माता पार्वती जयंती: तिथि, कथा, महत्व, मान्यताएं और पूजा विधि
माता पार्वती जयंती मंगलवार, 21 जुलाई 2026 ।
अष्टमी तिथि प्रारम्भ: 21 जुलाई 2026, प्रातः 04:02 बजे ।
अष्टमी तिथि समाप्त: 22 जुलाई 2026, प्रातः 05:16 बजे ।
सनातन धर्म में माता पार्वती को शक्ति, प्रेम, समर्पण और अखंड सौभाग्य की सर्वोच्च देवी माना गया है। वह भगवान शिव की अर्धांगिनी और संपूर्ण ब्रह्मांड की माता (जगदंबा) हैं। जिस पावन दिन आदिशक्ति ने हिमालय राज के घर ‘पार्वती’ के रूप में अवतार लिया था, उस दिन को पार्वती जयंती के रूप में बड़े ही हर्षोल्लास और भक्ति-भाव के साथ मनाया जाता है।
यह पर्व मुख्य रूप से महिलाओं के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
आइए, इस पावन अवसर पर माता पार्वती के जन्म की कथा, इस दिन का महत्व, मान्यताएं और पूजा विधि को विस्तार से जानते हैं।
माता पार्वती के जन्म की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं (शिव पुराण) के अनुसार, माता पार्वती आदिशक्ति का ही स्वरूप हैं। अपने पूर्व जन्म में वह प्रजापति दक्ष की पुत्री ‘सती’ थीं और उनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। जब दक्ष ने अपने यज्ञ में भगवान शिव का अपमान किया, तो माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए।
सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव गहरे वैराग्य में चले गए और उन्होंने समाधि ले ली। उधर, ‘तारकासुर’ नामक एक भयंकर राक्षस ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। तारकासुर को वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल भगवान शिव का पुत्र ही कर सकता है।
चूंकि शिवजी समाधि में थे, इसलिए सभी देवता घबराकर आदिशक्ति की शरण में गए और उनसे अवतार लेने की प्रार्थना की। देवताओं की पुकार सुनकर माता आदिशक्ति ने पर्वतों के राजा ‘हिमालय‘ (हिमवान) और उनकी पत्नी ‘मैनावती‘ के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण ही उनका नाम ‘पार्वती‘ (पर्वत की पुत्री) पड़ा।
बड़ी होने पर माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए अन्न-जल त्याग कर वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्या की। उनकी इस निर्मल भक्ति और तप से प्रसन्न होकर अंततः भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया और बाद में शिव-पार्वती के पुत्र ‘कार्तिकेय’ ने तारकासुर का वध किया।
पार्वती जयंती का महत्व
माता पार्वती भगवान शिव की शक्ति हैं। शिव यदि ‘शव’ से ‘शिव’ बनते हैं, तो वह केवल आदिशक्ति के कारण। पार्वती जयंती का व्रत और पूजा जीवन में अनेक प्रकार के सुख लेकर आती है:
- अखंड सौभाग्य: सुहागिन महिलाएं यह व्रत अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन में प्रेम बनाए रखने के लिए करती हैं।
- मनचाहे वर की प्राप्ति: अविवाहित कन्याएं यदि इस दिन सच्चे मन से माता पार्वती की उपासना करती हैं, तो उन्हें भगवान शिव के समान ही योग्य और मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त होता है।
- परिवार में सुख-शांति: माता पार्वती ‘गृहस्थ जीवन’ की आदर्श देवी हैं। उनकी पूजा से घर-क्लेश दूर होते हैं और परिवार में शांति व समृद्धि का वास होता है।
- संतान सुख: इस दिन की गई पूजा से निसंतान दंपत्तियों को सुयोग्य संतान की प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।
प्रमुख मान्यताएं
- सुहाग सामग्री का दान: इस दिन सुहागिन महिलाओं द्वारा माता पार्वती को लाल जोड़ा, सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां और मेहंदी (सोलह श्रृंगार) अर्पित करने की विशेष मान्यता है। बाद में इसे किसी ब्राह्मण स्त्री या जरूरतमंद सुहागिन को दान कर दिया जाता है।
- गौरी-शंकर की संयुक्त पूजा: मान्यता है कि माता पार्वती की पूजा कभी भी अकेले नहीं करनी चाहिए। भगवान शिव और माता पार्वती की एक साथ पूजा करने से ही व्रत का पूर्ण फल मिलता है।
पार्वती जयंती की सरल पूजा विधि
पार्वती जयंती के दिन प्रातः काल से ही व्रत और पूजा का विधान है। आप घर पर ही इस सरल विधि से पूजा कर सकते हैं:
- स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ (लाल या पीले रंग के) वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल और पुष्प लेकर व्रत एवं पूजा का संकल्प लें।
- चौकी सजाएं: घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में एक साफ चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। साथ ही प्रथम पूज्य भगवान गणेश को भी विराजमान करें।
- अभिषेक और श्रृंगार: शिव-पार्वती को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं। माता पार्वती को लाल चुनरी ओढ़ाएं और सोलह श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें। शिव जी को भस्म, चंदन और बेलपत्र चढ़ाएं।
- पुष्प और नैवेद्य: माता को लाल पुष्प (विशेषकर गुड़हल या गुलाब) अति प्रिय हैं। उन्हें पुष्प, अक्षत, धूप और दीप अर्पित करें। भोग के रूप में खीर, हलवा या मौसमी फलों का नैवेद्य लगाएं।
- मंत्र जाप: पूजा के दौरान रुद्राक्ष या कमलगट्टे की माला से “ॐ पार्वत्यै नमः” या “ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
- आरती: अंत में माता पार्वती और भगवान शिव की आरती करें। पूजा में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें और परिवार में प्रसाद का वितरण करें।
निष्कर्ष
पार्वती जयंती का दिन केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह नारी शक्ति की दृढ़ता, तपस्या और प्रेम का प्रतीक है। माता पार्वती का जीवन हमें यह सिखाता है कि यदि लक्ष्य के प्रति सच्चा समर्पण और अटूट विश्वास हो, तो दुनिया की कोई भी शक्ति आपको सफल होने से नहीं रोक सकती। इस दिन सच्चे मन से की गई आराधना जीवन के हर अंधेरे को दूर कर सुख और सौभाग्य का प्रकाश लाती है।
|| हर हर महादेव ||
|| जा माता पार्वती ||
