अरण्य षष्ठी: तिथि, पूजा विधि, कथा और महत्व और माता षष्ठी की कृपा
अरण्य षष्ठी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण व्रत है, जो माता षष्ठी को समर्पित होता है।
वर्ष 2026 में यह पावन व्रत 20 जून, शनिवार को मनाया जाएगा। इस दिन महिलाएं संतान की सुख-समृद्धि, दीर्घायु और रक्षा के लिए श्रद्धापूर्वक व्रत रखती हैं तथा वन, बगीचे या किसी पवित्र वृक्ष के नीचे विधि-विधान से पूजा करती हैं।
मान्यता है कि माता षष्ठी की कृपा से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
अरण्य षष्ठी व्रत
अरण्य षष्ठी (Aranya Shashthi) हिन्दू धर्म का एक प्रमुख पर्व है जो मुख्य रूप से संतान की सुरक्षा, सुख और समृद्धि के लिए मनाया जाता है। इसे बंगाल और पूर्वी भारत में ‘जमाई षष्ठी‘ (Jamai Shashthi) के रूप में भी बहुत उत्साह से मनाया जाता है।
यहाँ अरण्य षष्ठी की संपूर्ण जानकारी, कथा, महत्व और मान्यताओं का विवरण है:
अरण्य षष्ठी का महत्व (Significance)
यह पर्व ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। ‘अरण्य’ का अर्थ है ‘वन’ या ‘जंगल’ और ‘षष्ठी’ देवी षष्ठी को समर्पित तिथि है।
- संतान की रक्षा: माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और स्वास्थ्य के लिए यह व्रत रखती हैं।
- प्रकृति पूजा: इस दिन वनों और प्रकृति की पूजा का विधान है। इसे ‘स्कंद षष्ठी’ भी कहा जाता है क्योंकि षष्ठी देवी भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की पत्नी मानी जाती हैं।
- जमाई षष्ठी (Jamai Shashthi): बंगाल में यह दिन दामाद (जमाई) को समर्पित है। सास अपने दामाद को घर बुलाती हैं, उनकी आरती उतारती हैं और उन्हें दावत देती हैं, जिससे बेटी और दामाद का जीवन सुखी रहे।
अरण्य षष्ठी की पौराणिक कथा (Vrat Katha)
इस पर्व से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा एक सास, बहू और बिल्ली की है:
एक समय की बात है, एक परिवार में एक बहु थी जो बहुत चटोरे स्वभाव की थी। घर में जब भी दूध, दही या खीर बनती, वह चोरी-छिपे खा लेती और इल्जाम घर की काली बिल्ली पर लगा देती थी। बिल्ली को बार-बार मार खानी पड़ती थी।
बिल्ली देवी षष्ठी की सवारी (वाहन) मानी जाती है। बिल्ली ने अपमान का बदला लेने के लिए एक योजना बनाई। जब उस बहु ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया, तो बिल्ली उस बच्चे को चुराकर जंगल में षष्ठी देवी के मंदिर में रख आई। बहु रोती-बिलखती रही। अगली बार फिर संतान हुई, और बिल्ली ने फिर वही किया।
परेशान होकर बहु जंगल की ओर भागी। वहां उसने देखा कि एक बूढ़ी मां (स्वयं देवी षष्ठी) बिल्ली को सहला रही हैं और उसके सारे बच्चे वहां खेल रहे हैं। बहु को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने देवी के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और स्वीकार किया कि वह अपने लोभ के कारण बिल्ली को झूठा दोषी ठहराती थी।
देवी षष्ठी ने उसे क्षमा कर दिया और निर्देश दिया कि वह ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी को ‘अरण्य षष्ठी’ का व्रत करे और बिल्ली का सम्मान करे। तब से माताएं अपनी संतान की सुरक्षा के लिए यह व्रत करती हैं।
पूजा विधि और मान्यताएं (Rituals & Beliefs)
इस व्रत में कुछ विशेष नियमों का पालन किया जाता है:
- हाथ का पंखा (Hand Fan): इस दिन बांस या ताड़ के पंखे का विशेष महत्व है। पूजा में हाथ के पंखे का उपयोग किया जाता है और हवा की जाती है।
- फलाहार: मान्यता है कि इस दिन अनाज (चावल, रोटी) नहीं खाया जाता। माताएं केवल फलाहार करती हैं।
- छह प्रकार के फल: पूजा में 6 प्रकार के फल और 6 पान के पत्ते चढ़ाने की परंपरा है।
- षष्ठी सूत्र (धागा): पूजा के बाद एक पवित्र धागा (जिसे ‘षष्ठी डोरा’ कहते हैं) संतान की कलाई पर बांधा जाता है।
- बिल्ली का सम्मान: इस दिन बिल्ली को मारना या भगाना अशुभ माना जाता है। बिल्ली के लिए दूध या भोजन अलग से निकाला जाता है।
- जंगल या बाग में पूजा: यदि संभव हो, तो घर से बाहर किसी बाग या खुले स्थान (अरण्य के प्रतीक) में जाकर पूजा करनी चाहिए।
जमाई षष्ठी विशेष (बंगाल):
बंगाल में सास इस दिन दामाद के माथे पर दही का तिलक लगाती हैं और उनकी कलाई पर पीला धागा बांधती हैं। दामाद के लिए मछली, मिठाई और विविध प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं। इसे एक तरह से ‘दामाद दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
अरण्य षष्ठी 2026 – FAQ
1. अरण्य षष्ठी कब है?
अरण्य षष्ठी व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है।
2. अरण्य षष्ठी व्रत किसके लिए रखा जाता है?
यह व्रत मुख्य रूप से संतान की सुख-समृद्धि, लंबी आयु और सुरक्षा के लिए रखा जाता है। माताएं अपने बच्चों के कल्याण हेतु यह व्रत करती हैं।
3. अरण्य षष्ठी पर किस देवी की पूजा की जाती है?
इस दिन माता षष्ठी की पूजा की जाती है, जिन्हें बच्चों की रक्षक देवी माना जाता है।
4. अरण्य षष्ठी को ‘जमाई षष्ठी’ क्यों कहा जाता है?
पूर्वी भारत, विशेषकर बंगाल में इस दिन को जमाई षष्ठी के रूप में मनाया जाता है, जहां सास अपने दामाद का सम्मान करती हैं और उनके लिए विशेष भोजन बनाती हैं।
5. अरण्य षष्ठी की पूजा कहाँ की जाती है?
इस व्रत में वन, बगीचे या किसी पवित्र वृक्ष के नीचे पूजा करना शुभ माना जाता है। यह प्रकृति पूजा का भी प्रतीक है।
6. अरण्य षष्ठी व्रत में क्या खाना चाहिए?
इस दिन फलाहार करने की परंपरा है। अनाज का सेवन नहीं किया जाता और केवल फल, दूध आदि ग्रहण किए जाते हैं।
7. अरण्य षष्ठी में बिल्ली का क्या महत्व है?
बिल्ली को माता षष्ठी का वाहन माना जाता है। इसलिए इस दिन बिल्ली का सम्मान करना और उसे भोजन देना शुभ माना जाता है।
|| जय माता षष्ठी ||
