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अन्नपूर्णा जयंती: जगत जननी माता पार्वती के अन्नपूर्णा स्वरूप का प्राकट्य और अन्न के सम्मान का पर्व

अन्नपूर्णा जयन्ती बुधवार, दिसम्बर 23, 2026 को मनाई जाएगी

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ – दिसम्बर 23, 2026 को 10:47 बजे से

पूर्णिमा तिथि समाप्त – दिसम्बर 24, 2026 को 06:57 बजे तक

सनातन हिंदू धर्म में ‘अन्न’ को परब्रह्म का स्वरूप माना गया है। उपनिषदों में कहा गया है कि ‘अन्न ही जीवन है’। इसी अन्न और पोषण की अधिष्ठात्री देवी हैं- माता अन्नपूर्णा (Mata Annapurna)।

हिंदू पंचांग के अनुसार, जब पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ा था, तब जीवों की रक्षा के लिए माता पार्वती ने मार्गशीर्ष (अगहन) मास की पूर्णिमा तिथि को ‘अन्नपूर्णा’ के रूप में अवतार लिया था। इसी पावन दिन को पूरे भारत में अन्नपूर्णा जयंती‘ (Annapurna Jayanti) के रूप में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। आइए, पोषण और मातृत्व की देवी के इस पावन पर्व के अर्थ, इसके गहरे महत्व, भगवान शिव से जुड़ी पौराणिक कथा और रसोई घर की पूजा के नियमों को विस्तार से समझते हैं।

अन्नपूर्णा जयंती पर माता अन्नपूर्णा स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान, हाथों में अन्न से भरा पात्र और करछुल, भगवान शिव को अन्नदान करती हुई

अन्नपूर्णा जयंती क्या है?

‘अन्नपूर्णा’ दो शब्दों से मिलकर बना है- अन्न (भोजन) और पूर्णा (पूर्ण करने वाली)। अर्थात् वह देवी जो संपूर्ण जगत के जीवों को भोजन और पोषण प्रदान कर उन्हें तृप्त करती हैं।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन मनाए जाने वाले इस पर्व को देवी पार्वती के उस ममतामयी स्वरूप के उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिसने स्वयं देवाधिदेव महादेव (भगवान शिव) को भिक्षा देकर संसार के संकट को दूर किया था। यह दिन हमें अन्न का सम्मान करने, उसे व्यर्थ न करने और भूखों को भोजन कराने (अन्नदान) की प्रेरणा देता है।

 

अन्नपूर्णा जयंती का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

इस जयंती का महत्व केवल धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे दैनिक जीवन और रसोई से जुड़ा हुआ है:

  • भोजन और धन की पूर्णता: जो व्यक्ति इस दिन माता अन्नपूर्णा की पूजा करता है, उसके घर के भंडार (रसोई) कभी खाली नहीं रहते और धन-धान्य की वृद्धि होती है।
  • अकाल और दरिद्रता का नाश: इस दिन सच्चे मन से देवी की आराधना करने से परिवार पर कभी अकाल, भुखमरी या दरिद्रता का संकट नहीं आता।
  • रसोई की पवित्रता: यह पर्व गृहणियों को रसोई घर की पवित्रता और स्वच्छता बनाए रखने का महत्व समझाता है, क्योंकि रसोई को ही माता का निवास माना जाता है।
  • अन्नदान का महापुण्य: शास्त्रों में ‘अन्नदान’ को सबसे बड़ा दान माना गया है। अन्नपूर्णा जयंती पर गरीबों को भोजन कराने से कई यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है।

अन्नपूर्णा जयंती की पौराणिक कथा (जब शिव जी ने मांगी भिक्षा)

अन्नपूर्णा जयंती की उत्पत्ति की कथा भगवान शिव, माता पार्वती और पृथ्वी पर पड़े एक भयंकर अकाल से जुड़ी है:

पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में एक बार पृथ्वी पर भयंकर सूखा और अकाल पड़ गया। वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, जिससे खेत सूख गए और अन्न का एक दाना भी नहीं उगा। सभी मनुष्य, पशु-पक्षी और जीव-जंतु भूख-प्यास से तड़प-तड़प कर मरने लगे। पृथ्वी पर हाहाकार मच गया।

मनुष्यों की इस दयनीय स्थिति को देखकर सभी देवता और ऋषि-मुनि घबराकर ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के पास गए। सभी ने मिलकर देवाधिदेव महादेव (भगवान शिव) की स्तुति की और उनसे इस संकट को दूर करने की प्रार्थना की।

संसार का कष्ट दूर करने के लिए भगवान शिव ने एक वृद्ध भिक्षुक‘ (साधु) का रूप धारण किया। दूसरी ओर, जगत जननी माता पार्वती ने जीवों पर कृपा करते हुए काशी (वाराणसी) नगरी में माता अन्नपूर्णा का दिव्य रूप धारण किया।

भगवान शिव भिक्षा का पात्र लेकर माता अन्नपूर्णा के पास पहुंचे और बोले- हे देवी! भवती भिक्षां देहि।” (हे माता, मुझे भिक्षा दें)।

माता अन्नपूर्णा ने प्रसन्न होकर भगवान शिव के भिक्षा पात्र में स्वादिष्ट अन्न और भोजन भर दिया। भगवान शिव ने वह सारा अन्न पृथ्वी वासियों में बांट दिया। माता की कृपा से पृथ्वी का अकाल तुरंत समाप्त हो गया, खेतों में फिर से फसलें लहलहा उठीं और सभी जीवों को पेट भर भोजन प्राप्त हुआ।

विशेष नोट: जिस दिन माता पार्वती ने यह स्वरूप धारण किया था, वह मार्गशीर्ष पूर्णिमा का दिन था। तभी से इस पावन तिथि को ‘अन्नपूर्णा जयंती’ के रूप में मनाया जाने लगा।

 

अन्नपूर्णा जयंती की पूजा विधि और मान्यताएं

इस दिन घर की रसोई (Kitchen) और चूल्हे की पूजा का विशेष विधान है:

  • रसोई घर की सफाई: अन्नपूर्णा जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सबसे पहले अपनी रसोई और गैस चूल्हे को अच्छी तरह से साफ करें।
  • चूल्हे की पूजा: गैस चूल्हे (या मिट्टी के चूल्हे) पर हल्दी, कुमकुम (रोली) और चावल से तिलक करें। माता अन्नपूर्णा का ध्यान करते हुए चूल्हे पर पुष्प अर्पित करें।
  • माता अन्नपूर्णा की स्थापना: घर के मंदिर में माता अन्नपूर्णा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें (जिसमें वे शिव जी को भिक्षा दे रही हों)। माता को लाल चुनरी, सिंदूर और सुहाग की सामग्री अर्पित करें।
  • विशेष भोग (खीर): इस दिन माता अन्नपूर्णा को चावल की खीर का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। भोजन बनाते समय मन में किसी के प्रति द्वेष न रखें।
  • अन्नदान (Annadaan): पूजा के पश्चात ब्राह्मणों, गरीबों या जरूरतमंदों को अपनी क्षमता के अनुसार अन्न (गेहूं, चावल, दाल) या पका हुआ भोजन अवश्य दान करें।

मुख्य नियम: क्या न करें?

  • अन्न का अपमान न करें: इस दिन (और जीवन में कभी भी) भोजन की थाली में अन्न जूठा न छोड़ें और न ही भोजन का तिरस्कार करें।
  • तामसिक भोजन वर्जित: अन्नपूर्णा जयंती के दिन घर में मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए। भोजन पूर्णतः सात्विक होना चाहिए।
  • रसोई को गंदा न छोड़ें: रात के समय रसोई घर में जूठे बर्तन न छोड़ें, क्योंकि इससे माता अन्नपूर्णा रुष्ट हो जाती हैं।

निष्कर्ष

अन्नपूर्णा जयंती हमें यह सिखाती है कि हमारे सामने परोसी गई भोजन की थाली केवल कुछ रसायनों या भौतिक पदार्थों का मिश्रण नहीं है, बल्कि यह ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा और वरदान है। भगवान शिव, जो पूरे ब्रह्मांड के स्वामी हैं, उन्होंने भी संसार की भूख मिटाने के लिए माता अन्नपूर्णा के सामने हाथ फैलाए थे, जो यह सिद्ध करता है कि पोषण और मातृत्व की शक्ति सर्वोपरि है। यह पावन पर्व हमें संकल्प देता है कि हम न केवल अन्न का सम्मान करेंगे, बल्कि समाज में कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए, इसके लिए भी अपना योगदान देंगे।

अन्नपूर्णा जयंती के पावन अवसर पर माता अन्नपूर्णा सभी के जीवन में अन्न, धन, सुख, समृद्धि और सदैव भरपूर अन्नपूर्णा कृपा बनाए रखें।

॥ ॐ अन्नपूर्णायै नमः ॥ 

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