Varuthini Ekadashi 2026: वरूथिनी एकादशी की तिथि, व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व की सम्पूर्ण जानकारी यहाँ पढ़ें।
वरूथिनी एकादशी क्या है? तिथि, मुहूर्त, पारण, कथा, महत्व और मान्यता
प्रणाम मित्रों, आज हम विस्तार से वरूथिनी एकादशी के बारे में जानेंगे। हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को वरूथिनी एकादशी कहा जाता है।
‘वरूथिनी’ शब्द संस्कृत के ‘वरुथिन्‘ से बना है, जिसका अर्थ है ‘प्रतिरक्षक‘, ‘कवच‘ या ‘रक्षा करने वाला‘। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है, जो अपने भक्तों को हर संकट और पाप से बचाते हैं। इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा की जाती है। इसे वरूथिनी ग्यारस के नाम से भी जाना जाता है।
वरूथिनी एकादशी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त
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विवरण (Details) |
तारीख और समय (Date & Time) |
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एकादशी तिथि प्रारंभ |
13 अप्रैल 2026, सुबह 1:16 बजे से |
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एकादशी तिथि समाप्त |
14 अप्रैल 2026, सुबह 1:08 बजे तक |
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व्रत की मुख्य तारीख |
13 अप्रैल 2026 (सोमवार) |
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पारण का समय (Vrat Opening) |
14 अप्रैल 2026, सुबह 06:54 से 08:31 बजे के बीच |
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वरूथिनी एकादशी की पौराणिक कथा
इस एकादशी की कथा पद्म पुराण में वर्णित है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इसका महत्व बताया था।
राजा मान्धाता की कथा
प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नाम के एक अत्यंत प्रतापी, धर्मात्मा और सत्यवादी राजा राज करते थे। उनका अधिकांश समय ईश्वर की भक्ति और तपस्या में व्यतीत होता था। एक बार राजा मान्धाता एक घने जंगल में एकांत स्थान पर बैठकर भगवान के ध्यान में लीन थे। उनका ध्यान इतना गहरा था कि उन्हें बाहरी दुनिया का कोई भान ही नहीं रहा।
तभी अचानक जंगल से एक खूंखार भालू वहाँ आ पहुँचा। भालू ने तपस्या में लीन राजा पर हमला कर दिया और उनके पैर को चबाने लगा। अपार पीड़ा के बावजूद राजा ने न तो उस भालू पर क्रोध किया और न ही कोई शस्त्र उठाया। उन्होंने अपना धैर्य नहीं खोया और अपनी रक्षा के लिए सच्चे हृदय से जगत के पालनहार भगवान विष्णु का स्मरण करने लगे।
भक्त की करुण पुकार सुनकर भगवान श्रीहरि तुरंत वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से उस जंगली भालू का वध कर दिया और अपने प्रिय भक्त के प्राणों की रक्षा की। लेकिन भालू के हमले से राजा का पैर बुरी तरह क्षत-विक्षत हो चुका था, जिसे देखकर राजा मान्धाता अत्यंत दुखी और निराश हो गए।
तब भगवान विष्णु ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, “हे राजन! शोक मत करो। तुम्हारे साथ जो यह दुर्घटना घटी है, वह तुम्हारे ही पूर्व जन्म के संचित पापों का फल है। अब तुम यहां से सीधे मथुरा नगरी जाओ और वहां जाकर मेरे ‘वराह अवतार’ का ध्यान करते हुए विधि-विधान से वरूथिनी एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे सारे पाप कट जाएंगे और तुम्हें पुनः तुम्हारा स्वस्थ शरीर प्राप्त हो जाएगा।”
भगवान की आज्ञा को मान कर राजा मान्धाता मथुरा पहुंचे और वैशाख कृष्ण पक्ष की वरूथिनी एकादशी का पूरी श्रद्धा से व्रत किया। इस महाव्रत के पुण्यों के फलस्वरूप राजा को न केवल उनका सुंदर और संपूर्ण शरीर वापस मिल गया, बल्कि अंतकाल में वे सभी सांसारिक दुखों से मुक्त होकर स्वर्ग लोक को प्राप्त हुए।
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वरूथिनी एकादशी का महत्व
शास्त्रों में वरूथिनी एकादशी का महत्व बहुत ही अधिक बताया गया है।
- तपस्या के समान फल: मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को दस हज़ार वर्षों तक तपस्या करने के बराबर फल प्राप्त होता है।
- मोक्ष की प्राप्ति: यह एकादशी इस लोक में सौभाग्य और सुख प्रदान करने वाली है, और अंत में मनुष्य को मोक्ष (परम गति) प्रदान करती है।
- पापों का नाश: यह व्रत सभी प्रकार के पापों, विशेषकर अनजाने में हुए पापों को नष्ट कर देता है।
- कन्यादान और अन्नदान के बराबर: शास्त्रों में इस व्रत के पुण्य को कन्यादान और अन्नदान के पुण्य के बराबर माना गया है।
- अखंड सौभाग्य: यदि कोई अभागिनी या दुखी विवाहित स्त्री यह व्रत करती है, तो उसे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
- स्वर्ण दान के बराबर: कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय एक मन स्वर्ण दान करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल मात्र वरूथिनी एकादशी का व्रत रखने से मिल जाता है।
3. वरूथिनी एकादशी की मान्यताएँ और नियम
इस व्रत के पालन के लिए पद्म पुराण में कुछ विशेष नियम बताए गए हैं:
- व्रत के दौरान त्याज्य (छोड़ने योग्य) वस्तुएँ
- एकादशी के दिन जुआ खेलना, सोना, पान खाना, दातुन करना, परनिन्दा (चुगली), चोरी, हिंसा, क्रोध और असत्य बोलना त्याग देना चाहिए।
- व्रत के दिन उड़द, मसूर, चना, कोदो, शाक (पत्तेदार सब्ज़ियाँ), और शहद का सेवन नहीं करना चाहिए।
- इस दिन कांसे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए।
- विशेष मान्यताएँ और कार्य
- पूजा: भगवान विष्णु के वराह रूप की पूजा करनी चाहिए और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः” मंत्र का जाप करना चाहिए।
- रात्रि जागरण: इस एकादशी की रात्रि में जागरण करके भगवान मधुसूदन (विष्णु) का पूजन करने से भक्त सब पापों से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त होते हैं।
- दान: इस दिन अन्न दान (अन्नदान को स्वर्ण दान से श्रेष्ठ माना गया है) और विद्यादान का विशेष महत्व है।
- महाप्रभु वल्लभाचार्य जयंती: पुष्टिमार्गीय वैष्णव संप्रदाय के लिए यह तिथि और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दिन महाप्रभु वल्लभाचार्य की जयंती मनाई जाती है।
वरूथिनी एकादशी की पूजा विधि
वरूथिनी एकादशी का व्रत दशमी तिथि (एक दिन पहले) से शुरू होकर द्वादशी तिथि (एक दिन बाद) तक चलता है।
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दशमी तिथि के दिन (व्रत से एक दिन पहले)
- सात्विक भोजन: दशमी के दिन केवल एक बार सात्विक भोजन करें।
- नियम: एकादशी के व्रत में जिन वस्तुओं को त्याज्य बताया गया है (जैसे मसूर दाल, चना, शहद, तेल, कांसे के बर्तन), उनका सेवन दशमी के दिन से ही त्याग दें।
- ब्रह्मचर्य: इस दिन से ब्रह्मचर्य का पालन करें।
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एकादशी तिथि के दिन (व्रत का मुख्य दिन)
प्रातः काल का अनुष्ठान
- जल्दी उठें: सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें।
- संकल्प: स्वच्छ वस्त्र पहनकर, हाथ में जल और पुष्प लेकर भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लें। संकल्प इस प्रकार लें कि आप यह व्रत निर्विघ्न पूरा करेंगे।
- पूजा स्थल की तैयारी: पूजा स्थल को साफ करें। एक चौकी पर पीला या लाल वस्त्र बिछाएँ।
- विष्णु/वराह मूर्ति की स्थापना: भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर (विशेषकर वराह अवतार की) स्थापित करें।
- पंचामृत स्नान: भगवान की मूर्ति को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल का मिश्रण) से स्नान कराएँ।
दिन की पूजा
- वस्त्र और आभूषण: भगवान को पीले रंग के वस्त्र, मुकुट, और आभूषण पहनाएँ।
- तिलक: चंदन या केसर का तिलक लगाएँ।
- पुष्प और माला: उन्हें पीले फूल (जैसे गेंदा या कनेर) और तुलसी पत्र (बिना तोड़े, एक दिन पहले तोड़े गए) की माला अर्पित करें।
- दीप और धूप: शुद्ध घी का दीपक जलाएँ और धूप-अगरबत्ती दिखाएँ।
- भोग/नैवेद्य: फल, मिठाई और विशेष रूप से मौसमी फलों का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल अवश्य रखें।
- मंत्र जाप: हाथ में तुलसी की माला लेकर भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें।
- मुख्य मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
- वराह मंत्र (यदि संभव हो): ॐ नमो भगवते वराहरूपाय भूभुर्वस्वः स्वाहा
- कथा श्रवण: वरूथिनी एकादशी की कथा (राजा मान्धाता की कथा) पढ़ें या सुनें।
- आरती: अंत में कपूर या घी के दीपक से भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्वक आरती करें।
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द्वादशी तिथि के दिन (व्रत का पारण)
- पारण का समय: सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करें। पारण मुहूर्त देखना अत्यंत आवश्यक है।
- द्वादशी की पूजा: प्रातः काल फिर से भगवान विष्णु की संक्षिप्त पूजा करें।
- ब्राह्मण/ज़रूरतमंद को दान: किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद व्यक्ति को अन्न, वस्त्र और यथाशक्ति दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लें।
- पारण: दान के बाद ही व्रत का पारण करें। पारण के लिए सात्विक भोजन (जैसे चावल, दाल आदि) का एक ग्रास ग्रहण करें।
विशेष नोट: पारण से पहले किसी भी स्थिति में व्रत नहीं तोड़ना चाहिए।
वरूथिनी एकादशी से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: 2026 में वरूथिनी एकादशी कब मनाई जाएगी?
उत्तर: वर्ष 2026 में वरूथिनी एकादशी का मुख्य व्रत 13 अप्रैल (सोमवार) को रखा जाएगा। एकादशी तिथि 13 अप्रैल को सुबह 1:16 बजे से प्रारंभ होकर 14 अप्रैल को सुबह 1:08 बजे समाप्त होगी।
प्रश्न 2: वरूथिनी एकादशी के दिन किस देवता की पूजा की जाती है?
उत्तर: इस दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इस विशेष एकादशी पर भगवान विष्णु के ‘वराह अवतार’ की उपासना करने का सर्वाधिक महत्व है।
प्रश्न 3: वरूथिनी एकादशी 2026 के व्रत का पारण (Vrat Opening) समय क्या है?
उत्तर: वरूथिनी एकादशी व्रत का पारण 14 अप्रैल 2026 (मंगलवार) को किया जाएगा। व्रत खोलने का शुभ मुहूर्त सुबह 06:54 बजे से लेकर 08:31 बजे के मध्य रहेगा।
प्रश्न 4: वरूथिनी एकादशी के व्रत में क्या चीजें नहीं खानी चाहिए?
उत्तर: एकादशी के व्रत में अन्न (गेहूं, चावल आदि) का सेवन पूर्णतः वर्जित होता है। इसके अलावा दशमी तिथि से ही उड़द, मसूर, चना, कोदो, शाक (पत्तेदार सब्ज़ियाँ) और शहद का सेवन त्याग देना चाहिए।
प्रश्न 5: वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से क्या फल मिलता है?
उत्तर: शास्त्रों और पद्म पुराण के अनुसार, वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से दस हज़ार वर्षों की तपस्या, अन्नदान, कन्यादान और सूर्यग्रहण के समय किए गए स्वर्ण दान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत अनजाने में हुए पापों का नाश करता है।
प्रश्न 6: क्या वरूथिनी एकादशी में रात्रि जागरण का महत्व है?
उत्तर: जी हाँ, एकादशी के व्रत में रात्रि जागरण अत्यंत फलदायी माना गया है। मान्यता है कि रात में जागकर भगवान विष्णु के मंत्रों (“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः”) का जाप और भजन-कीर्तन करने से परम गति की प्राप्ति होती है।
हरि शरणम्।
श्रीहरि की कृपा आप सभी पर सदा बनी रहे।
