अधिक मास ज्येष्ठ अमावस्या: जानें तिथि, स्नान-दान का महत्व और उपाय
पितृ दोष निवारण और विष्णु कृपा का महासंयोग
साल 2026 में 17 मई से 15 जून तक ज्येष्ठ मास मे अधिक मास का दुर्लभ संयोग बन रहा है, और इस पावन ज्येष्ठ अधिक मास की अमावस्या 15 जून 2026 (सोमवार) को पड़ेगी।
अमावस्या तिथि का प्रारम्भ 14 जून 2026 को दोपहर 12:19 बजे से होगा तथा इसका समापन 15 जून 2026 को प्रातः 08:23 बजे पर होगा।
हिंदू पंचांग में ‘अमावस्या’ की तिथि पितरों (पूर्वजों) को समर्पित होती है। लेकिन वर्ष 2026 में एक अत्यंत दुर्लभ खगोलीय और आध्यात्मिक घटना घटित हो रही है। इस वर्ष ‘ज्येष्ठ’ के दो महीने हैं, जिनमें पहला ‘प्रथम ज्येष्ठ‘ एक ‘अधिक मास‘ (मलमास या पुरुषोत्तम मास) है।
जब कोई अमावस्या ‘अधिक मास‘ में पड़ती है, तो उसे ‘पुरुषोत्तम अमावस्या‘ या ‘मलमास अमावस्या‘ कहा जाता है। यह योग 3 साल (लगभग 36 महीने) में केवल एक बार आता है। सामान्य अमावस्या पर जहां केवल पितरों की शांति की जाती है, वहीं अधिक मास की अमावस्या पर भगवान श्रीहरि विष्णु (पुरुषोत्तम) और पितरों की शक्तियों का अद्भुत मिलन होता है। आइए जानते हैं इस दुर्लभ अमावस्या का रहस्य, इसकी पौराणिक कथा और 33 की संख्या वाले महादान की विधि।
अधिक मास की अमावस्या का महत्व (सामान्य अमावस्या से कैसे अलग है?)
अधिक मास को भगवान श्री विष्णु ने अपना नाम ‘पुरुषोत्तम’ दिया है। इसलिए इस अमावस्या पर किए गए तर्पण और दान का फल सामान्य से कई गुना अधिक मिलता है।
महत्व का क्षेत्र | अधिक मास (पुरुषोत्तम) अमावस्या का प्रभाव |
कठोर पितृ दोष से मुक्ति | यदि पूर्वज किसी घोर पाप के कारण नर्क की यातनाएं भोग रहे हों, तो केवल अधिक मास की अमावस्या का तर्पण ही उन्हें वहां से निकालकर सीधे ‘बैकुंठ’ (गोलोक) ले जा सकता है। |
रुके हुए वंश की वृद्धि | जिन परिवारों में संतान सुख नहीं है या वंश वृद्धि रुक गई है, उनके लिए इस दिन किया गया दान ‘ब्रह्मास्त्र’ के समान काम करता है। |
असाध्य रोगों का शमन | अधिक मास में सूर्य की गति धीमी होती है। इस अमावस्या पर दीप दान करने से घर से लंबी और असाध्य बीमारियां हमेशा के लिए चली जाती हैं। |
आर्थिक दरिद्रता का नाश | चूंकि यह विष्णु जी का महीना है, इसलिए इस दिन पितरों के साथ-साथ मां लक्ष्मी की भी कृपा प्राप्त होती है और कर्ज से मुक्ति मिलती है। |
पौराणिक कथा: राजा चित्रबाहु और अधिक मास अमावस्या का चमत्कार
अधिक मास की अमावस्या के महात्म्य को दर्शाने वाली यह कथा पुराणों में अत्यंत प्रसिद्ध है:
प्राचीन काल में चित्रबाहु नाम के एक राजा थे। वे बहुत वीर और पुण्यात्मा थे, लेकिन उनके जीवन में एक बड़ा दुख था- उनके सभी पुत्र जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे। राजा का वंश आगे नहीं बढ़ पा रहा था। दुखी होकर राजा महर्षि मार्कंडेय के आश्रम पहुंचे और अपनी व्यथा सुनाई।
महर्षि ने अपने ध्यान से देखा और बताया, “हे राजन! तुम्हारे पूर्वजों में से किसी ने घोर पाप किया था, जिसके कारण वे अत्यंत कष्टदायी नर्क में फंसे हुए हैं। उनके इसी भीषण असंतोष (पितृ दोष) के कारण तुम्हारे पुत्र जीवित नहीं बचते। तुमने सामान्य अमावस्या पर कई दान किए हैं, लेकिन यह दोष इतना कठोर है कि वह सामान्य पूजा से नहीं कटेगा।”
राजा ने समाधान पूछा। महर्षि ने कहा, “इस वर्ष ‘अधिक मास‘ (मलमास) आने वाला है। अधिक मास की अमावस्या साक्षात भगवान पुरुषोत्तम का दिन है। तुम उस दिन तीर्थ में स्नान करके अपने पितरों के निमित्त 33 पिंडों का दान करो। विष्णु जी की कृपा से तुम्हारे पितर सीधे मुक्त हो जाएंगे।”
राजा चित्रबाहु ने अधिक मास की अमावस्या आने पर ठीक वैसा ही किया। भगवान विष्णु और पितरों की कृपा से न केवल उनके पूर्वज मुक्त होकर स्वर्ग गए, बल्कि राजा को एक दीर्घायु और तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति भी हुई।
अधिक मास ज्येष्ठ अमावस्या की विशेष पूजा और दान विधि
इस दिन की पूजा में ‘विष्णु’ और ‘पितृ’ दोनों का स्मरण एक साथ किया जाता है। इसकी विधि इस प्रकार है:
- तीर्थ स्नान और पीले वस्त्र: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर जल में गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करें। चूंकि यह पुरुषोत्तम मास है, इसलिए स्नान के बाद सफेद के बजाय पीले रंग के वस्त्र धारण करना अधिक शुभ माना जाता है।
- श्रीहरि और तुलसी पूजा: सबसे पहले घर के मंदिर में भगवान विष्णु (या शालिग्राम) की पूजा करें। उन्हें पीला चंदन, तुलसी दल और पीले फूल अर्पित करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का 108 बार जाप करें।
- दक्षिण दिशा में तर्पण: इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके कुशा (घास) और काले तिल मिले जल से पितरों का तर्पण करें।
- ’33’ की संख्या का महादान: अधिक मास में 33 देवताओं के निमित्त 33 की संख्या में दान करने का विधान है। इस दिन कांसे की थाली में 33 मालपुए, 33 फल या 33 तिल के लड्डू रखकर किसी सुयोग्य ब्राह्मण को दान करें। (इसे अपूप दान भी कहते हैं)।
- पीपल के नीचे दीपदान: शाम के समय पीपल के वृक्ष की जड़ में मीठा जल चढ़ाएं और सरसों के तेल का एक बड़ा चौमुखी दीपक जलाएं। यह दीप पितरों को उनके मार्ग में प्रकाश देता है।
इस दुर्लभ अमावस्या के नियम (क्या करें, क्या न करें)
- मांगलिक कार्य पूर्णतः वर्जित: अधिक मास होने के कारण और अमावस्या तिथि होने के कारण, इस दिन भूलकर भी कोई नया काम (जैसे- नई गाड़ी खरीदना, नींव रखना, सगाई करना) नहीं करना चाहिए।
- अन्न का अपमान न करें: इस दिन घर आए किसी भी भिखारी, साधु या जानवर (कुत्ता, गाय, कौवा) को बिना भोजन कराए न जाने दें।
- पूर्ण सात्विकता: लहसुन, प्याज, अंडा और मांसाहार का सेवन घोर पाप माना जाता है। इस दिन क्रोध करने या किसी की निंदा करने से व्रत का सारा पुण्य नष्ट हो जाता है।
- क्षौर कर्म न करें: इस दिन बाल कटवाना, नाखून काटना या शेविंग करना शास्त्रों में पूरी तरह वर्जित है।
निष्कर्ष
अधिक मास अमावस्या 2026 का दिन हमें यह याद दिलाता है कि जब हमारी समस्याएं बहुत बड़ी हों, तो ब्रह्मांड हमें उन्हें सुलझाने के लिए कुछ विशेष और दुर्लभ अवसर भी प्रदान करता है। यह दिन भगवान श्रीहरि की उस करुणा का प्रतीक है, जो नरक में पड़े जीवों को भी मोक्ष प्रदान कर सकती है। यदि आप भी जीवन में लंबे समय से किसी अज्ञात बाधा, कर्जे या पारिवारिक कलह से जूझ रहे हैं, तो 3 साल में एक बार आने वाली इस पुरुषोत्तम अमावस्या पर किया गया छोटा सा दान और तर्पण आपके जीवन की दिशा बदल सकता है
|| जय श्री हरी विष्णु ||
