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शनि देव जी की आरती और शनि चालीसा अर्थ सहित पढ़ें। जानें पूजा विधि, शक्तिशाली मंत्र, शनि दोष निवारण के उपाय

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भगवान शनिदेव का संक्षिप्त परिचय

भगवान शनिदेव को हिंदू धर्म में कर्मफल दाता (कर्मों का फल देने वाले) और न्यायाधीश (मजिस्ट्रेट) के रूप में जाना जाता है। वे सूर्य देव और माता छाया के पुत्र हैं, तथा मृत्यु के देवता यमराज उनके भाई हैं।

अक्सर लोगों में शनिदेव को लेकर एक भय रहता है कि वे केवल कष्ट देते हैं, लेकिन शास्त्रों के अनुसार यह एक भ्रांति है। शनिदेव न्याय के देवता हैं; वे निष्पक्ष होकर मनुष्य को उसके अच्छे या बुरे कर्मों के अनुसार ही फल देते हैं। बुरे कर्म करने वालों को वे दंडित करते हैं, जबकि अच्छे कर्म करने वालों पर वे अपनी अपार कृपा बरसाते हैं और उन्हें रंक (गरीब) से राजा बना सकते हैं।

उनका स्वरूप श्याम (काले) वर्ण का है, वे नीले वस्त्र धारण करते हैं और उनका वाहन गिद्ध या कौआ है। उनके हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल और दंड सुशोभित हैं। ज्योतिष शास्त्र में शनि को सबसे धीमी गति से चलने वाला ग्रह माना जाता है, इसलिए इन्हें ‘शनैश्चर’ (धीरे चलने वाला) भी कहा जाता है। व्यक्ति के जीवन में अनुशासन, धैर्य, मेहनत और आध्यात्मिकता का विकास शनिदेव की कृपा से ही होता है।


श्री शनिदेव की आरती

जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।

सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥

जय जय श्री शनिदेव…

श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारी।

नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥

जय जय श्री शनिदेव…

क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी।

मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी॥

जय जय श्री शनिदेव…

मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी।

लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी॥

जय जय श्री शनिदेव…

देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी।

विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी॥

जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।

शनि आरती के लाभ: शनिदेव की आरती नियमित रूप से करने पर शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या महादशा के दौरान आने वाले कष्ट और मानसिक तनाव कम होते हैं। जीवन में बार-बार आ रही रुकावटें, दुर्घटनाएं और अकारण भय आरती के प्रभाव से दूर हो जाते हैं। कोर्ट-कचहरी के मामलों या किसी भी प्रकार के अन्याय से मुक्ति मिलती है और करियर व व्यापार में स्थिरता आती है। शनि आरती व्यक्ति के स्वभाव में धैर्य, गंभीरता और अनुशासन लाती है, जो सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है।


श्री शनि चालीसा (अर्थ सहित)

श्री शनि चालीसा भगवान शनि को प्रसन्न करने और उनके प्रकोप को शांत करने का एक अत्यंत प्रभावशाली पाठ है।

॥दोहा॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।

दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।

करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

जयति जयति शनिदेव दयाला।

करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै।

माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥

परम विशाल मनोहर भाला।

टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके।

हिय माल मुक्तन मणि दमके ॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा।

पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन।

यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा।

भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं।

रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं ॥

पर्वतहू तृण होई निहारत।

तृणहू को पर्वत करि डारत॥

राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो।

कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥

बनहूँ में मृग कपट दिखाई।

मातु जानकी गई चुराई॥

लखनहिं शक्ति विकल करि डारा।

मचिगा दल में हाहाकारा ॥

रावण की गतिमति बौराई।

रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥

दियो कीट करि कंचन लंका।

बजि बजरंग बीर की डंका॥

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा।

चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

हार नौलखा लाग्यो चोरी।

हाथ पैर डरवाय तोरी ॥

भारी दशा निकृष्ट दिखायो।

तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥

विनय राग दीपक महं कीन्हयों।

तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी।

आपहुं भरे डोम घर पानी॥

तैसे नल पर दशा सिरानी।

भूंजीमीन कूद गई पानी ॥

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई।

पारवती को सती कराई॥

तनिक विलोकत ही करि रीसा।

नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी।

बची द्रौपदी होति उघारी॥

कौरव के भी गति मति मारयो।

युद्ध महाभारत करि डारयो ॥

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला।

लेकर कूदि परयो पाताला॥

शेष देवलखि विनती लाई।

रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

वाहन प्रभु के सात सजाना।

जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥

जम्बुक सिंह आदि नख धारी।

सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।

हय ते सुख सम्पति उपजावैं॥

गर्दभ हानि करै बहु काजा।

सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै।

मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।

चोरी आदि होय डर भारी ॥

तैसहि चारि चरण यह नामा।

स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।

धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥

समता ताम्र रजत शुभकारी।

स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी॥

जो यह शनि चरित्र नित गावै।

कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।

करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।

विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।

दीप दान दै बहु सुख पावत॥

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।

शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥

॥दोहा॥

पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार।

रत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

|| समाप्त ||


श्री शनि चालीसा  का अर्थ

प्रारंभिक दोहा अर्थ: जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल। दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥ जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज। करहु कृपा हे रवि सुतन, राखहु जन की लाज॥

दोहे का अर्थ: माता पार्वती के पुत्र, कल्याण करने वाले और कृपालु भगवान गणेश की जय हो। हे प्रभु, गरीबों के दुख दूर करके उन्हें प्रसन्न करें। हे भगवान शनिदेव आपकी जय हो, हे महाराज मेरी विनती सुनिए। हे सूर्यपुत्र मुझ पर कृपा करें और अपने इस सेवक की लाज (सम्मान) रखें।

चालीसा का विस्तृत भावार्थ (संपूर्ण चौपाइयों का सार):

  1. उत्पत्ति और स्वरूप: चालीसा में बताया गया है कि शनिदेव सूर्य देव और माता छाया के पुत्र हैं। उनका रूप अत्यंत विशाल और भयानक है, जिसे देखकर बड़े-बड़े देवता भी कांप उठते हैं। लेकिन जो सच्चे मन से उनकी भक्ति करता है, उस पर वे असीम कृपा करते हैं।
  2. शनिदेव का प्रभाव (दृष्टि): चालीसा में वर्णन है कि शनिदेव की दृष्टि (नजर) का प्रभाव बहुत अचूक है। जब उनकी वक्र (टेढ़ी) दृष्टि राजा दशरथ पर पड़ी, तो उन्हें राम जी को वनवास भेजना पड़ा। जब उनकी दृष्टि रावण पर पड़ी, तो उसके लंका का विनाश हो गया। राजा हरिश्चंद्र को भी उनके प्रभाव के कारण अपना राजपाट छोड़ना पड़ा और श्मशान में नौकरी करनी पड़ी।
  3. देवताओं और ग्रहों पर प्रभाव: शनिदेव का प्रभाव केवल मनुष्यों पर ही नहीं, बल्कि देवी-देवताओं पर भी पड़ता है। शिव जी, ब्रह्मा जी और स्वयं श्री कृष्ण को भी शनि की दशा के दौरान कष्ट सहने पड़े थे।
  4. भक्तों पर कृपा: जो व्यक्ति शनिवार के दिन व्रत रखता है, शनिदेव को तेल, तिल, उड़द और लोहा अर्पित करता है और गरीबों की मदद करता है, उस पर शनिदेव अपनी शुभ दृष्टि डालते हैं। ऐसे व्यक्ति को जीवन में अपार धन, सुख और सम्मान प्राप्त होता है।
  5. फलश्रुति (पाठ का फल): अंत में कहा गया है कि जो भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा के साथ शनि चालीसा का पाठ करता है, उसे शनि दोष से मुक्ति मिल जाती है। उसके सभी काम सिद्ध हो जाते हैं और उसे जीवन में कभी कोई भारी संकट नहीं घेरता।

भगवान शनिदेव के प्रमुख मंत्र और उनके अर्थ

  1. तांत्रिक/बीज मंत्र (शनि दोष निवारण और त्वरित कृपा के लिए)

ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः॥

अर्थ: मैं भगवान शनिदेव को प्रणाम करता हूँ। (यह शनिदेव का अत्यंत शक्तिशाली बीज मंत्र है। इसके निरंतर जाप से शनि की साढ़ेसाती के कष्ट कटते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।)

  1. शनि मूल मंत्र (शांति और स्थिरता के लिए)

ॐ शं शनैश्चराय नमः॥

अर्थ: मैं धीरे चलने वाले (शनैश्चर) भगवान शनिदेव को नमस्कार करता हूँ। (यह सबसे सरल मंत्र है, जिसका जाप चलते-फिरते या पूजा के समय किया जा सकता है।)

  1. शनि गायत्री मंत्र (संकटों से रक्षा और सही निर्णय लेने के लिए)

ॐ काकध्वजाय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि।

तन्नो मन्दः प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम कौए के चिह्न वाली ध्वजा (झंडे) वाले देव को जानते हैं, हम जिनके हाथों में खड्ग (तलवार) है उनका ध्यान करते हैं। हे धीमी गति से चलने वाले देव (मन्द), कृपया हमारी बुद्धि को प्रकाशित करें और हमें सन्मार्ग दिखाएं।

  1. राजा दशरथ कृत शनि स्तोत्र का मुख्य मंत्र (कठोर कष्टों से मुक्ति के लिए)

नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।

छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥

अर्थ: जिनका शरीर नीले अंजन (काजल या नीलम) के समान चमकता है, जो सूर्य देव के पुत्र हैं और यमराज के बड़े भाई हैं, जिनका जन्म माता छाया और भगवान सूर्य (मार्तंड) से हुआ है, ऐसे भगवान शनिदेव को मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ। (यह मंत्र शनिदेव को अत्यंत प्रिय है क्योंकि इसे राजा दशरथ ने उनकी स्तुति में रचा था।)


|| जय जय शनिदेव ||

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