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काल भैरव जयंती: संकटों के नाशक 'काशी के कोतवाल' का अवतरण दिवस

काल भैरव जयंती मंगलवार, 1 दिसम्बर 2026 को मनाई जाएगी।

अष्टमी तिथि प्रारम्भ: 1 दिसम्बर 2026 को रात्रि 12:11 बजे

अष्टमी तिथि समाप्त: 1 दिसम्बर 2026 को रात्रि 11:13 बजे

सनातन हिंदू धर्म में देवाधिदेव महादेव (भगवान शिव) के कई रूप हैं। जहां एक ओर वे अत्यंत शांत, भोले और ‘आशुतोष’ (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) हैं, वहीं दूसरी ओर जब वे क्रोधित होते हैं, तो उनका रूप अत्यंत भयंकर और प्रलयंकारी हो जाता है। भगवान शिव के इसी परम क्रोधित, न्यायकारी और रौद्र स्वरूप को काल भैरव’ (Kaal Bhairav) कहा जाता है।

हिंदू पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष (अगहन) मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को काल भैरव जयंती मनाई जाती है। इसे ‘भैरवाष्टमी’ या ‘कालाष्टमी’ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इसी पावन दिन भगवान शिव के अंश से काल भैरव का प्राकट्य हुआ था। आइए, इस शक्तिशाली और रहस्यमयी पर्व के अर्थ, इसके गहरे महत्व, ब्रह्मा जी के अहंकार को तोड़ने वाली पौराणिक कथा और पूजा के नियमों को विस्तार से समझते हैं।

काल भैरव जयंती पर भगवान काल भैरव का दिव्य स्वरूप, त्रिशूल, डमरू, श्वान वाहन, दीपक

काल भैरव कौन हैं और यह जयंती क्या है?

‘काल भैरव’ नाम दो शब्दों से मिलकर बना है:

  • काल (Kaal): जिसका अर्थ है ‘समय’ या ‘मृत्यु’।
  • भैरव (Bhairav): जिसका अर्थ है ‘भय को हरने वाला’ या ‘भयंकर’।

अर्थात् जो मृत्यु और समय के भी स्वामी हैं, और जो अपने भक्तों के सभी प्रकार के भयों को नष्ट कर देते हैं, वे काल भैरव हैं। तंत्र शास्त्र और शिव पुराण में काल भैरव को सर्वोच्च देवता माना गया है। काल भैरव जयंती वह दिन है जब साधक अकाल मृत्यु के भय, शत्रुओं की बाधा और काले जादू (नकारात्मक ऊर्जा) के प्रभाव को नष्ट करने के लिए भगवान भैरव की विशेष पूजा करते हैं। उन्हें काशी का कोतवाल’ (Varanasi’s Chief Police) भी कहा जाता है।

 

काल भैरव जयंती का धार्मिक और तांत्रिक महत्व

भैरव बाबा की पूजा केवल तांत्रिक ही नहीं, बल्कि गृहस्थ लोग भी करते हैं। इसका महत्व इस प्रकार है:

  • भय और शत्रुओं का नाश: काल भैरव की आराधना से व्यक्ति के मन से मृत्यु, रोग और शत्रुओं का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
  • नकारात्मक ऊर्जा से बचाव: जिस घर में काल भैरव की पूजा होती है, वहां भूत-प्रेत, जादू-टोना या किसी भी प्रकार की नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर सकती।
  • समय का सदुपयोग: ‘काल’ का अर्थ समय भी है। भैरव बाबा की पूजा व्यक्ति को समय का महत्व समझाती है और उसे आलस्य से दूर कर सही मार्ग पर लाती है।
  • न्याय के देवता: काल भैरव अत्यंत न्यायप्रिय हैं। जो व्यक्ति गरीबों, असहायों और जानवरों की मदद करता है, भैरव बाबा उस पर हमेशा अपनी कृपा बनाए रखते हैं।

पौराणिक कथा (ब्रह्मा जी का अहंकार और भैरव की उत्पत्ति)

शिव महापुराण के अनुसार, काल भैरव की उत्पत्ति भगवान शिव के क्रोध से हुई थी:

कथा: एक बार ब्रह्मा जी, विष्णु जी और शिव जी के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। बातों ही बातों में ब्रह्मा जी को अहंकार हो गया। उस समय ब्रह्मा जी के 5 मुख थे। उन्होंने अपने पांचवें मुख से भगवान शिव के लिए कुछ अपमानजनक शब्द कह दिए।

यह सुनकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। उनके क्रोध से एक विशाल और भयानक पुरुष प्रकट हुआ, जो साक्षात् ‘काल’ (मृत्यु) के समान था। यही काल भैरव थे।

ब्रह्मा जी का सिर काटना: काल भैरव ने प्रकट होते ही अपने नाखून से ब्रह्मा जी का वह पांचवां सिर काट दिया जिसने शिव की निंदा की थी। सिर काटने के कारण काल भैरव पर ब्रह्म-हत्या (ब्राह्मण को मारने का पाप) लग गया। वह कटा हुआ सिर उनके हाथ में ही चिपक गया।

पाप से मुक्ति (काशी यात्रा): भगवान शिव ने भैरव को प्रायश्चित करने के लिए तीनों लोकों का भ्रमण करने को कहा। वे भिक्षा मांगते हुए पूरी सृष्टि में घूमे, लेकिन ब्रह्म-हत्या ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। अंत में, जब वे काशी (वाराणसी) पहुंचे, तो वहां पहुंचते ही उनके हाथ से वह सिर छूटकर गिर गया। जिस स्थान पर वह सिर गिरा, उसे कपाल मोचन तीर्थ कहा जाता है। वहां उन्हें पाप से मुक्ति मिली और भगवान शिव ने उन्हें काशी का रक्षक (कोतवाल) नियुक्त कर दिया।

 

मान्यताएं और पूजा विधि (Rituals & Beliefs)

क. काले कुत्ते की सेवा (Vehicle Worship): काल भैरव की सवारी कुत्ता (Dog) है, विशेषकर काला कुत्ता।

  • इस दिन काले कुत्ते को रोटी, बिस्कुट या दूध पिलाने से भैरव बाबा बहुत प्रसन्न होते हैं। मान्यता है कि कुत्ते को भोजन कराने से यमराज का भय भी दूर होता है।

ख. विशेष भोग (मदिरा): आमतौर पर देवी-देवताओं को सात्विक भोग लगता है, लेकिन काल भैरव एकमात्र ऐसे देवता हैं जिन्हें मदिरा (शराब) का भोग चढ़ाया जाता है। उज्जैन के काल भैरव मंदिर में मूर्ति साक्षात् मदिरा पान करती है। (गृहस्थ लोग हलवा, इमरती या जलेबी का भोग लगाते हैं)।

ग. चौमुखी दीपक: इस दिन शाम को सरसों के तेल का चौमुखी दीपक (चार बत्तियों वाला) जलाकर ॐ कालभैरवाय नमः” मंत्र का जाप करना चाहिए।

घ. काशी की मान्यता: कहा जाता है कि यदि आपने काशी विश्वनाथ (शिव जी) के दर्शन किए और काल भैरव के दर्शन नहीं किए, तो आपकी काशी यात्रा अधूरी मानी जाती है।

 

मुख्य मान्यताएं (क्या न करें)

  • झूठ और छल वर्जित: काल भैरव न्याय के देवता हैं। इस दिन झूठ बोलने, किसी को धोखा देने या असहायों को सताने से बाबा अत्यंत रुष्ट हो जाते हैं।
  • तामसिक भोजन: गृहस्थ जीवन वाले साधकों को इस दिन मांस-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • भयभीत न हों: कई लोग काल भैरव के नाम से डरते हैं, लेकिन मान्यता है कि जो सच्चे मन से उनकी शरण में जाता है, भैरव बाबा एक पिता की भांति उसकी रक्षा करते हैं।

निष्कर्ष

काल भैरव जयंती हमें इस बात का स्पष्ट संदेश देती है कि अहंकार चाहे ज्ञान का हो (जैसे ब्रह्मा जी का) या सत्ता का, उसका अंत निश्चित है। भगवान काल भैरव केवल संहारक नहीं हैं, बल्कि वे अहंकार, बुराइयों और अज्ञान का नाश करके हमें शुद्ध करते हैं। समय (काल) सबसे बलवान है, और जो व्यक्ति समय का सदुपयोग करते हुए सत्य के मार्ग पर चलता है, भगवान काल भैरव उसे इस मृत्युलोक के हर भय से मुक्त कर अभयदान प्रदान करते हैं।

|| ॐ कालभैरवाय नमः ||

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