गणाधिप संकष्टी चतुर्थी: जीवन के सभी संकटों को दूर करने और सुख-समृद्धि का व्रत
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी शुक्रवार, 27 नवम्बर 2026 को मनाई जाएगी।
संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रोदय: रात्रि 08:18 बजे
संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन एवं भगवान श्री गणेश की पूजा के बाद ही पूर्ण माना जाता है।
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ: 27 नवम्बर 2026 को प्रातः 09:48 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त: 28 नवम्बर 2026 को प्रातः 06:39 बजे
सनातन हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत ‘प्रथम पूज्य’ भगवान श्री गणेश की आराधना से होती है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है, क्योंकि वे अपने भक्तों के जीवन में आने वाली सभी बाधाओं को हर लेते हैं। भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए हर महीने कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में चतुर्थी तिथि का व्रत रखा जाता है।
मार्गशीर्ष महीने की इस चतुर्थी पर भगवान गणेश के ‘गणाधिप’ (Ganadhipa) स्वरूप की पूजा की जाती है। ‘गण’ का अर्थ है समूह या देवता, और ‘अधिप’ का अर्थ है स्वामी। अर्थात् भगवान गणेश जो सभी गणों के स्वामी हैं, इस दिन उनके इसी शक्तिशाली स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन भगवान गणेश के साथ-साथ ‘महापीठ’ की पूजा का भी विधान है। मान्यता है कि यह व्रत सूर्योदय से शुरू होकर रात में चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य देने के बाद ही पूर्ण होता है।
धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व
इस पावन व्रत को रखने से व्यक्ति को न केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि सांसारिक जीवन की सभी समस्याएं भी सुलझ जाती हैं:
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने से जीवन में आ रही बड़ी से बड़ी विपत्ति (संकट) टल जाती है। ज्योतिष के अनुसार, भगवान गणेश बुध ग्रह और केतु को नियंत्रित करते हैं। इस दिन उनकी पूजा से बुद्धि तेज होती है और व्यापार व शिक्षा में आ रही रुकावटें दूर होती हैं। इस व्रत का समापन चंद्र दर्शन से होता है। चंद्रमा मन का कारक है। चंद्र देव को अर्घ्य देने से मानसिक तनाव दूर होता है और परिवार में शांति का वातावरण बनता है। जो महिलाएं इस दिन निर्जला या फलाहारी व्रत रखती हैं, भगवान गणाधिप उनकी संतान की रक्षा करते हैं और उन्हें दीर्घायु प्रदान करते हैं।
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक व्रत कथा (शिव जी और त्रिपुरासुर की कथा)
संकष्टी चतुर्थी के दिन इस पौराणिक कथा का पाठ करना या इसे सुनना अत्यंत फलदायी माना जाता है:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार ‘त्रिपुरासुर’ नाम के भयंकर राक्षस ने स्वर्ग और पृथ्वी पर हाहाकार मचा रखा था। उसके अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी देवता देवाधिदेव महादेव (भगवान शिव) की शरण में पहुंचे और उनसे त्रिपुरासुर का वध करने की प्रार्थना की।
भगवान शिव ने देवताओं की पुकार सुनी और त्रिपुरासुर का वध करने के लिए अपने दिव्य रथ पर सवार होकर युद्ध भूमि की ओर निकल पड़े। लेकिन जैसे ही शिव जी का रथ आगे बढ़ा, रथ का पहिया अचानक टूट गया और रथ वहीं रुक गया। शिव जी ने सोचा कि आखिर यह विघ्न क्यों उत्पन्न हुआ?
तभी उन्हें स्मरण हुआ कि किसी भी शुभ कार्य या युद्ध पर जाने से पहले ‘विघ्नहर्ता भगवान गणेश’ की पूजा की जानी चाहिए, जो वे जल्दबाजी में भूल गए थे। अपनी भूल का अहसास होते ही भगवान शिव ने वहीं रुककर अपने पुत्र और गणों के स्वामी ‘गणाधिप’ (भगवान गणेश) का आवाहन किया और उनकी विधि-विधान से पूजा की।
भगवान गणेश ने प्रकट होकर अपने पिता भगवान शिव को विजयी होने का आशीर्वाद दिया। गणेश जी की पूजा करने के पश्चात रथ का पहिया अपने आप ठीक हो गया। इसके बाद भगवान शिव ने युद्ध भूमि में जाकर एक ही बाण से त्रिपुरासुर का वध कर दिया।
चूंकि शिव जी ने मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्थी के दिन ही भगवान गणेश की उपासना कर विजय प्राप्त की थी, इसलिए इस दिन को ‘गणाधिप संकष्टी चतुर्थी’ के रूप में मनाया जाने लगा। मान्यता है कि जब स्वयं भगवान शिव को संकट से निकलने के लिए गणेश जी की आराधना करनी पड़ी, तो हम साधारण मनुष्यों के लिए तो यह व्रत अमोघ फलदायी है।
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि
इस व्रत में भगवान गणेश और चंद्र देव दोनों की पूजा का विधान है। इसकी सही विधि इस प्रकार है:
- प्रातःकाल स्नान और संकल्प: सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हाथ में जल और पुष्प लेकर दिन भर व्रत रखने का संकल्प लें।
- दिन का उपवास: दिन भर सात्विक विचार रखें। क्षमता के अनुसार निर्जला या फलाहारी उपवास रखें।
- शाम की विशेष पूजा: संकष्टी चतुर्थी की मुख्य पूजा शाम के समय (सूर्यास्त के बाद चंद्रोदय से पहले) की जाती है।
- प्रसाद : प्रसाद में गणेश जी के प्रिय मोदक या तिल-गुड़ के लड्डू का भोग लगाएं।
- मंत्र जाप और कथा: पूजा करते समय ‘ॐ गं गणपतये नम:’ मंत्र का 108 बार जाप करें। इसके बाद व्रत कथा पढ़ें और आरती करें।
- चंद्र दर्शन और अर्घ्य (महत्वपूर्ण चरण): रात में जब चंद्रमा उदय हो जाए, तो एक तांबे के लोटे में जल, थोड़ा सा दूध, लाल चंदन और फूल डालकर चंद्र देव को अर्घ्य दें। चंद्र दर्शन के बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है।
- पारण (व्रत खोलना): चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद भगवान गणेश का प्रसाद ग्रहण कर अपना व्रत पूर्ण करें।
मुख्य मान्यताएं और व्रत के नियम (क्या न करें)
- तुलसी दल वर्जित: मान्यता है कि गणेश जी ने तुलसी को श्राप दिया था।
- काले वस्त्र न पहनें: पूजा के दौरान काले रंग के वस्त्र पहनने से बचना चाहिए।
- चंद्र दर्शन की अनिवार्यता: संकष्टी चतुर्थी का व्रत तभी सफल माना जाता है जब व्रती रात में चंद्रमा के दर्शन करके उन्हें जल अर्पित करे। यदि मौसम खराब होने के कारण चांद न दिखे, तो पंचांग के अनुसार चंद्रोदय के समय उस दिशा में मुख करके अर्घ्य दिया जा सकता है।
निष्कर्ष
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी का यह महाव्रत हमें यह सिखाता है कि जीवन के रथ का पहिया जब भी संकटों के कारण रुक जाए, तो हमें घबराने के बजाय विघ्नहर्ता भगवान गणेश का ध्यान करना चाहिए। जिस प्रकार भगवान गणेश ने देवताओं और शिव जी के मार्ग को प्रशस्त किया, उसी प्रकार सच्ची श्रद्धा से रखा गया यह व्रत हमारे जीवन की सभी बाधाओं को समाप्त कर सुख, शांति और अखंड सौभाग्य का मार्ग प्रशस्त करता है।
|| जय श्री गणेश ||
