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धनु संक्रांति: सूर्य देव का धनु राशि में प्रवेश, खरमास का आरंभ और दान-पुण्य

धनु संक्रांति बुधवार, 16 दिसम्बर 2026 को मनाई जाएगी।

धनु संक्रांति पुण्य काल: प्रातः 10:29 बजे से सायं 04:00 बजे तक

अवधि: 05 घंटे 31 मिनट

धनु संक्रांति महा पुण्य काल: प्रातः 10:29 बजे से दोपहर 12:13 बजे तक

अवधि: 01 घंटा 43 मिनट

सनातन हिंदू पंचांग और वैदिक ज्योतिष में ‘सूर्य देव’ को नवग्रहों का राजा और ब्रह्मांड की आत्मा माना गया है। सूर्य देव हर महीने एक राशि से दूसरी राशि में गोचर (प्रवेश) करते हैं। सूर्य के इस राशि परिवर्तन को ही संक्रांति कहा जाता है।

एक वर्ष में कुल 12 संक्रांतियां होती हैं, जिनमें से धनु संक्रांति‘ (Dhanu Sankranti) का अत्यंत विशिष्ट और गहरा धार्मिक महत्व है। यह संक्रांति आमतौर पर हर साल 15 या 16 दिसंबर के आस-पास आती है। इसी संक्रांति के दिन से हिंदू धर्म में खरमास‘ (Kharmas) या ‘मलमास’ की शुरुआत होती है, जिसके बाद एक महीने तक सभी मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है। आइए, धनु संक्रांति के अर्थ, इसके गहरे ज्योतिषीय महत्व, खरमास से जुड़ी पौराणिक कथा और पूजा के नियमों को विस्तार से समझते हैं।

धनु संक्रांति पर भगवान सूर्यदेव सात घोड़ों के रथ पर विराजमान, श्रद्धालु सूर्य को अर्घ्य देते हुए, पवित्र नदी में स्नान, दीपदान

धनु संक्रांति क्या है? (ज्योतिषीय अर्थ और खरमास का आरंभ)

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब भगवान सूर्य अपनी यात्रा करते हुए वृश्चिक राशि से निकलकर देवगुरु बृहस्पति की राशि धनु‘ (Sagittarius) में प्रवेश करते हैं, तो इस खगोलीय और ज्योतिषीय घटना को ‘धनु संक्रांति’ कहा जाता है।

धनु राशि के स्वामी देवगुरु बृहस्पति (Jupiter) हैं। जब सूर्य देव अपने गुरु की राशि में जाते हैं, तो वे उनके सम्मान में अपनी सारी उग्रता और ऊर्जा को कम कर देते हैं और गुरु की सेवा में लग जाते हैं। सूर्य के प्रभाव के कम (मलिन) होने के कारण ही इस पूरे एक महीने को मलमास या खरमास कहा जाता है। यह अवधि मकर संक्रांति (जब सूर्य मकर राशि में जाते हैं) तक चलती है।

 

धनु संक्रांति का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व

धनु संक्रांति सांसारिक कार्यों के लिए भले ही शुभ न मानी जाती हो, लेकिन आध्यात्मिक साधना के लिए यह एक स्वर्ण काल है:

  • मांगलिक कार्यों पर रोक: धनु संक्रांति के दिन से विवाह, मुंडन, सगाई, गृह प्रवेश, और नया व्यापार शुरू करना वर्जित हो जाता है। क्योंकि शुभ कार्यों के लिए सूर्य और बृहस्पति दोनों का बलवान होना आवश्यक है, जो इस दौरान कमजोर पड़ जाते हैं।
  • दान-पुण्य का महापुण्य: इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने और गरीबों को गर्म वस्त्र व अन्न दान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं।
  • भगवान विष्णु और सूर्य की उपासना: यह संक्रांति भगवान श्रीहरि विष्णु और सूर्य देव की उपासना के लिए अत्यंत सिद्ध मानी जाती है। इस पूरे महीने गीता का पाठ करना अमोघ फल देता है।
  • ओडिशा में विशेष उत्सव (धनु जात्रा): भगवान जगन्नाथ की नगरी ओडिशा में धनु संक्रांति का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान जगन्नाथ को ‘धनु मुआं’ (Dhanu Mua – एक विशेष प्रकार की मिठाई) का भोग लगाया जाता है और विश्व प्रसिद्ध ‘धनु जात्रा’ (Dhanu Jatra) का आरंभ होता है।

धनु संक्रांति की पौराणिक कथा (खरमास और सूर्य देव के रथ की कहानी)

धनु संक्रांति से ही ‘खरमास’ क्यों शुरू होता है और मांगलिक कार्य क्यों रुक जाते हैं, इसके पीछे पुराणों में एक अत्यंत रोचक कथा है:

मार्कंडेय पुराण के अनुसार, भगवान सूर्य देव अपने सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर बिना रुके निरंतर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करते हैं। उनके रुकने का अर्थ है पूरे संसार में अंधकार और प्रलय का आ जाना। एक बार परिक्रमा करते हुए सूर्य देव के सातों घोड़े लगातार चलने के कारण अत्यंत थक गए और उन्हें प्यास लग आई।

सूर्य देव को अपने घोड़ों की दयनीय स्थिति देखकर दया आ गई। तभी उन्हें एक तालाब दिखाई दिया। उन्होंने सोचा कि घोड़ों को पानी पिलाकर थोड़ा विश्राम दे दिया जाए। लेकिन उन्हें यह भी याद था कि यदि वे रुक गए, तो सृष्टि चक्र रुक जाएगा।

तभी सूर्य देव ने तालाब के किनारे कुछ गधों (संस्कृत में गधे को खरकहा जाता है) को चरते हुए देखा। सृष्टि को रुकने से बचाने के लिए सूर्य देव ने अपने थके हुए सात घोड़ों को रथ से खोलकर पानी पीने और विश्राम करने के लिए छोड़ दिया, और उनकी जगह उन गधों (खर) को अपने रथ में जोत लिया।

अब चूंकि गधों की गति घोड़ों जैसी तेज़ नहीं होती, इसलिए सूर्य देव के रथ की गति अत्यंत धीमी हो गई। इसी धीमी गति और ‘खर’ (गधों) के रथ में जुते होने के कारण इस पूरे एक महीने के समय को खरमास कहा जाने लगा।

एक महीने बाद (मकर संक्रांति के दिन) जब सूर्य देव के घोड़े विश्राम करके पूरी तरह से तरोताजा हो गए, तब सूर्य देव ने गधों को रथ से हटाकर पुनः अपने सातों घोड़ों को जोत लिया और उनकी गति फिर से तेज़ हो गई। यही कारण है कि धनु संक्रांति से लेकर मकर संक्रांति तक का एक महीना मलमास/खरमास कहलाता है और इसमें सूर्य का तेज पृथ्वी पर कम पड़ता है।

 

दूसरी कथा: कृष्ण और कंस का धनुष यज्ञ

ओडिशा की मान्यताओं के अनुसार, धनु संक्रांति का दिन भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से भी जुड़ा है। इसी दिन मथुरा के अत्याचारी राजा कंस ने श्रीकृष्ण और बलराम को मारने के षड्यंत्र के तहत मथुरा में एक भव्य धनुष यज्ञ (Dhanush Yagya) का आयोजन किया था और उन्हें वहां आमंत्रित किया था। इस घटना की स्मृति में आज भी ओडिशा के बरगढ़ में दुनिया का सबसे बड़ा ओपन-एयर थिएटर ‘धनु जात्रा’ आयोजित किया जाता है।

 

धनु संक्रांति की पूजा विधि और मान्यताएं (क्या करें?)

इस पावन दिन पर सूर्य देव और भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए कुछ विशेष नियम अपनाए जाते हैं:

  1. ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: धनु संक्रांति के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान करना सर्वोत्तम है। यदि नदी में न जा सकें, तो नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करें।
  2. सूर्य देव को अर्घ्य: स्नान के पश्चात तांबे के लोटे में शुद्ध जल, लाल फूल, रोली (लाल चंदन) और गुड़ डालकर उगते हुए सूर्य देव को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय ॐ सूर्याय नम: या ॐ भास्कराय नम: मंत्र का जाप करें।
  3. विष्णु पूजा और गीता पाठ: इस दिन भगवान शालिग्राम या भगवान सत्यनारायण की पूजा करें। उन्हें पीले फूल, पीला चंदन और तुलसी दल अर्पित करें। श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय का पाठ करना इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है।
  4. पीली वस्तुओं का दान: धनु राशि गुरु की राशि है, इसलिए इस दिन पीले वस्त्र, चने की दाल, हल्दी, गुड़ और तांबे के बर्तन का दान करना चाहिए। इससे कुंडली में बृहस्पति और सूर्य दोनों ग्रह मजबूत होते हैं।
  5. पितृ शांति: इस दिन पितरों (पूर्वजों) के निमित्त जल से तर्पण करने और ब्राह्मणों को भोजन कराने से पितृ दोष समाप्त होता है।

निष्कर्ष

धनु संक्रांति हमें प्रकृति और समय के चक्र का गहरा संदेश देती है। एक ओर जहां यह खगोलीय दृष्टि से सर्दियों के बढ़ने और सूर्य के प्रभाव के कम होने का समय है, वहीं आध्यात्मिक दृष्टि से यह हमें बाहरी दुनिया (सांसारिक कार्यों और विवाह आदि) से अपना ध्यान हटाकर अपने भीतर झांकने (ईश्वर की भक्ति करने) का अवसर प्रदान करती है। खरमास का यह महीना विश्राम, तपस्या, दान और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का समय है, जो अंततः मकर संक्रांति के प्रकाश की ओर हमें ले जाता है।

|| हरे कृष्ण ||

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