अखुरथ संकष्टी चतुर्थी: मूसक (चूहे) पर सवार भगवान गणेश की पूजा और संकटों के नाश
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी शनिवार, 26 दिसम्बर 2026 को मनाई जाएगी।
संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रोदय: रात्रि 08:19 बजे
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ: 26 दिसम्बर 2026 को रात्रि 08:04 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त: 27 दिसम्बर 2026 को सायं 05:12 बजे
सनातन हिंदू धर्म में भगवान श्री गणेश को विघ्नहर्ता और ‘प्रथम पूजनीय’ माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके स्मरण के बिना अधूरी होती है। भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने के लिए हर महीने के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में चतुर्थी तिथि का व्रत रखा जाता है। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को ‘संकष्टी चतुर्थी’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है- संकटों को हरने वाली चतुर्थी।
हिंदू पंचांग के अनुसार, पौष मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को ‘अखुरथ संकष्टी चतुर्थी’ (Akhuratha Sankashti Chaturthi) के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान गणेश के साथ-साथ उनके वाहन मूसक (चूहे) की भी विशेष महत्ता होती है। आइए, इस शक्तिशाली और कल्याणकारी व्रत के अर्थ, इसके गहरे महत्व, लंकापति रावण से जुड़ी पौराणिक कथा और पूजा के नियमों को विस्तार से समझते हैं।भगवान श्री गणेश जी की आरती और चालीसा का पाठ करने के लिए यहाँ क्लिक करे
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी का अर्थ
‘अखुरथ’ संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है:
- अखु (Akhu): जिसका अर्थ होता है चूहा या मूसक।
- रथ (Ratha): जिसका अर्थ है वाहन या सारथी।
अर्थात्, अखुरथ संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के उस विशिष्ट स्वरूप की उपासना की जाती है, जिसमें वे अपने प्रिय वाहन मूसक (चूहे) के रथ पर सवार होते हैं। इस दिन भगवान महागणपति की पूजा ‘दुर्गा पीठ’ से जोड़कर भी देखी जाती है। मान्यता है कि मूसक पर सवार गणेश जी की पूजा करने से वे बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों के मार्ग में आने वाले सभी विघ्नों को तेज़ी से दूर कर देते हैं।
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व
इस व्रत को जीवन की जटिल से जटिल समस्याओं को सुलझाने के लिए एक अचूक उपाय माना गया है। इसके प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:
- शत्रुओं और बाधाओं से मुक्ति: जो साधक इस दिन पूर्ण श्रद्धा से भगवान अखुरथ महागणपति का व्रत रखता है, वह शत्रुओं और जीवन के हर प्रकार के बंधनों से मुक्त हो जाता है।
- संतान सुख की प्राप्ति: जिन दंपत्तियों को संतान सुख नहीं मिल पा रहा है, उनके लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी माना जाता है। गणेश जी की कृपा से योग्य और स्वस्थ संतान की प्राप्ति होती है।
- बुद्धि और ऐश्वर्य का विकास: भगवान गणेश विद्या और बुद्धि के दाता हैं। इस व्रत को करने से साधक की मानसिक उलझनें दूर होती हैं और उसे व्यापार व शिक्षा में अपार सफलता मिलती है।
- चंद्र दर्शन का महत्व: इस व्रत का समापन रात में चंद्रमा के दर्शन और उन्हें अर्घ्य देने के बाद ही होता है, जिससे कुंडली के चंद्र दोष दूर होते हैं और मानसिक शांति मिलती है।
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक व्रत कथा (रावण और बालि का प्रसंग)
इस व्रत की महिमा को दर्शाने वाली एक अत्यंत प्रसिद्ध पौराणिक कथा है, जो बताती है कि इस व्रत के प्रभाव से अहंकारी रावण को भी मृत्यु तुल्य संकट से कैसे मुक्ति मिली थी:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में लंकापति रावण ने अपनी शक्ति के अहंकार में आकर स्वर्ग के सभी देवताओं को पराजित कर दिया था। रावण को जब वानरराज बालि की अपार शक्ति के बारे में पता चला, तो वह उसे भी युद्ध में हराने और बंदी बनाने के लिए किष्किंधा पहुंच गया।
संध्या का समय था और वानरराज बालि समुद्र तट पर संध्या-वंदन (पूजा) कर रहे थे। रावण ने पीछे से आकर बालि पर हमला करना चाहा। लेकिन बालि रावण से कहीं अधिक शक्तिशाली थे। बालि ने रावण को पकड़कर अपनी कांख (बगल) में दबा लिया और रावण को बंदी बना लिया। कई महीनों तक रावण बालि की कैद में रहा और उसे अत्यंत अपमान का सामना करना पड़ा।
रावण की इस दयनीय स्थिति को देखकर उसके नाना और महान ऋषि पुलस्त्य मुनि उसके पास आए। रावण ने दुखी होकर ऋषि से कहा कि वह इस अपमानजनक बंधन से मुक्ति चाहता है।
तब ऋषि पुलस्त्य ने रावण को सांत्वना दी और उसे संकट हरने वाले भगवान गणेश का ‘अखुरथ संकष्टी चतुर्थी’ व्रत करने की सलाह दी। ऋषि ने बताया कि पूर्व काल में देवराज इंद्र ने भी वृत्रासुर नामक राक्षस का संहार करने और संकट से बचने के लिए इसी व्रत को किया था।
अपने नाना के निर्देशानुसार, रावण ने किष्किंधा में ही पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ अखुरथ संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से वानरराज बालि का हृदय परिवर्तन हो गया। बालि ने रावण को अपनी कैद से मुक्त कर दिया और उसके साथ मित्रवत व्यवहार किया।
नोट: एक अन्य मान्यता के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर धर्मराज युधिष्ठिर ने भी अपना खोया हुआ राजपाट वापस पाने के लिए इस व्रत का पालन किया था।
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि और नियम
इस व्रत में भगवान गणेश और चंद्र देव दोनों की पूजा का विधान है:
- प्रातःकाल स्नान और संकल्प: चतुर्थी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और हाथ में जल लेकर दिन भर के व्रत का संकल्प लें।
- पूजन सामग्री: भगवान गणेश को सिंदूर, रोली और अक्षत का तिलक लगाएं। उन्हें गेंदे के फूल और उनकी सबसे प्रिय 21 दूर्वा (हरी घास) अवश्य अर्पित करें।
- भोग (नैवेद्य): गणेश जी को तिल के लड्डू, मोदक, और मौसमी फलों का भोग लगाएं। पौष मास में तिल का विशेष महत्व होता है, इसलिए तिल से बनी मिठाई चढ़ाना अत्यंत शुभ होता है।
- मंत्र जाप और कथा: पूजा के दौरान ‘ॐ गं गणपतये नम:’ या ‘ॐ विघ्नविनाशाय नम:’ मंत्र का जाप करें। इसके बाद अखुरथ संकष्टी की कथा पढ़ें और अंत में आरती उतारें।
- चंद्र दर्शन और अर्घ्य (महत्वपूर्ण चरण): यह व्रत शाम को चंद्रोदय के बाद पूरा होता है। रात में चंद्रमा के उदय होने पर तांबे के लोटे में जल, थोड़ा सा दूध, लाल चंदन और फूल डालकर चंद्र देव को अर्घ्य दें।
- पारण: चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात गणेश जी का प्रसाद ग्रहण कर अपना व्रत खोलें।
- इस दिन काले वस्त्र पहनने से बचना चाहिए और घर में सात्विक वातावरण बनाए रखना चाहिए।
- संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन के बिना व्रत को पूर्ण नहीं माना जाता। यदि बादल छाए हों, तो पंचांग में दिए गए चंद्रोदय के समय के अनुसार चंद्रमा की दिशा में मुख करके अर्घ्य दिया जा सकता है।
निष्कर्ष
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी का यह पावन व्रत हमें यह संदेश देता है कि जब व्यक्ति अहंकार छोड़कर सच्ची श्रद्धा से ईश्वर की शरण में जाता है, तो उसके सारे कष्ट मिट जाते हैं। जिस प्रकार मूसक अपने छोटे आकार के बावजूद बड़ी-बड़ी चीजों को कुतर कर रास्ता बना लेता है, उसी प्रकार भगवान गणेश अपने भक्तों के जीवन में आने वाली हर बाधा को काट कर उनके लिए सफलता और शांति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी के पावन अवसर पर भगवान श्री गणेश सभी भक्तों के जीवन से विघ्न-बाधाओं का नाश करें तथा सुख, समृद्धि, बुद्धि और सफलता का आशीर्वाद प्रदान करें।
॥ ॐ गं गणपतये नमः ॥
