कजरी तीज: अखंड सौभाग्य, सत्तू का स्वाद और नीम की पूजा का महापर्व
कजरी तीज सोमवार, 31 अगस्त 2026 को मनाई जाएगी।
तृतीया तिथि का प्रारम्भ 30 अगस्त 2026 को प्रातः 09:36 बजे से होगा।
तृतीया तिथि का समापन 31 अगस्त 2026 को प्रातः 08:50 बजे पर होगा।
सावन के महीने में आने वाली ‘हरियाली तीज’ के ठीक पंद्रह दिन बाद, भाद्रपद (भादों) मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को एक और अत्यंत महत्वपूर्ण तीज मनाई जाती है, जिसे ‘कजरी तीज‘ (Kajari Teej) कहा जाता है।
उत्तर भारत, विशेषकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में इस पर्व की बहुत धूम होती है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसे ‘बड़ी तीज‘, ‘सातुड़ी तीज‘ और ‘कजली तीज‘ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए और कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए निर्जला (बिना जल के) उपवास रखती हैं।
आइए, इस अनूठे पर्व के महत्व, मान्यताओं, पूजा विधि और पौराणिक कथा को विस्तार से समझते हैं
विवरण | तथ्य |
महीना | भाद्रपद (भादों) |
तिथि | |
मुख्य पूजा | |
विशेषता | व्रत, कजली (नीमड़ी माता) की पूजा, झूले, और गीत (कजरी) गाना |
कजरी तीज की पौराणिक व्रत कथा (सत्तू की कथा)
कजरी तीज पर कई कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन ‘सत्तू’ और एक गरीब ब्राह्मण-ब्राह्मणी की यह कथा सबसे अधिक सुनी जाती है:
प्राचीन काल में एक गाँव में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण और उसकी पत्नी रहते थे। वे इतने गरीब थे कि कई बार उन्हें भूखे ही सोना पड़ता था। भाद्रपद मास की कजरी तीज का दिन आया। ब्राह्मणी ने कजरी तीज का व्रत रखा था। उसने अपने पति से कहा, “हे स्वामी! आज मेरा तीज का व्रत है। मुझे अपना व्रत खोलने के लिए चने का सत्तू चाहिए। आप कहीं से भी सत्तू का प्रबंध कर दीजिए।”
ब्राह्मण बहुत परेशान हुआ, क्योंकि उसके पास पैसे नहीं थे। उसने कहा, “मैं सत्तू कहाँ से लाऊँ? मेरे पास तो एक फूटी कौड़ी भी नहीं है।” लेकिन ब्राह्मणी ने जिद पकड़ ली कि वह सत्तू से ही व्रत खोलेगी।
अपनी पत्नी की जिद और व्रत की निष्ठा को देखकर ब्राह्मण रात के समय गाँव के एक धनी साहूकार की दुकान पर गया। उसने चुपके से दुकान का ताला तोड़ा और भीतर घुस गया। उसने वहाँ से केवल सवा किलो चने का सत्तू लिया और मुड़ने ही वाला था कि दुकान के नौकरों की नींद खुल गई। उन्होंने शोर मचा दिया और साहूकार ने ब्राह्मण को पकड़ लिया।
साहूकार ने क्रोधित होकर कहा, “तू चोरी करता है! मैं तुझे राजा के पास ले जाऊँगा।” ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर रोते हुए कहा, “सेठ जी, मैं चोर नहीं हूँ। मैं बहुत गरीब हूँ। मेरी पत्नी ने कजरी तीज का व्रत रखा है और उसे पारण के लिए सत्तू चाहिए था। इसलिए मैंने केवल सवा किलो सत्तू ही लिया है। आप चाहें तो मेरी तलाशी ले लें।”
ब्राह्मण की सच्चाई और उसकी पत्नी की व्रत के प्रति श्रद्धा देखकर सेठ का हृदय पिघल गया। सेठ ने कहा, “आज से तुम्हारी पत्नी मेरी धर्म की बहन है।” सेठ ने उस ब्राह्मण को न केवल सत्तू दिया, बल्कि बहुत सारा धन, वस्त्र, आभूषण और सुहाग की सामग्री देकर पूरे सम्मान के साथ विदा किया।
ब्राह्मणी ने सेठ द्वारा दिए गए सत्तू से अपनी पूजा संपन्न की और चंद्र देव को अर्घ्य देकर अपना व्रत खोला। कजरी माता की कृपा से उस गरीब ब्राह्मण परिवार के दिन फिर गए और वे सुख-समृद्धि के साथ जीवन व्यतीत करने लगे।
मान्यता:
इस कथा से यह मान्यता जुड़ी है कि कजरी तीज का व्रत करने वाली महिलाओं के जीवन में भगवान शिव और माता पार्वती सभी अभावों को दूर करते हैं और उनका वैवाहिक जीवन सुखी होता है।
कजरी तीज का महत्व
- अखंड सौभाग्य: इस व्रत को विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए रखती हैं।
- कुँवारी कन्याएँ: अविवाहित लड़कियां भी यह व्रत अच्छे पति की कामना के लिए रखती हैं।
- प्रकृति से जुड़ाव: यह त्योहार वर्षा ऋतु में आता है। इस दिन नीमड़ी माता (नीम के पेड़) की पूजा की जाती है, जो पर्यावरण और प्रकृति के प्रति सम्मान को दर्शाता है।
- संस्कृति और लोकगीत: इस अवसर पर महिलाएं सामूहिक रूप से एकत्र होती हैं, कजरी लोकगीत गाती हैं, और झूला झूलती हैं, जिससे सामाजिक सद्भाव और मेल-मिलाप बढ़ता है।
कजरी तीज की प्रमुख मान्यताएं और परंपराएं
इस त्योहार से जुड़ी कुछ बेहद अनूठी और लोक-परंपराएं हैं, जो इसे अन्य व्रतों से अलग बनाती हैं:
- सत्तू का विशेष महत्व (सातुड़ी तीज): इस दिन गेहूँ, जौ, चना या चावल के सत्तू में घी और मेवे मिलाकर विशेष प्रकार के पकवान (पिंड या लड्डू) बनाए जाते हैं। इसी कारण इसे ‘सातुड़ी तीज’ कहा जाता है। पूजा के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर इसी सत्तू से व्रत खोला जाता है।
- नीम के पेड़ की पूजा: कजरी तीज पर विशेष रूप से नीम माता (नीम के पेड़) की पूजा की जाती है। नीम को आरोग्य और शीतलता का प्रतीक माना गया है।
- कजरी गीत और झूला: बारिश के मौसम में गाए जाने वाले लोकगीतों को ‘कजरी’ कहा जाता है। इस दिन महिलाएं पेड़ों पर झूला झूलती हैं और सावन-भादों के मधुर कजरी गीत गाती हैं।
- गौ माता की पूजा: इस दिन गाय की पूजा करने और उसे आटे की लोई में सत्तू व गुड़ रखकर खिलाने की भी विशेष मान्यता है।
कजरी तीज की संपूर्ण पूजा विधि
कजरी तीज का व्रत निर्जला रखा जाता है और शाम के समय चंद्रमा के दर्शन के बाद ही पारण (व्रत खोलना) किया जाता है। इसकी पूजा विधि इस प्रकार है:
- स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर सुहाग के रंग जैसे लाल, पीला या हरा) धारण करें। पूर्ण सोलह श्रृंगार करें और निर्जला व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल की तैयारी: शाम के समय पूजा के लिए घर के आंगन या बालकनी में जहाँ से चंद्रमा दिखाई दे, वहाँ दीवार के सहारे मिट्टी या गोबर से एक छोटा सा तालाब (पाल) बनाएं।
- नीम की टहनी की स्थापना: उस मिट्टी के तालाब के पास नीम की एक टहनी (डाल) रोप दें। यह ‘नीम माता’ का स्वरूप मानी जाती है।
- अभिषेक और श्रृंगार: नीम माता और उस तालाब में कच्चा दूध और जल डालें। नीम की टहनी को कुमकुम, हल्दी, मेहंदी, मोली (कलावा) और सुहाग की सामग्री अर्पित करें।
- सत्तू का भोग: पूजा में सत्तू के बने लड्डू, फल और मिठाई का भोग लगाएं।
- कथा और आरती: पूजा स्थल पर बैठकर कजरी तीज की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। इसके बाद आरती करें।
- चंद्रमा को अर्घ्य और पारण: रात में चंद्रोदय होने पर, चंद्रमा को जल और दूध से अर्घ्य दें। इसके बाद सत्तू खाकर अपना व्रत पूर्ण करें।
निष्कर्ष
कजरी तीज का त्योहार हमें यह संदेश देता है कि वैवाहिक जीवन में प्रेम, त्याग और एक-दूसरे के प्रति समर्पण ही सबसे बड़ा धन है। माता पार्वती और शिव जी का आशीर्वाद, कजरी गीतों की मिठास और नीम की शीतलता इस त्योहार को भारतीय संस्कृति का एक अनमोल हिस्सा बनाते हैं। सच्ची श्रद्धा और निर्मल मन से किया गया कजरी तीज का व्रत जीवन के सभी अंधकारों को दूर कर घर-आंगन को खुशियों से रोशन कर देता है।
|| हर हर महादेव ||
