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आशा दशमी व्रत: जीवन में नई उम्मीद और मनोकामनाएं पूर्ण करने का पावन पर्व

आशा दशमी व्रत शुक्रवार, 24 जुलाई 2026 ।

दशमी तिथि प्रारम्भ: 23 जुलाई 2026, प्रातः 07:03 बजे ।

दशमी तिथि समाप्त: 24 जुलाई 2026, प्रातः 09:12 बजे ।

मनुष्य का पूरा जीवन ‘आशा’ यानी उम्मीद (Hope) पर टिका होता है। जब चारों तरफ से निराशा घेर ले और कोई रास्ता नजर न आए, तब हिंदू धर्म में एक ऐसा अद्भुत व्रत बताया गया है जो जीवन में पुनः नई आशा का संचार करता है। इस व्रत को आशा दशमी‘ (Asha Dashami) कहा जाता है।

हिन्दू पंचांग के अनुसार, यह व्रत मुख्य रूप से आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि (देवशयनी एकादशी से ठीक एक दिन पहले) को रखा जाता है। कुछ स्थानों पर इसे श्रावण या अन्य महीनों की दशमी को भी पूजने का विधान है। आइए, इस चमत्कारी और सकारात्मकता से भरे व्रत के महत्व, पूजा विधि और कथा के बारे में विस्तार से जानते हैं।

यहाँ आशा दशमी की कथा, महत्व और पूजा विधि का विस्तृत विवरण है:

आशा दशमी व्रत 2026 इमेज

आशा दशमी व्रत की पौराणिक कथा

कथा 1

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडव अपना सब कुछ हारकर वनवास भोग रहे थे, तब उनके जीवन में घोर निराशा छा गई थी। भविष्य को लेकर कोई आशा नजर नहीं आ रही थी।

तब एक दिन भगवान श्रीकृष्ण पांडवों से मिलने वन में आए। धर्मराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा, “हे माधव! हम अपने राज्य और सम्मान को खो चुके हैं। क्या कोई ऐसा उपाय या व्रत है जिससे हमारे जीवन की खोई हुई आशा पुनः लौट सके और हमें हमारा खोया हुआ राज्य वापस मिल जाए?”

तब भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को आशा दशमी व्रत’ के बारे में बताया। उन्होंने कहा, “हे धर्मराज! आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन जो भी मनुष्य दसों दिशाओं के देवों और माता पार्वती की उपासना करता है, उसकी हर नष्ट हो चुकी उम्मीद फिर से जीवित हो जाती है।”

श्रीकृष्ण की आज्ञा मानकर द्रौपदी सहित सभी पांडवों ने पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान के साथ आशा दशमी का व्रत किया। इसी व्रत के पुण्य प्रभाव से पांडवों को अनेक देवों से दिव्य अस्त्र प्राप्त हुए, अज्ञातवास सफलतापूर्वक पूर्ण हुआ और अंततः महाभारत के युद्ध में विजयी होकर उन्हें अपना राज्य पुनः प्राप्त हुआ।

 

कथा 2

इस व्रत से जुड़ी दूसरी सबसे प्रचलित कथा राजा नल और दमयंती की है:

पौराणिक काल में निषध देश के राजा नल और उनकी पत्नी दमयंती सुखपूर्वक राज्य करते थे। लेकिन कलयुग के प्रभाव और जुए (Dicing) में अपना सब कुछ हार जाने के कारण राजा नल को अपना राज्य छोड़ना पड़ा।

राजा नल और रानी दमयंती को वन-वन भटकना पड़ा और अंततः वे दोनों भी एक-दूसरे से बिछड़ गए। रानी दमयंती अपने पति से अलग होकर बहुत दुखी थीं। तब उन्हें एक ऋषि ने आशा दशमी व्रत करने की सलाह दी। ऋषि ने कहा कि इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारी निराशा आशा में बदल जाएगी और तुम्हें तुम्हारा पति व राज्य वापस मिलेगा।

दमयंती ने आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन पूरी श्रद्धा से दसों दिशाओं के देवताओं का आवाहन किया और व्रत रखा। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से राजा नल और दमयंती का पुनर्मिलन हुआ और उन्हें अपना खोया हुआ राज्य व सुख-समृद्धि वापस मिल गई।

तब से यह मान्यता है कि जो भी व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) इस व्रत को करता है, उसकी खोई हुई प्रतिष्ठा या अधूरी इच्छा पूरी हो जाती है।

 

आशा दशमी व्रत का महत्व और मान्यताएं

आशा दशमी का व्रत मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा अपने पति, संतान और परिवार की खुशहाली के लिए रखा जाता है। इस व्रत का महत्व निम्नलिखित है:

  • निराशा का अंत: जो लोग अपने जीवन, व्यापार या रिश्तों में पूरी तरह से निराश हो चुके हैं, इस व्रत को करने से उनके भीतर एक नई सकारात्मक ऊर्जा और उत्साह का संचार होता है।
  • दसों दिशाओं से सफलता: यह व्रत दसों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और इनके मध्य के कोणों तथा आकाश व पाताल) के देवताओं को समर्पित है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से साधक को हर दिशा से शुभ समाचार और सफलता प्राप्त होती है।
  • मनचाही मुराद पूरी होना: माता पार्वती को ‘आशा देवी’ के रूप में पूजा जाता है। सच्चे मन से इस दिन मांगा गया वरदान कभी खाली नहीं जाता।
  • सुखद दांपत्य जीवन: अविवाहित कन्याएं सुयोग्य वर प्राप्ति के लिए और सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत पूरे विधि-विधान से करती हैं।

आशा दशमी पर किनकी पूजा होती है?

इस दिन मुख्य रूप से माता पार्वती (आशा देवी के स्वरूप में) और दसों दिशाओं के रक्षक देवताओं (दिक्पालों) की पूजा की जाती है। इन दस देवताओं में— इंद्र, अग्नि, यम, नैऋत्य, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा (ऊर्ध्व) और अनंत (अधो) शामिल हैं।

आशा दशमी व्रत की संपूर्ण पूजा विधि

चूंकि यह व्रत दसों दिशाओं और माता पार्वती से जुड़ा है, इसलिए इसकी पूजा विधि थोड़ी विशेष होती है:

  1. प्रातः कालीन स्नान: दशमी तिथि की सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि कर लें। स्वच्छ वस्त्र धारण करके मन ही मन व्रत का संकल्प लें कि “हे माता, मेरी सभी आशाएं पूर्ण करें, मैं आज आपका व्रत करूंगी।”
  2. पूजा का स्थान तैयार करना: घर के आंगन या पूजा कक्ष में पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर शिव-पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  3. दसों दिशाओं का पूजन (10 दीपक): इस व्रत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें आटे या मिट्टी के 10 दीपक बनाए जाते हैं। इन दसों दीपकों में घी या तिल का तेल डालकर दसों दिशाओं का स्मरण करते हुए प्रज्वलित करें।
  4. माता पार्वती का श्रृंगार: माता पार्वती को लाल चुनरी, सिंदूर, पुष्प, अक्षत, धूप और दीप अर्पित करें।
  5. नैवेद्य और फल: भगवान को ऋतुफल, मिठाई और अपनी सामर्थ्य के अनुसार नैवेद्य का भोग लगाएं।
  6. मंत्र जाप: पूजा के दौरान ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः” या माता पार्वती के मंत्रों का जाप करें। इसके बाद आशा दशमी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  7. ब्राह्मण भोजन और दान: अगले दिन (एकादशी को) व्रत का पारण करने से पहले किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को भोजन कराएं और अपनी क्षमता अनुसार दान-दक्षिणा देकर आशीर्वाद लें।

|| जय माता पार्वती ||

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