नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली): अंधकार पर प्रकाश की विजय, रूप निखारने और यम दीपदान का महापर्व
नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) रविवार, 8 नवम्बर 2026 को मनाई जाएगी।
- अभ्यंग स्नान मुहूर्त: प्रातः 05:41 बजे से 06:38 बजे तक
- अवधि: 57 मिनट
चन्द्रोदय समय
- नरक चतुर्दशी के दिन चन्द्रोदय: प्रातः 05:41 बजे
- चन्द्रोदय और चतुर्दशी तिथि के संयोग में अभ्यंग स्नान का विशेष महत्व है।
- चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ: 7 नवम्बर 2026 को प्रातः 10:47 बजे से
- चतुर्दशी तिथि समाप्त: 8 नवम्बर 2026 को प्रातः 11:27 बजे तक
नरक चतुर्दशी, जिसे आम भाषा में ‘छोटी दिवाली‘, ‘रूप चौदस’ या ‘काली चौदस’ भी कहा जाता है, पांच दिवसीय दीपावली महापर्व का दूसरा दिन है। यह दिन बुराई के अंत और शरीर व आत्मा की शुद्धि के लिए मनाया जाता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, नरक चतुर्दशी का पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि (दीपावली से ठीक एक दिन पहले) को मनाया जाता है। यह दिन आलस्य, बुराई और गंदगी रूपी ‘नरक’ को अपने जीवन से बाहर निकालने और भीतर के सौंदर्य (रूप) को निखारने का प्रतीक है। आइए, इस पावन दिन के विभिन्न नामों, पौराणिक कथाओं, गहरे महत्व और इससे जुड़ी विशेष मान्यताओं को विस्तार से समझते हैं।
नरक चतुर्दशी क्या है?(‘छोटी दिवाली‘)
यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (अमावस्या से एक दिन पहले) को मनाया जाता है।
- छोटी दिवाली: क्योंकि इस दिन दिवाली की तरह ही, लेकिन थोड़े कम स्तर पर, दीये जलाए जाते हैं और रोशनी की जाती है।
- नरक चतुर्दशी: इस दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध कर लोगों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी।
- रूप चौदस: इस दिन विशेष उबटन लगाकर स्नान करने से रूप (सौंदर्य) निखरता है, इसलिए इसे रूप चौदस भी कहते हैं।
नरक चतुर्दशी की पौराणिक कथा (नरकासुर वध का प्रसंग)
नरक चतुर्दशी से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा भगवान कृष्ण और सत्यभामा की है:
नरक चतुर्दशी के पर्व का मुख्य आधार भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की यह ऐतिहासिक कथा है:
पौराणिक धर्मग्रंथों के अनुसार, प्राग्ज्योतिषपुर (वर्तमान असम का क्षेत्र) का राजा ‘नरकासुर‘ (जो भूमि देवी का पुत्र था) अत्यंत अत्याचारी और क्रूर राक्षस बन गया था। उसने अपनी शक्ति के अहंकार में देवराज इंद्र को भी पराजित कर दिया और देवताओं की माता अदिति के दिव्य कुंडल छीन लिए।
नरकासुर का अत्याचार यहीं नहीं रुका; उसने देवताओं, सिद्धों और राजाओं की 16,100 कन्याओं को बलपूर्वक बंदी बना लिया और उन्हें अपने कारागार में डाल दिया।
नरकासुर के इन भयानक अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी देवता और ऋषि-मुनि भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए। नरकासुर को यह वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु केवल एक स्त्री के हाथों ही हो सकती है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को अपने रथ का सारथी बनाया और प्राग्ज्योतिषपुर पर आक्रमण कर दिया।
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन, सत्यभामा की सहायता से भगवान श्रीकृष्ण ने उस महाबलशाली राक्षस नरकासुर का वध कर दिया।
बंदी कन्याओं का उद्धार: नरकासुर के मरने के बाद श्रीकृष्ण ने उन 16,100 कन्याओं को मुक्त कराया। समाज में उन कन्याओं को सम्मान दिलाने और उन्हें आश्रय देने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन सभी को अपनी पत्नियों के रूप में स्वीकार किया। नरकासुर के वध और कन्याओं की मुक्ति की इसी खुशी में लोगों ने घी के दीये जलाए, जिसे ‘नरक चतुर्दशी’ या ‘छोटी दिवाली’ के रूप में मनाया जाने लगा।
अन्य कथा (हनुमान जयंती): वाल्मीकि रामायण के अनुसार, हनुमान जी का जन्म भी कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हुआ था। इसलिए उत्तर भारत के कई हिस्सों में इस दिन हनुमान जयंती भी मनाई जाती है और हनुमान जी की विशेष पूजा होती है।
नरक चतुर्दशी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
यह त्योहार हमें बाहरी और भीतरी दोनों तरह की शुद्धता का संदेश देता है:
- अकाल मृत्यु से रक्षा: इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की विशेष पूजा और दीपदान किया जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है और अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।
- रूप और स्वास्थ्य की प्राप्ति: आयुर्वेद के अनुसार, बदलते मौसम (सर्दियों की शुरुआत) में शरीर को रूखेपन और बीमारियों से बचाने के लिए औषधीय स्नान (अभ्यंग स्नान) किया जाता है।
- बुराइयों का अंत: नरकासुर हमारे भीतर बैठे आलस्य, अहंकार और ईर्ष्या का प्रतीक है। छोटी दिवाली हमें इन आंतरिक बुराइयों को खत्म कर ज्ञान का प्रकाश फैलाने की प्रेरणा देती है।
नरक चतुर्दशी की प्रमुख मान्यताएं और पूजा विधि
इस दिन कुछ विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं, जिनका पालन सदियों से किया जा रहा है:
- अभ्यंग स्नान (उबटन और तेल का स्नान)
नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले उठना अनिवार्य माना जाता है। इस दिन नहाने के पानी में अपामार्ग (चिचड़ा) की पत्तियां डाली जाती हैं। शरीर पर तिल का तेल और चंदन, बेसन व हल्दी का ‘उबटन‘ लगाकर स्नान किया जाता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति इस दिन सूर्योदय के बाद उठता है, उसके जीवन से दरिद्रता और बीमारियां नहीं जातीं।
- यम दीपदान (Yama Deepam)
धनतेरस की तरह ही नरक चतुर्दशी की रात को भी ‘यमराज’ के निमित्त दीपदान किया जाता है। शाम के समय घर के सबसे बड़े सदस्य द्वारा एक पुराना मिट्टी का दीपक लिया जाता है, जिसमें सरसों का तेल और चार बत्तियां (चौमुखी दीया) रखी जाती हैं। इस दीपक को घर के बाहर दक्षिण दिशा (South direction) की ओर मुख करके जलाया जाता है, क्योंकि दक्षिण को यमराज की दिशा माना जाता है।
- चौदह दीये जलाना
छोटी दिवाली के दिन घर के अलग-अलग हिस्सों (जैसे- पूजा घर, रसोई, तुलसी का पौधा, जल का स्थान, और घर के मुख्य द्वार) पर 14 दीये जलाए जाते हैं। यह घर के कोने-कोने से अंधकार और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने का प्रतीक है।
- कूड़ा बाहर निकालना (दरिद्रता विसर्जन)
छोटी दिवाली की रात या अगली सुबह जल्दी घर का सारा पुराना कचरा और टूटा-फूटा सामान (जो दरिद्रता का प्रतीक है) घर से बाहर फेंक दिया जाता है। इसे ‘दरिद्रता भगाना’ कहते हैं, ताकि अगले दिन (मुख्य दीपावली पर) माता लक्ष्मी स्वच्छ घर में प्रवेश कर सकें।
- काजल लगाना: कई जगह इस दिन आँखों में ‘काजल’ लगाने की परंपरा है, जिसे ‘काली चौदस’ से जोड़कर देखा जाता है, ताकि बुरी नजर से बचाव हो सके।
निष्कर्ष
नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली केवल मुख्य दीपावली की तैयारी का दिन नहीं है, बल्कि यह अपने आप में एक संपूर्ण और वैज्ञानिक त्योहार है। शरीर को उबटन से साफ करना, घर से कचरा बाहर निकालना और मन से नरकासुर रूपी अहंकार को मिटाना- ये सभी क्रियाएं हमें दीपावली के स्वागत के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करती हैं। यम दीपक की रोशनी हमें यह विश्वास दिलाती है कि धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने वालों का अंधकार या मृत्यु भी कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
|| हरे कृष्ण ||
