श्री विष्णु जी की आरती और विष्णु चालीसा अर्थ सहित पढ़ें। जानें शक्तिशाली मंत्र और लाभ
भगवान विष्णु का संक्षिप्त परिचय
भगवान विष्णु हिंदू धर्म के त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में प्रमुख हैं और उन्हें सृष्टि का ‘पालनहार‘ (Preserver) माना जाता है। जब ब्रह्मा जी संसार की रचना करते हैं, तो भगवान विष्णु उसका सुचारू रूप से संचालन और पालन-पोषण करते हैं।
भगवान विष्णु क्षीरसागर (दूध के सागर) में शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं। उनका स्वरूप अत्यंत शांत और आनंदमयी है। उनके चार हाथ हैं (चतुर्भुज रूप), जिनमें वे शंख (पांचजन्य), चक्र (सुदर्शन), गदा (कौमोदकी) और पद्म (कमल का फूल) धारण करते हैं। उनकी अर्धांगिनी माता लक्ष्मी हैं, जो धन और वैभव की देवी हैं, और उनका वाहन गरुड़ (पक्षियों के राजा) है।
जब-जब पृथ्वी पर पाप, अधर्म और राक्षसों का अत्याचार बढ़ता है, तब-तब धर्म की स्थापना और सज्जनों की रक्षा के लिए भगवान विष्णु अवतार लेते हैं। उनके 10 प्रमुख अवतार (दशावतार) माने गए हैं, जिनमें मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि (भविष्य का अवतार) शामिल हैं।
श्री विष्णु जी की आरती
(ॐ जय जगदीश हरे)
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे…
जो ध्यावै फल पावै, दुख विनसे मन का।
सुख-सम्पत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे…
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे…
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे…
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे…
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे…
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे…
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥
ॐ जय जगदीश हरे…
तन-मन-धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥
ॐ जय जगदीश हरे…
श्री जगदीश जी आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख-सम्पति पावे॥
विष्णु आरती के लाभ: “ॐ जय जगदीश हरे” संभवतः सबसे अधिक गाई जाने वाली आरती है। यह मन के सभी दुखों और विकारों (बुरे विचारों) को नष्ट कर परम शांति देती है। भगवान विष्णु पालनहार हैं, इसलिए आरती गाने से तन (शारीरिक) और मन (मानसिक) के सभी कष्ट तुरंत दूर होते हैं। विष्णु जी की स्तुति से स्वतः ही माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं, जिससे घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। यह आरती मनुष्य को यह सिखाती है कि “सब कुछ ईश्वर का है, मेरा कुछ नहीं” (तेरा तुझको अर्पण), जिससे अहंकार दूर होता है।
श्री विष्णु चालीसा (अर्थ सहित)
श्री विष्णु चालीसा भगवान नारायण की महिमा और उनके अवतारों के चमत्कारों का वर्णन करती है।
॥दोहा॥
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय।
॥ चौपाई ॥
नमो विष्णु भगवान खरारी।
कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी।
त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥
सुन्दर रूप मनोहर सूरत।
सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥
तन पर पीतांबर अति सोहत।
बैजन्ती माला मन मोहत॥
शंख चक्र कर गदा बिराजे।
देखत दैत्य असुर दल भाजे॥
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे।
काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥
संतभक्त सज्जन मनरंजन।
दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन।
दोष मिटाय करत जन सज्जन॥
पाप काट भव सिंधु उतारण।
कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥
करत अनेक रूप प्रभु धारण।
केवल आप भक्ति के कारण॥
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा।
तब तुम रूप राम का धारा॥
भार उतार असुर दल मारा।
रावण आदिक को संहारा॥
आप वराह रूप बनाया।
हरण्याक्ष को मार गिराया॥
धर मत्स्य तन सिंधु बनाया।
चौदह रतनन को निकलाया॥
अमिलख असुरन द्वंद मचाया।
रूप मोहनी आप दिखाया॥
देवन को अमृत पान कराया।
असुरन को छवि से बहलाया॥
कूर्म रूप धर सिंधु मझाया।
मंद्राचल गिरि तुरत उठाया॥
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया।
भस्मासुर को रूप दिखाया॥
वेदन को जब असुर डुबाया।
कर प्रबंध उन्हें ढूँढवाया॥
मोहित बनकर खलहि नचाया।
उसही कर से भस्म कराया॥
असुर जलंधर अति बलदाई।
शंकर से उन कीन्ह लडाई॥
हार पार शिव सकल बनाई।
कीन सती से छल खल जाई॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी।
बतलाई सब विपत कहानी॥
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी।
वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥
देखत तीन दनुज शैतानी।
वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी।
हना असुर उर शिव शैतानी॥
तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे।
हिरणाकुश आदिक खल मारे॥
गणिका और अजामिल तारे।
बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥
हरहु सकल संताप हमारे।
कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे।
दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥
चहत आपका सेवक दर्शन।
करहु दया अपनी मधुसूदन॥
जानूं नहीं योग्य जप पूजन।
होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥
शीलदया सन्तोष सुलक्षण।
विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥
करहुं आपका किस विधि पूजन।
कुमति विलोक होत दुख भीषण॥
करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण।
कौन भांति मैं करहु समर्पण॥
सुर मुनि करत सदा सेवकाई।
हर्षित रहत परम गति पाई॥
दीन दुखिन पर सदा सहाई।
निज जन जान लेव अपनाई॥
पाप दोष संताप नशाओ।
भव-बंधन से मुक्त कराओ॥
सुख संपत्ति दे सुख उपजाओ।
निज चरनन का दास बनाओ॥
निगम सदा ये विनय सुनावै।
पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥
|| समाप्त ||
श्री विष्णु चालीसा का अर्थ
प्रारंभिक दोहा अर्थ: विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय। कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय॥
दोहे का अर्थ: हे भगवान विष्णु! कृपया अपने इस सेवक की विनती को ध्यान लगाकर सुनें। मैं आपकी महिमा का कुछ वर्णन करना चाहता हूँ, कृपया मुझे इसके लिए ज्ञान और सद्बुद्धि प्रदान करें।
चालीसा का विस्तृत भावार्थ (संपूर्ण 40 चौपाइयों का सार):
- स्वरूप और शक्ति: चालीसा की शुरुआत भगवान विष्णु के विराट और सुंदर रूप के वर्णन से होती है। वे चतुर्भुज हैं, उनके हृदय पर भृगु ऋषि के चरण का चिह्न (श्रीवत्स) है और वे शेषनाग पर शयन करते हैं।
- दशावतार का वर्णन: चालीसा में विष्णु जी के विभिन्न अवतारों का विस्तार से वर्णन है। कैसे उन्होंने ‘मत्स्य’ अवतार लेकर प्रलय से वेदों की रक्षा की, ‘वराह’ रूप में पृथ्वी को समुद्र से निकाला, और ‘नृसिंह’ अवतार लेकर अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और हिरण्यकशिपु का वध किया।
- राम और कृष्ण अवतार: इसमें बताया गया है कि त्रेता युग में श्रीराम का अवतार लेकर उन्होंने रावण का संहार किया और द्वापर युग में श्रीकृष्ण बनकर कंस को मारा तथा महाभारत के युद्ध में गीता का ज्ञान देकर धर्म की स्थापना की।
- भक्तों की रक्षा: भगवान विष्णु हमेशा अपने भक्तों की पुकार सुनते हैं। जब ‘गजेंद्र’ (हाथी) को मगरमच्छ ने पकड़ लिया था और उसने विष्णु जी को पुकारा, तो उन्होंने तुरंत आकर उसके प्राण बचाए। भक्त ध्रुव को उन्होंने अटल तारा बना दिया।
- फलश्रुति (पाठ का फल): अंत में बताया गया है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन से श्री विष्णु चालीसा का नित्य पाठ करता है, उसके जीवन से दरिद्रता, पाप और भय हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं। उसे सांसारिक सुख मिलता है और मृत्यु के बाद वह बैकुंठ धाम (विष्णु जी के लोक) को प्राप्त होता है।
भगवान विष्णु के प्रमुख मंत्र और उनके अर्थ
द्वादशाक्षर मंत्र (सबसे शक्तिशाली और मुक्तिदायक मंत्र)
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
अर्थ: मैं भगवान वासुदेव (विष्णु/कृष्ण जो हर कण में वास करते हैं) को नमस्कार करता हूँ। यह एक महामंत्र है जो परम शांति, मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। भक्त प्रह्लाद और ध्रुव ने इसी मंत्र का जाप किया था।
विष्णु ध्यान मंत्र (शांति और सुरक्षा के लिए)
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ: जिनकी आकृति अत्यंत शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि से कमल उत्पन्न हुआ है (जिस पर ब्रह्मा जी बैठे हैं), जो देवताओं के ईश्वर हैं, जो संपूर्ण विश्व के आधार हैं, जो आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त हैं, जिनका रंग बादलों के समान सांवला है, जिनके सभी अंग सुंदर हैं, जो माता लक्ष्मी के स्वामी हैं, जिनके नेत्र कमल के समान हैं, जिन्हें योगी ध्यान द्वारा प्राप्त करते हैं, जो संसार के सभी जन्म-मरण के भय को हरने वाले हैं, ऐसे सभी लोकों के एकमात्र स्वामी भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
विष्णु गायत्री मंत्र (सकारात्मक ऊर्जा और सफलता के लिए)
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम भगवान नारायण को जानते हैं, हम वासुदेव का ध्यान करते हैं। हे भगवान विष्णु, कृपया हमारी बुद्धि को प्रकाशित करें और हमें धर्म और सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ाएं।
मंगलाचरण मंत्र (हर शुभ कार्य के आरंभ के लिए)
मंगलम् भगवान विष्णुः, मंगलम् गरुड़ध्वजः।
मंगलम् पुण्डरीकाक्षः, मंगलाय तनो हरिः॥
अर्थ: भगवान विष्णु अत्यंत मंगलकारी हैं, जिनके रथ की ध्वजा (झंडे) पर गरुड़ का चिह्न है, वे भी मंगलकारी हैं। कमल के समान नेत्रों वाले भगवान मंगलकारी हैं, और भगवान हरि (विष्णु) संपूर्ण मंगलों का निवास स्थान हैं। (यह मंत्र विवाह और पूजा-पाठ की शुरुआत में बोला जाता है)।
|| हरी शरणम् ||
