और शास्त्र केवल अलमारियों में सजाने की वस्तु नहीं हैं, बल्कि वे हमारे जीवन को दिशा देने वाले सच्चे मार्गदर्शक हैं। इस दिन हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम न केवल शास्त्रों का सम्मान करेंगे, बल्कि उनमें छिपे हुए ज्ञान को अपने आचरण में भी उतारेंगे।

|| जय जिनेन्द्र ||

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