अनिरुद्ध विनायक चतुर्थी 2026: जानें तिथि, वर्जित चन्द्रदर्शन समय, अर्थ, महत्व, और पूजा विधि की संपूर्ण जानकारी
अनिरुद्ध विनायक चतुर्थी व्रत शुक्रवार, 17 जुलाई 2026 को रखा जायेगा ।
चतुर्थी मध्याह्न मुहूर्त: प्रातः 11:05 बजे से दोपहर 01:50 बजे तक ।
मुहूर्त अवधि: 02 घंटे 45 मिनट ।
वर्जित चन्द्रदर्शन समय: प्रातः 08:37 बजे से रात्रि 09:33 बजे तक ।
अवधि: 12 घंटे 56 मिनट ।
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ: 17 जुलाई 2026, प्रातः 06:27 बजे ।
चतुर्थी तिथि समाप्त: 18 जुलाई 2026, प्रातः 04:42 बजे ।
हिंदू पंचांग में भगवान गणेश की उपासना के लिए चतुर्थी तिथि को सबसे उत्तम माना गया है। हर महीने के कृष्ण पक्ष में ‘संकष्टी चतुर्थी’ और शुक्ल पक्ष में ‘विनायक चतुर्थी’ का व्रत रखा जाता है। गणेश पुराण और मुद्गल पुराण के अनुसार, साल के बारह महीनों में आने वाली विनायक चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के अलग-अलग नामों और स्वरूपों की पूजा की जाती है।
इसी क्रम में, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को ‘अनिरुद्ध विनायक चतुर्थी‘ के नाम से जाना जाता है। इस दिन विघ्नहर्ता श्री गणेश के ‘अनिरुद्ध’ स्वरूप की आराधना की जाती है।
आइए, इस पावन व्रत के अर्थ, धार्मिक महत्व और पूर्ण पूजा विधि को विस्तार से समझते हैं।
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‘अनिरुद्ध‘ स्वरूप का अर्थ और महत्व
संस्कृत भाषा में ‘अनिरुद्ध‘ का अर्थ होता है- “जिसे कोई रोक न सके” (Unstoppable) या “बाधारहित”। भगवान गणेश का यह स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली और अजेय माना गया है।
इस दिन भगवान गणेश के अनिरुद्ध स्वरूप की पूजा करने का विशेष महत्व है:
- निर्बाध सफलता: जो व्यक्ति किसी नए कार्य, व्यापार या प्रोजेक्ट की शुरुआत कर रहा हो और उसमें बार-बार रुकावटें आ रही हों, उसे अनिरुद्ध विनायक चतुर्थी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से सभी बाधाएं अपने आप दूर हो जाती हैं।
- संकल्प की पूर्ति: अनिरुद्ध स्वरूप इच्छाशक्ति (Willpower) का प्रतीक है। इस दिन पूजा करने से व्यक्ति का मानसिक बल बढ़ता है और वह अपने लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त कर लेता है।
- शत्रु और नकारात्मकता का नाश: भगवान गणेश का यह अजेय स्वरूप जीवन की हर नकारात्मक ऊर्जा और शत्रुओं के बुरे प्रभाव को समाप्त कर देता है।
विनायक चतुर्थी की पूजा का समय: ‘मध्याह्न काल‘
यहाँ यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि संकष्टी चतुर्थी (कृष्ण पक्ष) में जहाँ चंद्र दर्शन और शाम की पूजा का महत्व होता है, वहीं विनायक चतुर्थी (शुक्ल पक्ष) में पूजा हमेशा ‘मध्याह्न‘ (दोपहर के समय) की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान गणेश का प्राकट्य दोपहर के समय ही हुआ था, इसलिए मध्याह्न काल की पूजा सबसे अधिक फलदायी मानी जाती है।
अनिरुद्ध विनायक चतुर्थी की पूजा विधि
इस दिन व्रत रखकर दोपहर के समय भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। इसकी सरल पूजा विधि इस प्रकार है:
- प्रातः कालीन स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नानादि कर लें। स्वच्छ (लाल या पीले) वस्त्र धारण करें और हाथ में जल तथा पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल की तैयारी: दोपहर (मध्याह्न) के समय घर के मंदिर या ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में एक लकड़ी की चौकी रखें। उस पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- अभिषेक और श्रृंगार: गणपति बाप्पा को शुद्ध जल और पंचामृत से स्नान कराएं। उन्हें कुमकुम या सिंदूर का तिलक लगाएं।
- दूर्वा और पुष्प अर्पण: भगवान गणेश को उनकी अति प्रिय ‘दूर्वा‘ (हरी घास) की 21 गांठें अर्पित करें। लाल रंग के पुष्प (विशेषकर गुड़हल) चढ़ाएं और जनेऊ पहनाएं।
- भोग (नैवेद्य): गणेश जी को मोदक, मोतीचूर के लड्डू, ऋतुफल और नारियल का भोग लगाएं।
- मंत्र जाप: पूजा के समय रुद्राक्ष या चंदन की माला से “ॐ अनिरुद्धाय नमः” या “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें।
- कथा और आरती: विनायक चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें और अंत में धूप-दीप से कपूर जलाकर भगवान गणेश की आरती करें।
व्रत के नियम और ‘चंद्र दर्शन निषेध‘
विनायक चतुर्थी के व्रत में कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
- चंद्र दर्शन की मनाही: हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन करना सख्त वर्जित है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान गणेश ने चंद्रमा को उनके रूप के अहंकार के कारण श्राप दिया था। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन चंद्रमा के दर्शन करता है, उस पर ‘मिथ्या कलंक’ (झूठा आरोप) लगने का भय रहता है।
- फलाहार का नियम: यह व्रत पूरे दिन रखा जाता है। व्रती (व्रत रखने वाला व्यक्ति) पूरे दिन अन्न का सेवन नहीं करता। शाम को फलाहार (फल, दूध, साबूदाना आदि) ग्रहण किया जा सकता है।
- सात्विकता: इस दिन घर में तामसिक भोजन (लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा) का सेवन नहीं करना चाहिए और मन में किसी के प्रति बुरे विचार नहीं लाने चाहिए।
निष्कर्ष
आषाढ़ मास की अनिरुद्ध विनायक चतुर्थी केवल एक उपवास नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर की असीमित ऊर्जा को जागृत करने का एक माध्यम है। भगवान गणेश का ‘अनिरुद्ध’ स्वरूप हमें यह सिखाता है कि यदि हमारे इरादे नेक और प्रयास निरंतर हों, तो दुनिया की कोई भी बाधा हमें सफल होने से नहीं रोक सकती। सच्चे मन से की गई इस उपासना से भगवान श्री गणेश जीवन के हर मार्ग को सुगम और मंगलमय बना देते हैं।
चतुर्थी व्रत से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: चतुर्थी व्रत क्या है?
उत्तर: चतुर्थी व्रत हर महीने की चौथी तिथि को रखा जाता है और यह भगवान गणेश को समर्पित होता है। इस व्रत से बुद्धि, समृद्धि और विघ्नों का नाश होता है।
प्रश्न 2: चतुर्थी व्रत कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर: चतुर्थी व्रत मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-
- संकष्टी चतुर्थी(कृष्ण पक्ष)
- विनायक चतुर्थी (शुक्ल पक्ष)
प्रश्न 3: संकष्टी चतुर्थी और विनायक चतुर्थी में क्या अंतर है?
उत्तर: संकष्टी चतुर्थी संकटों को दूर करने के लिए होती है और इसमें चंद्रमा को अर्घ्य देना आवश्यक है, जबकि विनायक चतुर्थी सफलता और ज्ञान प्राप्ति के लिए होती है और इसमें चंद्र दर्शन अनिवार्य नहीं होता।
प्रश्न 4: संकष्टी चतुर्थी का व्रत कब पूरा माना जाता है?
उत्तर: संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही पूर्ण माना जाता है।
प्रश्न 5: चतुर्थी व्रत में क्या खा सकते हैं?
उत्तर: व्रत में फल, दूध, साबूदाना, मूंगफली, सूखे मेवे आदि फलाहार लिया जा सकता है। पूजा के बाद सात्त्विक भोजन किया जाता है।
प्रश्न 6: चतुर्थी व्रत का मुख्य मंत्र क्या है?
उत्तर: चतुर्थी व्रत में “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।
प्रश्न 7: चतुर्थी व्रत करने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: इस व्रत से विघ्नों का नाश, बुद्धि और ज्ञान की वृद्धि, धन-समृद्धि और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
प्रश्न 8: अंगारकी चतुर्थी क्या होती है?
उत्तर: जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन पड़ती है, तो उसे अंगारकी चतुर्थी कहा जाता है। यह सबसे अधिक फलदायी मानी जाती है।
प्रश्न 9: चतुर्थी व्रत में गणेश जी को क्या भोग लगाना चाहिए?
उत्तर: भगवान गणेश को मोदक या लड्डू का भोग लगाना अनिवार्य और अत्यंत प्रिय माना जाता है।
प्रश्न 10: क्या महिलाएं चतुर्थी व्रत कर सकती हैं?
उत्तर: हाँ, महिलाएं और पुरुष दोनों ही श्रद्धा और नियमपूर्वक चतुर्थी व्रत कर सकते हैं और भगवान गणेश की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
।। जय श्री गणेश ।।
