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छठ पूजा: प्रकृति, सूर्य देव और छठी मइया की उपासना का महापर्व

छठ पूजा (सूर्य षष्ठी व्रत) रविवार, 15 नवम्बर 2026 को मनाई जाएगी।

सूर्य अर्घ्य का समय

सूर्योदय: प्रातः 06:44 बजे

सूर्यास्त: सायं 05:28 बजे

छठ महापर्व में सायंकाल अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है तथा अगले दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर व्रत का समापन किया जाता है।

षष्ठी तिथि प्रारम्भ: 14 नवम्बर 2026 को रात्रि 11:23 बजे

षष्ठी तिथि समाप्त: 16 नवम्बर 2026 को प्रातः 02:00 बजे

भारतवर्ष त्योहारों का देश है, लेकिन कुछ त्योहार ऐसे होते हैं जो केवल आस्था नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं, प्रकृति प्रेम और कठोर अनुशासन का प्रतीक होते हैं। ऐसा ही एक अद्वितीय पर्व है- छठ पूजा’ (Chhath Puja)

मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाने वाला यह पर्व अब अपनी पवित्रता और महिमा के कारण पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो चुका है। छठ पूजा सनातन धर्म का एकमात्र ऐसा त्योहार है जिसमें न केवल उगते हुए सूर्य की, बल्कि डूबते हुए (अस्त होते) सूर्य की भी पूजा की जाती है। आइए, लोक आस्था के इस महापर्व के अर्थ, इसके गहरे महत्व, पौराणिक कथाओं और चार दिनों तक चलने वाले इसके कठिन नियमों को विस्तार से समझते हैं।

छठ पूजा में अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देती महिलाएं, नदी घाट, बाँस की सूप और पूजा सामग्री के साथ भक्तिमय दृश्य

छठ पूजा

‘छठ’ शब्द हिंदू पंचांग की ‘षष्ठी’ (छठी) तिथि से लिया गया है। यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है- पहला चैत्र मास में (चैती छठ) और दूसरा, जो सबसे अधिक प्रचलित है, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को (कार्तिक छठ)। दीपावली के ठीक छह दिन बाद इस महापर्व की शुरुआत होती है।

इस व्रत में किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि साक्षात दिखाई देने वाले देवता सूर्य देव’ (Surya Dev) और उनकी बहन छठी मइया’ (Chhathi Maiya) की उपासना की जाती है। छठ पूजा मुख्य रूप से संतान की लंबी आयु, परिवार की सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना के लिए किया जाने वाला 36 घंटे का एक अत्यंत कठिन और निर्जला व्रत है।

पौराणिक कथा (Stories)

डाला छठ से जुड़ी कई कथाएँ हैं, लेकिन सबसे प्रचलित कथा राजा प्रियंवद की है:

कथा: राजा प्रियव्रत और छठी मैया

प्राचीन काल में राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी मालिनी संतान सुख से वंचित थे। महर्षि कश्यप ने उनसे पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया और रानी को यज्ञ की खीर खाने को दी। इसके प्रभाव से रानी गर्भवती हुईं, लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें मृत पुत्र की प्राप्ति हुई।

राजा प्रियव्रत पुत्र के वियोग में इतने दुखी हुए कि वे श्मशान जाकर अपने प्राण त्यागने लगे। तभी वहां एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। उन्होंने कहा, मैं ब्रह्मा जी की मानस पुत्री देवसेनाहूँ। प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मुझे षष्ठी‘ (छठी मैया) कहा जाता है। तुम मेरी पूजा करो और लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करो।”

राजा ने देवी की आज्ञा मानकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन विधि-विधान से देवी षष्ठी का व्रत किया और सूर्य को अर्घ्य दिया। इसके फलस्वरूप उन्हें एक स्वस्थ और सुंदर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। तभी से छठ पूजा की परंपरा शुरू हुई।

अन्य संदर्भ: महाभारत काल में सूर्यपुत्र कर्ण ने सबसे पहले सूर्य देव की पूजा शुरू की थी। वहीं, पांडवों के वनवास के दौरान द्रौपदी ने भी अपने परिवार के स्वास्थ्य और राज्य की वापसी के लिए छठ व्रत किया था।

छठ पूजा की मान्यताएं और चार दिनों की पूरी विधि

छठ पूजा का यह महापर्व पूरे चार दिनों तक अत्यंत कठोर नियमों के साथ मनाया जाता है। व्रती (व्रत रखने वाले पुरुष या महिलाएं) इन नियमों का पूरी श्रद्धा से पालन करते हैं:

पहला दिन: नहाय-खाय (Nahay Khay)

यह छठ पूजा का पहला दिन है, जो कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को होता है। इस दिन व्रती नदी या तालाब में स्नान कर स्वयं को शुद्ध करते हैं। घर की अच्छी तरह साफ-सफाई की जाती है। इस दिन व्रती केवल एक बार सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं, जिसमें मुख्य रूप से कद्दू (लौकी) की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल शामिल होता है। भोजन बनाने में सेंधा नमक का उपयोग होता है।

दूसरा दिन: खरना (Kharna)

यह कार्तिक शुक्ल पंचमी का दिन है। ‘खरना’ का अर्थ है शुद्धिकरण। इस दिन व्रती दिन भर निर्जला उपवास रखते हैं और शाम के समय मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर विशेष प्रसाद बनाया जाता है। इस प्रसाद में गुड़ वाली खीर (रसियाव) और रोटी बनाई जाती है। व्रती एकांत में इस प्रसाद को ग्रहण करते हैं, और उसके बाद से 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।

तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य (Sandhya Arghya)

यह कार्तिक शुक्ल षष्ठी का मुख्य दिन है। इस दिन घर के सभी सदस्य मिलकर विशेष प्रसाद ठेकुआ बनाते हैं। बांस के सूप और दौरी (टोकरी) में ठेकुआ, गन्ना, नारियल, केला और अन्य मौसमी फल सजाए जाते हैं। शाम के समय पूरा परिवार और व्रती नदी या तालाब के घाट पर जाते हैं। व्रती कमर तक पानी में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य (अस्ताचलगामी सूर्य) को अर्घ्य देते हैं।

चौथा दिन: उषा अर्घ्य और पारण (Usha Arghya & Paran)

यह पर्व का अंतिम दिन (सप्तमी तिथि) होता है। व्रती भोर (सुबह) होने से पहले ही घाट पर पहुंच जाते हैं। इस दिन पानी में खड़े होकर उगते हुए सूर्य (उदीयमान सूर्य) की प्रतीक्षा की जाती है। सूर्य के दर्शन होते ही उन्हें अर्घ्य दिया जाता है और छठी मइया से परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना की जाती है। इसके बाद व्रती घाट पर ही प्रसाद खाकर अपना 36 घंटे का निर्जला व्रत खोलते हैं, जिसे ‘पारण’ कहा जाता है।

प्रमुख मान्यताएँ और डालाका महत्व

  • डाला (सूप और टोकरी): बांस से बनी टोकरी (डाला) और सूप को शुद्ध माना जाता है क्योंकि बांस पृथ्वी पर सबसे तेजी से बढ़ने वाला घास है और वंश वृद्धि का प्रतीक है।
  • ठेकुआ (प्रसाद): आटे, गुड़ और घी से बना ‘ठेकुआ’ इस पूजा का मुख्य प्रसाद है। मान्यता है कि इसे खाने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
  • मन्नत: लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर ‘कोसी भरने’ या ‘दंडवत प्रणाम’ (जमीन पर लेटकर घाट तक जाना) की मान्यता भी पूरी करते हैं।
  • संतान सुख: यह व्रत विशेष रूप से संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है।

छठ पूजा का धार्मिक, सामाजिक और प्राकृतिक महत्व

  • उगते और डूबते सूर्य की पूजा: दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है, लेकिन छठ पूजा की विशेषता यह है कि इसमें पहले डूबते हुए सूर्य (अस्ताचलगामी) को अर्घ्य दिया जाता है और फिर अगले दिन उगते हुए सूर्य (उदीयमान) को। यह चक्र जीवन और मृत्यु के सत्य को दर्शाता है।
  • शुद्धता और पवित्रता: यह व्रत स्वच्छता के मामले में सबसे कठोर माना जाता है। इसमें गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती। व्रती (व्रत रखने वाला) 36 घंटे तक निर्जला (बिना पानी के) रहता है।
  • प्रकृति प्रेम: यह पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) त्योहार है। इसमें मूर्ति पूजा नहीं होती, बल्कि नदी, तालाब, बांस के सूप और टोकरी (डाला), फल, और गन्ने का प्रयोग होता है।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण: कार्तिक मास में सूर्य की किरणें (पराबैंगनी किरणें) पृथ्वी पर विशेष प्रभाव डालती हैं। जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने से शरीर को ऊर्जा मिलती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

निष्कर्ष

छठ पूजा केवल एक व्रत नहीं, बल्कि हमारी जड़ों की ओर लौटने का एक सुंदर माध्यम है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब लोग अपनी मिट्टी और संस्कृति से दूर हो रहे हैं, तब छठ का यह पर्व देश-विदेश में बैठे लोगों को अपने गांव और घाट की ओर खींच लाता है। बिना किसी पुरोहित और बिना किसी मूर्ति के होने वाली यह पूजा यह सिद्ध करती है कि यदि हृदय में सच्ची श्रद्धा हो, तो प्रकृति का कण-कण ही ईश्वर का साक्षात रूप है। छठी मइया का यह व्रत हमें अनुशासन, स्वच्छता, समानता और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना सिखाता है।

|| जय छठी मैया ||

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