देवशयनी एकादशी: चातुर्मास का आरंभ, जानें तिथि, पारण समय, कथा और पूजा विधि
देवशयनी एकादशी शनिवार, जुलाई 25, 2026 को मनाई जाएगी।
एकादशी तिथि प्रारम्भ: 24 जुलाई 2026, प्रातः 09:12 बजे ।
एकादशी तिथि समाप्त: 25 जुलाई 2026, प्रातः 11:34 बजे ।
पारण (व्रत तोड़ने का) समय:
26 जुलाई 2026, प्रातः 05:39 बजे से 08:22 बजे तक ।
द्वादशी समाप्ति समय: दोपहर 01:57 बजे ।
हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का अत्यंत विशेष महत्व है, और जब बात ‘देवशयनी एकादशी‘ (Devshayani Ekadashi) की हो, तो इसका आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इसे आषाढ़ी एकादशी, हरिशयनी एकादशी और पद्मनाभा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
हिन्दू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि इस पावन दिन से सृष्टि के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु चार महीनों के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। आइए इस महाव्रत के महत्व, पौराणिक कथा, मान्यताओं और पूजा विधि को विस्तार से समझते हैं।
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पौराणिक कथा (राजा मांधाता की कहानी)
देवशयनी एकादशी की कथा का वर्णन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था।
कथा संक्षेप में:
सतयुग में मांधाता नाम के एक अत्यंत धर्मात्मा और प्रजावत्सल चक्रवर्ती राजा थे। वे अपनी प्रजा को संतान की तरह मानते थे। एक बार उनके राज्य में लगातार तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, जिससे भयंकर अकाल पड़ गया। फसलें सूख गईं, और जनता भूख-प्यास से व्याकुल हो गई। राजा मांधाता बहुत दुखी हुए और इस विपत्ति से निकलने का मार्ग खोजने के लिए वन में निकल पड़े।
घूमते-घूमते वे अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुंचे। राजा ने उनसे अकाल का कारण और निवारण पूछा। महर्षि अंगिरा ने राजा से कहा कि यह सतयुग है, और यहां छोटे से पाप का भी बड़ा दंड मिलता है। उन्होंने राजा को सलाह दी कि वे अपने राज्य में आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का विधि-विधान से व्रत करें।
राजा मांधाता ने वापस लौटकर अपनी पूरी प्रजा के साथ श्रद्धापूर्वक यह व्रत किया, और विधि-पूर्वक भगवान विष्णु की पूजा की। व्रत के प्रभाव से राज्य में मूसलधार वर्षा हुई, धरती हरी-भरी हो गई और प्रजा के सारे कष्ट दूर हो गए। तभी से इस एकादशी का महत्व और बढ़ गया।
देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व (Significance)
- चातुर्मास का आरंभ: इस दिन से चातुर्मास (चार महीने का विशेष काल) शुरू हो जाता है। ये चार महीने- सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक होते हैं। इन महीनों में साधक अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखकर तप और ईश्वर की आराधना करते हैं।
- भगवान शिव को सृष्टि का भार: मान्यता है कि जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर शयन करने चले जाते हैं, तब इन चार महीनों के लिए सृष्टि के संचालन का पूरा भार भगवान शिव (महादेव) के हाथों में आ जाता है। इसीलिए चातुर्मास का पहला महीना (सावन) शिव जी को समर्पित होता है।
- पापों का नाश: पद्म पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति देवशयनी एकादशी का व्रत पूरे नियम और निष्ठा के साथ करता है, उसके जाने-अनजाने में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के पश्चात उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
प्रमुख मान्यताएं और नियम
- मांगलिक कार्यों पर रोक: भगवान विष्णु के शयन काल में चले जाने के कारण, देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक सभी प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्य (जैसे विवाह, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश आदि) वर्जित माने जाते हैं।
- सात्विक जीवन: चातुर्मास के दौरान साधकों को तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज) का पूरी तरह से त्याग कर देना चाहिए और सादा जीवन व्यतीत करना चाहिए।
- भूमि पर शयन: कुछ विशेष तपस्वी और भक्त इन चार महीनों में पलंग का त्याग कर देते हैं और केवल भूमि पर बिस्तर लगाकर सोते हैं।
देवशयनी एकादशी सम्पूर्ण पूजा विधि
यह व्रत मुख्य रूप से दो दिनों तक चलता है: दशमी (एक दिन पहले) और एकादशी (व्रत का दिन)।
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दशमी की रात्रि की तैयारी (Preparation on Dashami)
- सात्विक भोजन: एकादशी से एक दिन पहले (दशमी तिथि को) केवल सात्विक भोजन करें। लहसुन, प्याज, मांस, और तामसिक भोजन का त्याग करें।
- ब्रह्मचर्य: दशमी की रात्रि से ही ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- बिस्तर का त्याग: यदि संभव हो, तो दशमी की रात को भूमि पर शयन (सोना) करें।
- तैयारी: पूजा की सभी सामग्री एकत्रित करके रख लें।
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एकादशी के दिन की पूजा विधि (Main Rituals)
अ. सुबह की क्रियाएँ
- जल्दी उठना: सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
- संकल्प: स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हाथ में जल लेकर भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें कि आप पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ यह व्रत रखेंगे और नियमों का पालन करेंगे।
- पूजा स्थल: घर के पूजा स्थल या मंदिर को साफ करें। यदि आप भगवान विष्णु की विशेष मूर्ति या चित्र स्थापित कर रहे हैं, तो उसे गंगाजल से शुद्ध करें।
ब. भगवान विष्णु की पूजा
- स्थापना: एक चौकी या पटे पर पीला वस्त्र बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु या श्री कृष्ण की मूर्ति/चित्र स्थापित करें।
- शोड़षोपचार: भगवान का ध्यान करते हुए षोडशोपचार (सोलह प्रकार की सामग्री) से पूजन शुरू करें:
- जल: भगवान को आचमन (जल पिलाना) कराएं और स्नान कराएं (यदि मूर्ति छोटी हो)।
- वस्त्र: पीला या नया वस्त्र अर्पित करें।
- पुष्प: पीले फूल, माला और विशेष रूप से तुलसी दल (पत्ते) अर्पित करें। तुलसी दल इस पूजा में अनिवार्य है।
- तिलक: चंदन या रोली का तिलक लगाएं।
- धूप-दीप: धूप और घी का दीपक जलाएं।
- नैवेद्य (भोग): फल, मिश्री, मिठाई, या दूध से बनी सात्विक वस्तुएं अर्पित करें। चावल और अन्न का भोग न लगाएं।
- अर्घ्य: भगवान को जल अर्पित करें।
- कथा श्रवण: एकादशी व्रत की देवशयनी कथा (राजा मांधाता की कथा) पढ़ें या सुनें।
- मंत्र जाप: भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें।
जैसे: || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
स. शयन की विधि (भगवान को सुलाना)
देवशयनी एकादशी की पूजा का यह सबसे महत्वपूर्ण चरण है:
- शयन की तैयारी: एक सुंदर और छोटा पलंग (बिस्तर) तैयार करें। यदि पलंग नहीं है, तो एक आसन या चौकी पर नरम वस्त्र बिछाकर व्यवस्था करें।
- योग निद्रा: पूजा पूर्ण होने के बाद, भगवान विष्णु की मूर्ति को आदर सहित उस पलंग पर शयन मुद्रा (सोने की अवस्था) में रखें।
- प्रार्थना: उनसे प्रार्थना करें कि वे चार माह के लिए योग निद्रा में लीन होकर सृष्टि का कल्याण करें।
- पर्दा: कई स्थानों पर भगवान के शयन के बाद, उस स्थान पर चार माह के लिए पर्दा लगा दिया जाता है, ताकि शयन में विघ्न न हो।
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व्रत और उपवास
- जल और फलाहार: एकादशी का व्रत निराहार (बिना अन्न-जल) रखा जाता है, लेकिन यदि स्वास्थ्य अनुमति न दे, तो आप फलाहार कर सकते हैं। फलाहार में नमक का प्रयोग न करें (यदि करना हो तो सेंधा नमक प्रयोग करें)।
- जागरण: रात्रि के समय जागरण करके भगवान विष्णु के भजन, कीर्तन और मंत्रों का जाप करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है।
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द्वादशी को पारण (Breaking the Fast)
- पारण का समय: एकादशी के अगले दिन, द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में व्रत खोलना (पारण करना) चाहिए।
- ब्राह्मण भोजन: पारण से पहले किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं या यथाशक्ति दान-दक्षिणा दें।
- व्रत खोलना: चावल या किसी सात्विक अन्न का एक दाना मुंह में डालकर व्रत का पारण करें। इसके बाद सामान्य भोजन कर सकते हैं।
ध्यान दें: पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अनिवार्य है।
यह व्रत विधि-विधान से करने पर व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
|| हरी शरणम् ||
