कार्तिक पूर्णिमा 2026: जानें तिथि, स्नान-दान, पूजा विधि, देव दीपावली और महत्व
कार्तिक पूर्णिमा मंगलवार, 24 नवम्बर 2026 को मनाई जाएगी।
पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय: सायं 05:01 बजे
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: 23 नवम्बर 2026 को रात्रि 11:42 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 24 नवम्बर 2026 को रात्रि 08:23 बजे
कार्तिक पूर्णिमा (Kartik Purnima) हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और बड़े त्योहारों में से एक है। इसे ‘त्रिपुरी पूर्णिमा‘ और ‘देव दिवाली‘ (Dev Diwali) के नाम से भी जाना जाता है।
यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। यह पवित्र ‘कार्तिक मास’ का अंतिम दिन होता है।
यहाँ कार्तिक पूर्णिमा की कथा, महत्व और मान्यताओं का विस्तृत विवरण दिया गया है:
कार्तिक पूर्णिमा क्या है?
यह दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों की आराधना के लिए खास है।
- त्रिपुरी पूर्णिमा: क्योंकि इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध किया था।
- देव दिवाली: मान्यता है कि इस दिन देवता अपनी खुशी मनाने के लिए पृथ्वी पर (विशेषकर काशी में) आते हैं और गंगा घाटों पर दिवाली मनाते हैं।
- गुरु नानक जयंती: सिख धर्म में इस दिन को पहले गुरु, गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व (जन्मदिन) के रूप में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।
पौराणिक कथाएँ (Stories)
कथा 1: त्रिपुरासुर वध (देव दिवाली का कारण) तारकासुर के तीन पुत्र थे- तारकक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली। इन तीनों ने मिलकर ब्रह्मा जी की तपस्या की और वरदान में तीन उड़ते हुए नगर (Cities) मांगे, जिन्हें ‘त्रिपुर‘ कहा जाता था। वे तीनों इन नगरों में बैठकर देवताओं और मनुष्यों पर अत्याचार करते थे। उन्हें वरदान था कि उन्हें वही मार सकेगा जो एक ही बाण से तीनों नगरों को नष्ट कर दे।
देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने अपना रौद्र रूप धारण किया। उन्होंने पृथ्वी को रथ, सूर्य-चंद्रमा को पहिए और मेरु पर्वत को धनुष बनाया। फिर कार्तिक पूर्णिमा के दिन, भगवान शिव ने एक ही बाण से तीनों राक्षसों और उनके नगरों (त्रिपुर) को भस्म कर दिया। इस विजय की खुशी में देवताओं ने स्वर्ग और पृथ्वी पर दीप जलाए, जिसे आज हम ‘देव दिवाली‘ के रूप में मनाते हैं।
कथा 2: मत्स्य अवतार (भगवान विष्णु का प्रथम अवतार) धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इसी दिन (कार्तिक पूर्णिमा) भगवान विष्णु ने अपना पहला अवतार ‘मत्स्य अवतार‘ (विशाल मछली का रूप) धारण किया था। उन्होंने प्रलय काल में वेदों और सप्तऋषियों की रक्षा की थी।
महत्व (Significance)
- कार्तिक स्नान का समापन: पूरे महीने चलने वाले कार्तिक स्नान और कल्पवास का समापन इसी दिन होता है। मान्यता है कि इस दिन गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करने से 100 अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य मिलता है।
- तुलसी विदाई: देवउठनी एकादशी से शुरू हुआ तुलसी विवाह समारोह इस दिन समाप्त होता है और माँ तुलसी को विदा किया जाता है।
- पाप मुक्ति: शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किया गया दान और स्नान मनुष्य के सात जन्मों के पापों को धो देता है।
प्रमुख मान्यताएँ और परंपराएँ (Rituals & Beliefs)
- गंगा स्नान (Kartik Snan): इस दिन ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले) में पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा जी में स्नान करने का बहुत महत्व है। यदि नदी पर न जा सकें, तो घर में नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर नहाना चाहिए।
- दीपदान (Deepdan):
- शाम के समय नदी के किनारे, मंदिरों में, पीपल के नीचे और तुलसी के पास दीये जलाए जाते हैं।
- नदी में पत्तों के दोने में फूल और जलता हुआ दीया बहाना (दीपदान) बहुत शुभ माना जाता है। इससे पितरों को शांति मिलती है।
- सत्यनारायण कथा: कार्तिक पूर्णिमा के दिन अधिकांश हिंदू घरों में भगवान सत्यनारायण की कथा और पूजा करवाई जाती है।
- वाराणसी की देव दिवाली: काशी (बनारस) के घाटों पर इस दिन अद्भुत नजारा होता है। लाखों दीये जलाए जाते हैं और गंगा आरती होती है। यह विश्व प्रसिद्ध है।
कार्तिक पूर्णिमा पर दीपदान करने की सही विधि दी गई है:
कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीपदान (Deepdan) करना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किया गया दीपदान सीधे देवताओं और पितरों तक पहुंचता है।
दीपदान का सही समय (Time)
दीपदान हमेशा ‘प्रदोष काल‘ (सूर्यास्त के बाद, जब हल्का अंधेरा होने लगे) में करना चाहिए। यह समय शाम 5:30 से 7:30 बजे के बीच सबसे उत्तम माना जाता है।
आवश्यक सामग्री (Materials)
- दीये: मिट्टी के दीये (11, 21, 51 या 108) या आटे के बने दीये।
- तेल/घी: शुद्ध देसी घी या तिल का तेल।
- बत्ती: रुई की खड़ी बत्ती (फूल बत्ती) या लंबी बत्ती।
- अन्य: चावल (अक्षत), फूल, गंगाजल, रोली, और दोने (यदि नदी में बहाना हो)।
दीपदान करने की विधि (Step-by-Step Ritual)
दीपदान दो तरीकों से किया जाता है: नदी में प्रवाहित करके और जमीन/मंदिर में रखकर।
(A) यदि आप नदी (गंगा/यमुना) के किनारे हैं:
- शुद्धता: स्नान करें या हाथ-पैर धोकर पवित्र हो जाएं।
- सजावट: एक पत्ते के दोने (Plate made of leaves) में थोड़े फूल और चावल रखें।
- दीया रखें: उसके ऊपर आटे या मिट्टी का दीपक रखें। इसमें घी या तिल का तेल भरें।
- पूजन: दीये को रोली और चावल का तिलक लगाएं।
- प्रार्थना: दीया जलाएं और हाथ में जल लेकर संकल्प लें- “हे देव, मैं अपने पापों के नाश और जीवन में प्रकाश के लिए यह दीपदान कर रहा/रही हूँ।”
- विसर्जन: अब धीरे से दोने को जल में प्रवाहित कर दें। ध्यान रहे, दीया बुझे नहीं।
(B) यदि आप घर या मंदिर में कर रहे हैं:
नदी पर न जा पाने की स्थिति में घर पर ही दीपदान का फल मिल सकता है:
- थाली सजाएं: एक थाली में 5, 7, 11 या 51 दीये रखें।
- आसन: दीयों को कभी भी सीधी जमीन पर न रखें। दीये के नीचे थोड़े चावल (अक्षत) या फूलों का आसन दें।
- दिशा: दीये की लौ पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर होनी चाहिए।
- मंत्र: दीया जलाते समय यह मंत्र बोलें:
“शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपदाम्। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योति नमोऽस्तुते॥”
दीपदान कहाँ-कहाँ करना चाहिए? (5 मुख्य स्थान)
देव दिवाली पर केवल एक जगह नहीं, बल्कि इन 5 जगहों पर दीया जलाना अनिवार्य माना जाता है:
- तुलसी के पास: घर के आंगन में तुलसी माता के पास (विष्णु जी की प्रसन्नता के लिए)।
- पीपल के पेड़ के नीचे: इसमें पितरों और त्रिदेवों का वास होता है (दीया जलाने के बाद पीछे मुड़कर न देखें)।
- घर के मुख्य द्वार पर: दो दीये मुख्य दरवाजे के दोनों तरफ (लक्ष्मी जी के स्वागत के लिए)।
- मंदिर/पूजा स्थान: अपने घर के मंदिर में या पास के शिवालय (शिव मंदिर) में।
- जल स्रोत के पास: घर में जहाँ पानी का मटका/नल हो, वहाँ भी एक दीया जलाएं (वरुण देव के लिए)।
- आकाश दीप: यदि संभव हो, तो एक दीया घर की छत पर या ऊंचे स्थान पर जलाएं (इसे आकाश दीप कहते हैं, जो देवताओं को रास्ता दिखाता है)।
विशेष उपाय (365 बत्ती वाला दीया)
कार्तिक पूर्णिमा की एक बहुत पुरानी परंपरा है— 365 बत्तियों वाला दीया जलाना।
- विधि: कच्चे सूत या रुई को लपेटकर 365 तार (बत्तियां) बनाएं (या बाजार से बना हुआ लें)।
- इसे एक बड़े मिट्टी के दीये या नारियल के गोले में रखें।
- इसमें घी भरकर मंदिर में या तुलसी के पास जलाएं।
- महत्व: यह पूरे साल (365 दिन) की पूजा का फल एक ही दिन में देता है।
|| हर हर महादेव ||
