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मकर संक्रांति: तिथि, महत्व, पूजा विधि, कथा और दान

मकर संक्रांति (Makar Sankranti) हिंदू धर्म का एक प्रमुख और वैज्ञानिक आधार वाला त्यौहार है। यह पर्व सूर्य देव को समर्पित है। आमतौर पर भारतीय त्यौहार चंद्रमा की स्थिति पर आधारित होते हैं, लेकिन मकर संक्रांति सूर्य की स्थिति पर आधारित है, इसलिए यह हर साल लगभग एक ही तारीख (14 या 15 जनवरी) को मनाया जाता है।

यहाँ मकर संक्रांति की कथा, महत्व और मान्यताओं का विस्तृत विवरण दिया गया है:

मकर संक्रांति पर सूर्य देव की पूजा और पतंग उड़ाते हुए लोग

मकर संक्रांति क्या है?

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर अपने पुत्र शनि की राशि मकर (Capricorn) में प्रवेश करते हैं, तो इस घटना को ‘मकर संक्रांति’ कहा जाता है।

इसी दिन से सूर्य उत्तरायण (Uttarayana) हो जाते हैं, जिसका अर्थ है कि सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ने लगते हैं। इससे दिन बड़े और रातें छोटी होनी शुरू हो जाती हैं तथा सर्दी कम होने लगती है।

मकर संक्रांति की पौराणिक कथाएं

इस पर्व से जुड़ी तीन प्रमुख कथाएं प्रचलित हैं:

सूर्य और शनि का मिलन: पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य देव और उनके पुत्र शनि देव के बीच मतभेद था। लेकिन मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव अपनी नाराजगी भुलाकर अपने पुत्र शनि के घर (मकर राशि) उनसे मिलने जाते हैं। चूंकि शनि मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिए यह पर्व पिता-पुत्र के प्रेम और रिश्तों में मिठास घोलने का प्रतीक है।

भीष्म पितामह का देह त्याग: मकर संक्रांति का संबंध उत्तरायण की धार्मिक मान्यता से भी जोड़ा जाता है। महाभारत में भीष्म पितामह का प्रसंग इस संदर्भ में विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

भीष्म पितामह को उनके पिता राजा शांतनु से अपनी इच्छा के अनुसार मृत्यु चुनने का वरदान प्राप्त था। कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन के बाणों से घायल होकर भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेट गए। , तब सूर्य दक्षिणायन में था।

शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन के समय शरीर त्यागने से आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता और उसे जन्म-मरण के चक्र में वापस आना पड़ता है, जबकि उत्तरायण में देह त्यागने वाली आत्मा सीधे ब्रह्मलोक (मोक्ष) को प्राप्त होती है।

इसलिए, भयंकर पीड़ा सहने के बावजूद भीष्म पितामह ने अपने प्राण नहीं त्यागे। वे 58 दिनों तक बाणों की शय्या पर लेटे रहे और सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार करते रहे। जैसे ही सूर्य देव ने मकर राशि में प्रवेश किया (मकर संक्रांति का दिन आया) और सूर्य उत्तरायण हुए, तब भीष्म पितामह ने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए स्वेच्छा से अपने प्राण त्याग दिए और मोक्ष को प्राप्त हुए।

गंगा का सागर में मिलन: मकर संक्रांति से जुड़ी तीसरी अत्यंत महत्वपूर्ण कथा मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण से संबंधित है।

राजा सगर के 60,000 पुत्रों को कपिल मुनि ने उनके दुर्व्यवहार के कारण श्राप देकर भस्म कर दिया था। उनकी आत्माओं को मुक्ति दिलाने के लिए राजा सगर के वंशज भगीरथ ने भगवान ब्रह्मा और शिव की कठोर तपस्या की, ताकि गंगा माता को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाया जा सके।

भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर आईं और भगवान शिव ने अपनी जटाओं में उनके प्रचंड वेग को धारण किया। इसके बाद गंगा माता भगीरथ के पीछे-पीछे चलने लगीं।

मकर संक्रांति के ही पावन दिन मां गंगा कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए उस स्थान पर पहुंचीं, जहां राजा सगर के 60,000 पुत्रों की राख (भस्म) पड़ी थी। गंगा के पवित्र जल का स्पर्श पाते ही उन सभी को मोक्ष की प्राप्ति हो गई। इसके बाद मां गंगा वहीं जाकर समुद्र (सागर) में मिल गईं। (यही कारण है कि मकर संक्रांति के दिन ‘गंगासागर’ (पश्चिम बंगाल) में बहुत बड़ा मेला लगता है और इस दिन गंगा स्नान का अनंत पुण्य माना गया है।)

महत्व (Significance)

  • देवताओं का दिन: शास्त्रों में उत्तरायण को ‘देवताओं का दिन’ और दक्षिणायन को ‘देवताओं की रात’ कहा गया है। इसलिए मकर संक्रांति से सभी मांगलिक कार्य (विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश) जो अब तक बंद थे, फिर से शुरू हो जाते हैं।
  • फसलों का उत्सव: यह किसानों के लिए खुशी का मौका होता है। नई फसलें (जैसे- धान, गन्ना, तिल) घर आती हैं। इसे पंजाब में लोहड़ी, असम में बिहू और दक्षिण भारत में पोंगल के रूप में मनाया जाता है।
  • वैज्ञानिक महत्व: सर्दी के कारण शरीर में जकड़न और बीमारियां होती हैं। उत्तरायण में सूर्य की रोशनी तेज होती है। इस दिन धूप में पतंग उड़ाने या स्नान करने से शरीर को विटामिन-डी मिलता है और रोगाणु नष्ट होते हैं।

मान्यताएं और परंपराएं (Rituals & Beliefs)

  1. पवित्र स्नान: इस दिन गंगा, यमुना या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करना मोक्षदायक माना जाता है। प्रयागराज में इस दिन ‘माघ मेला’ का सबसे बड़ा स्नान होता है।
  2. दान (खिचड़ी और तिल): इस दिन तिल, गुड़, चावल, दाल (खिचड़ी) और ऊनी कपड़ों का दान करना चाहिए। कहा जाता है- इस दिन किया गया दान सौ गुना होकर वापस मिलता है।”
  3. तिल-गुड़ का सेवन: मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ के लड्डू खाए जाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, सर्दी में तिल-गुड़ शरीर को गर्मी देते हैं और स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं।
    • महाराष्ट्र में लोग एक-दूसरे को तिल-गुड़ देते हुए कहते हैं- “तिल-गुल घ्या, गोड़-गोड़ बोला” (तिल-गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो)।
  4. पतंगबाजी: गुजरात और राजस्थान में इस दिन पतंग उड़ाने की विशेष परंपरा है, जिसका उद्देश्य खेल-खेल में सूर्य की धूप का सेवन करना है।

निष्कर्ष: मकर संक्रांति अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का पर्व है। यह हमें सिखाता है कि जैसे सूर्य शनि के घर जाकर मतभेद मिटाते हैं, वैसे ही हमें भी गिले-शिकवे भुलाकर रिश्तों में (तिल-गुड़ जैसी) मिठास लानी चाहिए।

|| हर हर महादेव ||

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