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अनंत चतुर्दशी: भगवान विष्णु के 'अनंत' स्वरूप की आराधना और 14 गांठों वाले सूत्र का महापर्व

वर्ष 2026 अनन्त चतुर्दशी: शुक्रवार, 25 सितम्बर 2026 को मनाई जाएगी

अनन्त चतुर्दशी पूजा मुहूर्त: 06:11 बजे से 11:06 बजे रात्रि तक

पूजा की कुल अवधि: 16 घंटे 55 मिनट

चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ: 24 सितम्बर 2026 को रात्रि 11:18 बजे

चतुर्दशी तिथि समाप्त: 25 सितम्बर 2026 को रात्रि 11:06 बजे

भाद्रपद (भादों) मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि हिंदू धर्म में दो अत्यंत महत्वपूर्ण कारणों से जानी जाती है- पहला, इस दिन 10 दिवसीय गणेशोत्सव का समापन यानी गणेश विसर्जन होता है और दूसरा, यह दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के ‘अनंत’ (जिसका कोई अंत न हो) स्वरूप की पूजा के लिए समर्पित है। इसी पवित्र दिन को अनंत चतुर्दशी‘ (Anant Chaturdashi) कहा जाता है।

जहाँ एक ओर ढोल-नगाड़ों के साथ गणपति बाप्पा को विदा किया जाता है, वहीं दूसरी ओर शांति और श्रद्धा के साथ भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए बांह (हाथ) पर 14 गांठों वाला अनंत सूत्र‘ (पवित्र धागा) बांधा जाता है। आइए, इस चमत्कारी और संकटमोचक व्रत के महत्व, 14 गांठों के रहस्य, पौराणिक कथा और पूजा के नियमों को विस्तार से समझते हैं।

Anant Chaturdashi Vrat puja

अनंत चतुर्दशी क्या है? (14 गांठों का रहस्य)

‘अनंत’ भगवान विष्णु का ही एक नाम है। ‘अनंत’ का अर्थ है वह परम सत्ता जिसका न कोई आदि (शुरुआत) है और न ही कोई अंत।

इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है और सूत या रेशम के धागे को हल्दी या कुमकुम में रंगकर उसमें 14 गांठे लगाई जाती हैं। इस धागे को ‘अनंत सूत्र’ कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार, ये 14 गांठे भगवान विष्णु द्वारा रचे गए 14 लोकों (भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक, अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल) का प्रतीक हैं। कुछ मान्यताओं में इसे भगवान विष्णु के 14 प्रमुख अवतारों का प्रतीक भी माना जाता है।

 

अनंत चतुर्दशी का अर्थ

  • अनंत: ‘अनंत’ भगवान विष्णु का ही एक नाम है, जिसका अर्थ है—शाश्वत, जिसका न आदि है और न अंत। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा की जाती है।
  • गणेश विसर्जन: इसी दिन भक्त अपने प्रिय गणपति बप्पा को जल में विसर्जित करके विदा करते हैं, इस प्रार्थना के साथ कि वे अगले वर्ष जल्दी आएं।

अनंत चतुर्दशी की पौराणिक व्रत कथा (सुशीला और कौण्डिन्य की कथा)

इस व्रत से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा सुशीला और कौंडिन्य ऋषि की है:

सुशीला का व्रत: सुशीला एक ब्राह्मण कन्या थी, जिसका विवाह कौंडिन्य ऋषि से हुआ। वे बहुत गरीब थे। एक बार सुशीला ने देखा कि कुछ महिलाएं नदी किनारे ‘अनंत भगवान’ की पूजा कर रही हैं और हाथ में 14 गांठ वाला डोरा (अनंत सूत्र) बांध रही हैं। पूछने पर पता चला कि इससे दरिद्रता दूर होती है। सुशीला ने भी विधि-विधान से पूजा की और डोरा हाथ में बांध लिया।

कौंडिन्य का क्रोध: जब सुशीला घर लौटीं, तो ऋषि कौंडिन्य ने उनके हाथ में बंधा धागा देखा। उन्हें लगा कि यह कोई जादू-टोना है। उन्होंने क्रोध में वह धागा तोड़कर आग में डाल दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई और वे दाने-दाने को मोहताज हो गए।

पश्चाताप और अनंत की खोज: कौंडिन्य को अपनी गलती का अहसास हुआ कि उन्होंने साक्षात भगवान अनंत का अपमान किया है। वे प्रायश्चित करने जंगल में निकल पड़े। रास्ते में उन्होंने आम के पेड़, गाय, बैल, और पुष्करिणी (तालाब) से पूछा- “क्या तुमने अनंत को देखा है?” पर किसी ने उत्तर नहीं दिया। निराश होकर जब वे प्राण त्यागने लगे, तब भगवान विष्णु एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए और उन्हें अपना अनंत स्वरूप दिखाया।

वरदान: भगवान ने कहा, “तुमने अहंकारवश मेरे अनंत सूत्र का अपमान किया था। अब तुम 14 वर्षों तक यह व्रत करो।” ऋषि ने ऐसा ही किया और उन्हें अपना खोया हुआ वैभव और सम्मान पुनः प्राप्त हुआ।

 

अनंत चतुर्दशी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

मान्यता है कि जब इंसान के जीवन में चारों तरफ से संकट आ जाएं और निकलने का कोई रास्ता न दिखे, तब अनंत चतुर्दशी का व्रत और अनंत सूत्र अचूक फल देता है।

  • पांडवों को मिला था खोया हुआ राज्य: महाभारत काल में जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हारकर जंगल-जंगल भटक रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को अपना खोया हुआ राज्य और वैभव वापस पाने के लिए इसी ‘अनंत चतुर्दशी’ का व्रत करने की सलाह दी थी।
  • दरिद्रता और कष्टों का नाश: बांह पर अनंत सूत्र बांधने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली हर बाधा, बीमारी और दरिद्रता (गरीबी) नष्ट हो जाती है। यह धागा एक रक्षा-कवच के रूप में कार्य करता है।

पूजा विधि और अनंत सूत्र बांधने के नियम

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा अत्यंत श्रद्धा भाव से की जाती है:

  1. स्नान और कलश स्थापना: सुबह स्नानादि करके व्रत का संकल्प लें। एक चौकी पर कलश स्थापित करें और उस पर भगवान विष्णु की तस्वीर या शेषनाग की शय्या पर लेटे श्रीहरि की मूर्ति रखें। कलश के पास कुशा (पवित्र घास) रखें।
  2. अनंत सूत्र की तैयारी: रेशम या सूत के धागे को कुमकुम, हल्दी और केसर से रंगें। उसमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर 14 गांठे लगाएं। इस धागे को भगवान विष्णु के चरणों में रखें।
  3. पूजन: भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं। चंदन, पीले पुष्प, नैवेद्य (मीठी रोटियां या पुए) और तुलसी दल अर्पित करें।
  4. धागा बांधना: पूजा के बाद अनंत देव का ध्यान करते हुए पुरुष अपने दाएं (Right) हाथ की बांह (भुजा) पर और महिलाएं अपने बाएं (Left) हाथ की बांह पर इस अनंत सूत्र को बांध लें।
  5. कथा का पाठ: धागा बांधने के बाद अनंत चतुर्दशी की व्रत कथा (सुशीला और कौण्डिन्य की कथा) अवश्य सुनें या पढ़ें।
  6. यह धागा अगले साल अनंत चतुर्दशी तक बांधा जा सकता है या फिर 14 दिन बाद इसे बहते जल में विसर्जित किया जा सकता है।

निष्कर्ष

अनंत चतुर्दशी का व्रत हमें यह सिखाता है कि जब मनुष्य को सुख-संपत्ति प्राप्त होती है, तो उसे अहंकार नहीं करना चाहिए। कौण्डिन्य मुनि का अहंकार ही उनके पतन का कारण बना। भगवान का ‘अनंत’ स्वरूप हमें यह संदेश देता है कि ईश्वर की लीला और उसकी शक्ति का कोई अंत नहीं है। जब हम सच्चे हृदय से उस अनंत सत्ता के सामने समर्पण करते हैं, तो जीवन की सबसे बड़ी से बड़ी मुश्किल भी आसानी से सुलझ जाती है।

ॐ अनन्ताय नमः।
अनन्त भगवान की जय!

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