Spread the love

सर्वपितृ अमावस्या: अज्ञात तिथियों वाले पितरों के महा-श्राद्ध और विदाई का दिन

सर्वपितृ अमावस्या, जिसे अमावस्या श्राद्ध, पितृ विसर्जनी अमावस्या या महालय अमावस्या भी कहा जाता है,

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को मनाई जाएगी।

सर्वपितृ अमावस्या 2026 तिथि एवं श्राद्ध मुहूर्त

कुतुप मुहूर्त: प्रातः 11:45 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक

अवधि: 47 मिनट

रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:31 बजे से 01:18 बजे तक

अवधि: 47 मिनट

अपराह्न काल: दोपहर 01:18 बजे से अपराह्न 03:37 बजे तक

अवधि: 02 घंटे 20 मिनट

अमावस्या तिथि प्रारम्भ: 09 अक्टूबर 2026 को रात्रि 09:35 बजे

अमावस्या तिथि समाप्त: 10 अक्टूबर 2026 को रात्रि 09:19 बजे

सनातन धर्म में पूर्वजों (पितरों) के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए 16 दिनों का ‘पितृ पक्ष’ (श्राद्ध पक्ष) अत्यंत पवित्र माना जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होने वाले इस पितृ पक्ष का समापन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि यानी ‘अमावस्या’ को होता है। इसी पावन और महत्वपूर्ण तिथि को सर्वपितृ अमावस्या‘ (Sarvapitri Amavasya), महालय अमावस्या‘ (Mahalaya Amavasya) या पितृ विसर्जनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है।

यह पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है, क्योंकि यह दिन उन सभी पूर्वजों को समर्पित है जिनके नाम, गोत्र या मृत्यु की तिथि हमें याद नहीं है।

आइए, सर्वपितृ अमावस्या के गहरे आध्यात्मिक अर्थ, इसके महत्व, इससे जुड़ी कथा और पूजा की मान्यताओं को विस्तार से समझते हैं।

Sarva Pitru Amavasya Shradh Tarpan and Pitru Paksha Rituals

सर्वपितृ अमावस्या का अर्थ

‘सर्वपितृ’ दो शब्दों से बना है- सर्व (सभी) और पितृ (पूर्वज)।

शास्त्रों के अनुसार, परिवार के जिस सदस्य की मृत्यु जिस तिथि को होती है, पितृ पक्ष में उसी तिथि को उसका श्राद्ध (तर्पण) किया जाता है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि हमें अपने किसी पूर्वज की मृत्यु की तिथि याद नहीं होती, या अकाल मृत्यु होने के कारण तिथि का भान नहीं रहता। ऐसे सभी ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों का एक साथ श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या के दिन किया जाता है।

इसे ‘महालय’ (Mahalaya) भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पितरों का बड़ा आलय (घर/मिलन)। इसी दिन शाम के समय सभी पितर अपने लोक (पितृ लोक) वापस लौट जाते हैं, इसलिए इसे ‘पितृ विसर्जनी अमावस्या’ (पितरों की विदाई का दिन) भी कहते हैं।

 

 सर्वपितृ अमावस्या का महत्व

  1. सभी पितरों का श्राद्ध: यह दिन उन सभी पूर्वजों के लिए है जिनकी मृत्यु की तिथि (Date of Death) आपको याद नहीं है। चाहे अकाल मृत्यु हुई हो, या सामान्य, इस एक दिन श्राद्ध करने से सभी संतुष्ट हो जाते हैं।
  2. अंतिम विदाई: मान्यता है कि पितृ पक्ष के 15 दिनों तक हमारे पूर्वज हमारे घर में अतिथि बनकर रहते हैं। अमावस्या की शाम को वे वापस अपने लोक (पितृलोक) लौटते हैं। इसलिए इस दिन उन्हें भोजन और जल देकर ससम्मान विदा किया जाता है ताकि वे जाते-जाते हमें आशीर्वाद दें।
  3. भूल-चूक की माफी: यदि पूरे पितृ पक्ष में आपसे श्राद्ध करने में कोई गलती हो गई हो या आप श्राद्ध करना भूल गए हों, तो इस दिन श्राद्ध और दान करके आप उस दोष से मुक्त हो सकते हैं।
  4. मां दुर्गा का आगमन: महालय अमावस्या की समाप्ति के साथ ही अगले दिन (प्रतिपदा) से ‘शारदीय नवरात्रि‘ की शुरुआत होती है। मान्यता है कि पितरों की विदाई के तुरंत बाद मां दुर्गा कैलाश से धरती पर आती हैं।

सर्वपितृ अमावस्या की पौराणिक कथा 

सर्वपितृ अमावस्या से जुड़ी यह कथा बताती है कि भूल जाने पर भी पितरों का स्मरण कितना आवश्यक है:

प्राचीन काल में एक अत्यंत धर्मनिष्ठ ब्राह्मण रहता था। वह भगवान का बहुत बड़ा भक्त था, लेकिन उसे अपने पिता और दादा की मृत्यु की तिथि याद नहीं थी। इस बात को लेकर वह बहुत दुखी रहता था कि वह अपने पितरों का श्राद्ध किस दिन करे।

एक बार पितृ पक्ष के दौरान उसके स्वप्न में उसके पितर (पूर्वज) अत्यंत मलिन वेश और भूखे-प्यासे रूप में आए। उन्होंने कहा, पुत्र! तुमने हमें अन्न-जल नहीं दिया, जिससे हम अत्यंत कष्ट में हैं।” ब्राह्मण ने रोते हुए कहा, हे पूर्वजों! मुझे आप लोगों की मृत्यु की सही तिथि ज्ञात नहीं है, मैं क्या करूं?”

तब पितरों ने उसे बताया कि, यदि किसी को अपने पूर्वजों की तिथि याद न हो, तो उसे आश्विन मास की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) के दिन तर्पण और श्राद्ध करना चाहिए। इस दिन किया गया श्राद्ध और दान हम सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों को प्राप्त होता है और हमें तृप्ति मिलती है।”

ब्राह्मण ने सर्वपितृ अमावस्या के दिन पूरे विधि-विधान से ब्राह्मणों को भोजन कराया, गाय, कौए और कुत्ते को अन्न दिया और जल से तर्पण किया। ऐसा करने से उसके सभी पितरों को मोक्ष प्राप्त हुआ और वे उसे सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर पितृ लोक को लौट गए।

 

सर्वपितृ अमावस्या की पूजा विधि और मुख्य मान्यताएं (क्या करें?)

इस दिन कुछ विशेष नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि पितर खाली हाथ न लौटें:

  1. स्नान और स्वच्छता: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ़ वस्त्र (सफेद उत्तम हैं) पहनें।
  2. भोजन: घर में पूरी, खीर, सब्जी और दक्षिण भारतीय परंपरा में वड़ा आदि सात्विक भोजन बनाएं।
  3. पंचबलि: जैसा पहले बताया गया, भोजन का हिस्सा 5 जगहों पर निकालें (गाय, कुत्ता, कौआ, चींटी और देवता)।
    • विशेष: इस दिन कौवों और गाय को खिलाना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
  4. तर्पण: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल में तिल और दूध मिलाकर तर्पण दें।
  5. ब्राह्मण भोज: किसी गरीब ब्राह्मण को भोजन कराएं या सीधा (कच्चा अनाज, दाल, चावल, घी) दान करें।
  6. दीपक जलाना (महत्वपूर्ण): शाम के समय (प्रदोष काल में) दक्षिण दिशा में सरसों के तेल का दीपक जलाएं। यह पितरों को वापस जाते समय रास्ता दिखाने का प्रतीक है।

क्या करें और क्या न करें?

  • क्या करें:
    • इस दिन किसी भी गरीब या जरूरतमंद को भोजन अवश्य कराएं।
    • पीपल के पेड़ के नीचे जल चढ़ाएं और दीपक जलाएं (पीपल में पितरों का वास माना जाता है)।
  • क्या न करें:
    • घर के दरवाजे से किसी भी भिखारी या जानवर को भूखा न लौटाएं।
    • किसी से झगड़ा न करें और मांस-मदिरा का सेवन न करें।

सारांश: सर्वपितृ अमावस्या केवल एक रस्म नहीं, बल्कि यह कृतज्ञता और विदाई का दिन है। हम अपने पूर्वजों से कहते हैं- हे पितृगण! आप तृप्त होकर अपने लोक जाएं और हम पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें। अगले वर्ष हम फिर आपका स्वागत करेंगे।”

|| हर हर महादेव ||

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top