विजयादशमी (दशहरा): असत्य पर सत्य, और बुराई पर अच्छाई की महा-विजय का प्रतीक
विजयादशमी (दशहरा) का पर्व मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा।
दशमी तिथि प्रारम्भ : 20 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12:50 बजे
दशमी तिथि समाप्त : 21 अक्टूबर 2026 को दोपहर 02:11 बजे
विजय मुहूर्त: दोपहर 01:59 बजे से 02:45 बजे तक
अवधि : 45 मिनट
अपराह्न पूजा का समय: दोपहर 01:14 बजे से 03:30 बजे तक
अवधि : 2 घंटे 16 मिनट
सनातन धर्म में त्योहारों का केवल धार्मिक महत्व नहीं होता, बल्कि हर त्योहार जीवन जीने की एक गहरी कला और संदेश लेकर आता है। इन्हीं महापर्वों में से एक है- ‘विजयादशमी’ (Vijayadashami), जिसे आम बोलचाल में ‘दशहरा’ (Dussehra) भी कहा जाता है।
नौ दिनों तक चलने वाली शक्ति की उपासना (नवरात्रि) के ठीक अगले दिन, यानी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजयादशमी का पावन पर्व मनाया जाता है। यह दिन अहंकार, अन्याय और अत्याचार के अंत का प्रतीक है। संपूर्ण भारतवर्ष में इसे अत्यंत हर्षोल्लास, रामलीलाओं के मंचन और रावण दहन के साथ मनाया जाता है। आइए, विजयादशमी के अर्थ, इसके गहरे महत्व, पौराणिक कथाओं और इससे जुड़ी प्रमुख मान्यताओं को विस्तार से समझते हैं।
विजयादशमी (दशहरा) क्या है?
इस पर्व के दो प्रमुख नाम हैं, और दोनों के अर्थ अत्यंत गहरे हैं:
- विजयादशमी: यह शब्द ‘विजया’ (जीत) और ‘दशमी’ (दसवां दिन) से मिलकर बना है। चूंकि इसी दिन माता दुर्गा ने महिषासुर पर और भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी, इसलिए इसे ‘विजयादशमी’ कहा जाता है।
- दशहरा: यह शब्द संस्कृत के ‘दश’ (दस) और ‘हरा’ (हारना या नष्ट करना) से बना है। इसका अर्थ है दस सिर वाले रावण का हारना, या हमारे भीतर मौजूद दस प्रमुख बुराइयों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी) का नष्ट होना।
विजयादशमी की पौराणिक कथाएं
इस पर्व से जुड़ी तीन प्रमुख कथाएं हैं:
क. भगवान राम और रावण (रामायण): यह सबसे प्रचलित कथा है। लंकापति रावण ने माता सीता का हरण कर लिया था। भगवान राम ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई की। आश्विन शुक्ल दशमी के दिन ही भगवान राम ने अहंकारी और अन्यायी रावण का वध किया था।
- माना जाता है कि युद्ध से पहले राम ने 9 दिनों तक माँ दुर्गा की पूजा (शक्ति पूजा) की थी और 10वें दिन उन्हें विजय मिली। इसलिए यह दिन ‘दशहरा’ के रूप में मनाया जाता है।
ख. माँ दुर्गा और महिषासुर (देवी पुराण): दूसरी कथा के अनुसार, महिषासुर नामक राक्षस ने देवताओं को आतंकित कर रखा था। माँ दुर्गा ने उससे 9 दिनों तक भीषण युद्ध किया। दसवें दिन (दशमी को) उन्होंने महिषासुर का वध कर दिया। इसलिए इस दिन को ‘विजयादशमी‘ (माँ की विजय का दिन) कहा जाता है।
ग. पांडव और शमी वृक्ष (महाभारत): पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास मिला था। अज्ञातवास में उन्हें अपनी पहचान छिपानी थी, इसलिए उन्होंने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र ‘शमी के वृक्ष‘ पर छिपा दिए थे। दशमी के दिन उनका अज्ञातवास पूरा हुआ। उन्होंने शमी वृक्ष की पूजा करके अपने हथियार वापस लिए और कौरवों की सेना (जो विराट नगर की गायें चुरा रही थी) को हराया। यह भी ‘विजय’ का प्रतीक है।
विजयादशमी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
विजयादशमी का दिन नई शुरुआत और शुभ कार्यों के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है। शास्त्रों में इसे ‘स्वयंसिद्ध मुहूर्त’ (ऐसा समय जिसमें बिना पंचांग देखे कोई भी शुभ कार्य किया जा सके) कहा गया है। इसका महत्व निम्नलिखित है:
- अहंकार का नाश: रावण बहुत ज्ञानी था, लेकिन उसका अहंकार ही उसके विनाश का कारण बना। यह पर्व हमें अपने भीतर के अहंकार, क्रोध और लालच (मन के रावण) को मारने की प्रेरणा देता है।
- अबूझ मुहूर्त: विजयादशमी को साल के सबसे शुभ दिनों (साढ़े तीन मुहूर्तों) में से एक माना जाता है। इस दिन कोई भी नया काम (दुकान खोलना, वाहन खरीदना, गृह प्रवेश) बिना पंचांग देखे किया जा सकता है।
- शक्ति और शौर्य: यह क्षत्रियों और सैनिकों के लिए शक्ति प्रदर्शन और शस्त्र पूजन का दिन है।
विजयादशमी की प्रमुख मान्यताएं और परंपराएं
विजयादशमी के दिन देशभर में कुछ विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं, जिनका अपना वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तर्क है:
- शमी वृक्ष की पूजा: दशहरे के दिन शमी के पेड़ की पूजा का विशेष महत्व है। महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान अपने सभी अस्त्र-शस्त्र इसी शमी के पेड़ में छिपाए थे। मान्यता है कि दशहरे के दिन शमी के पत्ते एक-दूसरे को बांटने से (जिसे ‘सोना’ माना जाता है) घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है।
- अस्त्र-शस्त्र और आयुध पूजा: इस दिन क्षत्रियों, पुलिस, सेना और आम घरों में अस्त्र-शस्त्र (हथियारों) के साथ-साथ औजारों, वाहनों और मशीनों की पूजा की जाती है। यह अपने कर्म और आजीविका के साधनों के प्रति सम्मान प्रकट करने का तरीका है।
- नीलकंठ पक्षी के दर्शन: विजयादशमी के दिन ‘नीलकंठ’ पक्षी का दिखना अत्यंत शुभ माना जाता है। नीलकंठ को भगवान शिव का स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि राम जी को रावण वध से पहले नीलकंठ के दर्शन हुए थे।
- रावण दहन और रामलीला: दशहरे की शाम को रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले जलाए जाते हैं। यह केवल लकड़ी का जलना नहीं है, बल्कि यह हर साल हमारे भीतर पनपने वाली बुराइयों को जलाकर भस्म करने का संकल्प है।
- अपराजिता पूजा और सीमोल्लंघन: प्राचीन काल में राजा-महाराजा विजयादशमी के दिन देवी अपराजिता (जो कभी पराजित नहीं होतीं) की पूजा करते थे और अपने राज्य की सीमा लांघकर (सीमोल्लंघन) नए क्षेत्रों की विजय के लिए निकलते थे।
निष्कर्ष
विजयादशमी (दशहरा) हमें याद दिलाता है कि बुराई चाहे कितनी भी विशाल, शक्तिशाली और आकर्षक क्यों न दिखे, उसका जीवनकाल हमेशा सीमित होता है। सत्य भले ही कुछ समय के लिए परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित कभी नहीं होता। रावण के पुतले जलाते समय हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने भीतर के ‘रावण’ (क्रोध, लालच, और अहंकार) को भी उसी अग्नि में स्वाहा कर देंगे। यही विजयादशमी का वास्तविक अर्थ और संदेश है।
|| जय श्री राम ||
