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बछ बारस (गोवत्स द्वादशी): जानें तिथि, पूजा विधि, व्रत कथा और धार्मिक महत्व

बछ बारस (गोवत्स द्वादशी) सोमवार, 7 सितम्बर 2026 को मनाई जाएगी। 

  • प्रदोषकाल बछ बारस मुहूर्त: सायं 06:36 बजे से रात्रि 08:53 बजे तक
  • मुहूर्त की अवधि: 2 घंटे 17 मिनट
  • द्वादशी तिथि प्रारम्भ: 7 सितम्बर 2026 को सायं 05:03 बजे
  • द्वादशी तिथि समाप्त: 8 सितम्बर 2026 को दोपहर 02:42 बजे

गोवत्स द्वादशी, जिसे कई स्थानों पर बछ बारस या वसु बारस भी कहा जाता है, हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है। यह पर्व दिवाली की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है (विशेषकर महाराष्ट्र और गुजरात में) और यह कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी को मनाया जाता है।

वहीं, उत्तर भारत (राजस्थान, मध्य प्रदेश) में इसे भाद्रपद माह में ‘बछ बारस’ के रूप में भी मनाया जाता है। यहाँ इसका विस्तृत विवरण है:

गोवत्स द्वादशी व्रत करती हुई महिलाएं

गोवत्स पूजा का अर्थ 

‘गो’ का अर्थ है गाय और ‘वत्स’ का अर्थ है बछड़ा। इस दिन गाय और उसके बछड़े की पूजा की जाती है। यह पर्व माताओं द्वारा अपनी संतानों (विशेषकर पुत्र) की लंबी आयु, खुशहाली और सुरक्षा के लिए मनाया जाता है। इसे ‘नंदिनी व्रत’ भी कहते हैं।

 

गोवत्स पूजा की कथा

गोवत्स पूजा से जुड़ी अनेक लोककथाएँ हैं, उनमें से सबसे प्रमुख कथा इस प्रकार है-

 

कथा1-  देवर्षि नारद और इन्द्र की परीक्षा

एक बार देवर्षि नारद जी ने इन्द्र से कहा कि “स्वर्ग में भोग तो हैं, पर पृथ्वी पर गाय के समान कोई दिव्य वस्तु नहीं।”

इन्द्र को यह सुनकर अभिमान हुआ।
उन्होंने गाय के महत्व को कम दिखाने के लिए धरणी देवी (पृथ्वी माता) को भ्रमित किया, जिससे पृथ्वी पर सूखा फैल गया।

इससे मनुष्यों में दुःख बढ़ा, यज्ञ बंद हो गए, और गायों को भी कष्ट होने लगा।
भगवान विष्णु ने धरणी देवी को समझाया—
“गाय के बिना पृथ्वी और स्वर्ग दोनों का संतुलन बिगड़ जाता है। गाय ही धर्म, अन्न और सुख का मूल है।”

इन्द्र को अपनी भूल का अहसास हुआ।
उन्होंने गाय और बछड़ों से क्षमा माँगी और उनके सम्मान में यह पूजा करने का संकल्प लिया।

यही कारण है कि गाय और उसके बछड़े के प्रति श्रद्धा का उत्सव गोवत्स पूजा कहलाया।

 

पौराणिक कथा2

गोवत्स द्वादशी की सबसे प्रचलित कथा इस प्रकार है:

प्राचीन काल में सुवर्णपुर नामक नगर में देवदानी नाम का राजा राज्य करता था। उसके पास एक गाय और एक भैंस थी। राजा की दो रानियाँ थीं- ‘सीता’ और ‘गीता’। सीता गाय से बहुत प्रेम करती थी और उसे सहेली मानती थी, जबकि गीता भैंस से प्रेम करती थी।

एक दिन भैंस ने ईर्ष्यावश रानी गीता से कहा, “सीता मुझसे नफरत करती है और गाय को ज्यादा प्यार करती है।” यह सुनकर गीता ने मन ही मन गाय के बछड़े को मारने की योजना बनाई। अवसर पाकर उसने बछड़े को काटकर गेहूं के ढेर में छिपा दिया।

जब राजा भोजन करने बैठे, तो अचानक मांस और खून की बारिश होने लगी। भोजन की थाली में मल-मूत्र दिखाई देने लगा। राजा भयभीत हो गए। तभी आकाशवाणी हुई कि “तुम्हारी रानी ने गाय के बछड़े की हत्या करके उसे गेहूं में छिपाया है।”

राजा ने बछड़े को ढूंढा और ईश्वर से क्षमा मांगी। राजा और रानी सीता ने गाय और बछड़े की पूजा की और प्रार्थना की। उनकी सच्ची प्रार्थना से, गाय का बछड़ा गेहूं के ढेर से जीवित होकर बाहर निकल आया। तब से यह मान्यता हो गई कि इस दिन गाय-बछड़े की पूजा करने से संतान पर आए संकट टल जाते हैं।

(एक अन्य लोक कथा में, एक सास अपनी बहू को गेहूंला‘ (गेहूं) पकाने को कहती है, लेकिन बहू गलती से गेहूंलानाम के बछड़े को पका देती है। बाद में माता की प्रार्थना से बछड़ा जमीन फाड़कर जीवित बाहर आ जाता है।)

 

महत्व (Significance)

  1. संतान की रक्षा: यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और स्वास्थ्य के लिए रखती हैं।
  2. गौ सेवा: हिंदू धर्म में गाय को ‘माता’ और 33 करोड़ देवी-देवताओं का निवास स्थान माना जाता है। इस दिन गौ सेवा करने से सभी देवताओं का आशीर्वाद मिलता है।
  3. श्री कृष्ण का आशीर्वाद: गाय भगवान कृष्ण को अति प्रिय है। गोवत्स द्वादशी की पूजा से श्री कृष्ण भी प्रसन्न होते हैं।
  4. दिवाली का आरंभ: कई राज्यों में इसी दिन से दीपदान शुरू होता है और दिवाली के उत्सव का आगाज होता है।

मान्यताएं और नियम (Beliefs & Rules)

गोवत्स द्वादशी या बछ बारस के नियम बहुत विशिष्ट और कड़े होते हैं:

  1. चाकू का प्रयोग वर्जित: इस दिन भोजन पकाने या फल-सब्जी काटने के लिए चाकू (Knife) का इस्तेमाल करना सख्त मना है। महिलाएं हाथ से तोड़ी जा सकने वाली सब्जियां या अंकुरित अनाज ही बनाती हैं।
  2. गेहूं और दूध का त्याग:
    • इस दिन गेहूं और गाय का दूध (या उससे बनी दही, घी) खाना वर्जित माना जाता है।
    • भैंस या बकरी के दूध का प्रयोग किया जा सकता है।
    • अनाज में बाजरा, ज्वार, चना या मोठ (अंकुरित मूंग) खाया जाता है।
  3. रोटी नहीं, ‘सोगरा‘: इस दिन गेहूं की रोटी के बजाय बाजरे की रोटी (जिसे सोगरा कहते हैं) या बेसन की चीजें खाई जाती हैं।
  4. पूजा विधि:
    • दूध देने वाली गाय और उसके बछड़े को नहलाकर तैयार किया जाता है।
    • उन्हें नए वस्त्र ओढ़ाए जाते हैं और फूलों की माला पहनाई जाती है।
    • गाय-बछड़े के माथे पर तिलक लगाया जाता है।
    • उन्हें भीगे हुए चने, मोठ, बाजरा और गुड़ खिलाया जाता है।

|| हरे कृष्ण ||

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