गजानन संकष्टी चतुर्थी: जानें तिथि, चंद्र दर्शन, व्रत कथा, महत्व और मान्यता
गजानन संकष्टी चतुर्थी व्रत रविवार, 2 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा।
वहीं, संकष्टी चतुर्थी के दिन चन्द्रोदय रात्रि 09:24 बजे होगा। इसके बाद भक्त चंद्र दर्शन करके व्रत का पारण करेंगे।
पंचांग के अनुसार, चतुर्थी तिथि का प्रारम्भ 01 अगस्त 2026 को रात्रि 11:07 बजे से होगा। वहीं, चतुर्थी तिथि का समापन 02 अगस्त 2026 को रात्रि 11:15 बजे पर होगा।
भगवान शिव के सबसे प्रिय महीने ‘श्रावण‘ (सावन) के कृष्ण पक्ष में आने वाली संकष्टी चतुर्थी को ‘गजानन संकष्टी चतुर्थी‘ (Gajanan Sankashti Chaturthi) के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान गणेश के ‘गजानन’ स्वरूप की आराधना की जाती है। शिव के मास में उनके पुत्र गणेश की पूजा का यह संयोग अत्यंत मंगलकारी माना जाता है।
‘गजानन’ भगवान गणेश का वह स्वरूप है जो अपार ज्ञान, शक्ति और विशाल दृष्टिकोण का प्रतीक है। गज (हाथी) का मस्तक बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता को दर्शाता है। सावन के पवित्र महीने में पड़ने के कारण इस संकष्टी चतुर्थी का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि इस माह में शिव परिवार की पूजा विशेष फलदायी होती है। विनायक चतुर्थी के विपरीत (जिसमें चंद्र दर्शन वर्जित है), संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा के दर्शन और उन्हें अर्घ्य देने के बाद ही पूर्ण माना जाता है। आइए, इस पवित्र व्रत के महत्व और पौराणिक कथा को विस्तार से समझते हैं।
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गजानन संकष्टी चतुर्थी की कथा1
धार्मिक परंपराओं में एक प्रसिद्ध कथा प्रचलित है कि एक बार भगवान श्रीविष्णु और माता लक्ष्मी के दिव्य विवाह का आयोजन हुआ। इस शुभ अवसर पर सभी देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों और गंधर्वों को आमंत्रित किया गया। किंतु किसी कारणवश भगवान श्रीगणेश का यथोचित सम्मान नहीं हो पाया।
जब विवाह-बारात प्रस्थान करने लगी, तब भगवान गणेश ने देखा कि किसी ने प्रथम पूज्य होने के बावजूद उनका विधिवत पूजन नहीं किया। उन्होंने अपने वाहन मूषक को संकेत दिया। मूषक ने मार्ग के नीचे सुरंग बना दी, जिससे भगवान विष्णु के रथ का पहिया भूमि में धँस गया।
देवताओं ने रथ को निकालने का बहुत प्रयास किया, परंतु सफलता नहीं मिली। तब देवर्षि नारद ने कहा, “किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान श्रीगणेश की पूजा के बिना पूर्ण नहीं होती। पहले विघ्नहर्ता का स्मरण करें।”
यह सुनकर सभी देवताओं ने भगवान गणेश से क्षमा माँगी और श्रद्धापूर्वक उनका पूजन किया। भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उनके आशीर्वाद से रथ का पहिया तुरंत बाहर निकल आया। इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विवाह बिना किसी विघ्न के संपन्न हुआ।
तभी से यह धार्मिक मान्यता प्रचलित है कि किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश का स्मरण और पूजन अवश्य करना चाहिए। विशेष रूप से गजानन संकष्टी चतुर्थी के दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान गणेश की आराधना करने से जीवन के विघ्न दूर होते हैं तथा कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
कथा से मिलने वाली सीख
यह कथा हमें सिखाती है कि किसी भी शुभ कार्य का आरंभ भगवान श्रीगणेश के स्मरण से करना चाहिए। साथ ही, अहंकार और उपेक्षा के स्थान पर विनम्रता, श्रद्धा और सम्मान का भाव रखने से जीवन की अनेक बाधाएँ स्वतः दूर हो जाती हैं।
गजानन संकष्टी चतुर्थी की कथा2
प्राचीन काल में महीजित नामक एक प्रतापी और न्यायप्रिय राजा थे। उनका राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण था, लेकिन राजा को एक बहुत बड़ा दुःख था- उनकी कोई संतान नहीं थी। राजा ने अपनी प्रजा का पालन हमेशा अपनी संतान की तरह किया, इसलिए प्रजा भी राजा के दुःख से दुखी थी।
एक बार प्रजा और मंत्रीगण मिलकर वन में लोमश ऋषि के आश्रम में गए और राजा के निःसंतान होने का कारण पूछा। महर्षि लोमश ने अपने तपोबल से राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत देखा और बताया, “पिछले जन्म में राजा एक निर्धन वैश्य थे। एक बार सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन वे भूखे-प्यासे एक तालाब के पास गए। वहां एक प्यासी गाय जल पीने आई, लेकिन वैश्य ने उसे भगा दिया और स्वयं जल पी लिया। प्यासी गाय को भगाने के पाप के कारण इस जन्म में राजा निःसंतान हैं, लेकिन अनजाने में ही सही, उस दिन भूखे-प्यासे रहने से उनका चतुर्थी का व्रत हो गया, जिसके प्रभाव से वे इस जन्म में एक प्रतापी राजा बने।”
ऋषि ने उपाय बताते हुए कहा कि यदि राजा और रानी पूरे विधि-विधान से श्रावण कृष्ण पक्ष की ‘गजानन संकष्टी चतुर्थी’ का व्रत करें और उस पाप का प्रायश्चित करें, तो उन्हें अवश्य संतान सुख मिलेगा।
राजा महीजित और उनकी पत्नी ने महर्षि लोमश के बताए अनुसार कठोर नियम से गजानन संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया। भगवान गजानन की कृपा से रानी गर्भवती हुईं और समय आने पर उन्होंने एक सुंदर और गुणवान पुत्र को जन्म दिया।
कथा से मिलने वाली सीख
यह कथा हमें सिखाती है कि प्रत्येक जीव पर दया करना, पशु-पक्षियों के प्रति करुणा रखना और अपने कर्मों की शुद्धता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। साथ ही, सच्ची श्रद्धा, प्रायश्चित और ईश्वर में विश्वास से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन संभव हैं।
गजानन संकष्टी चतुर्थी का महत्व और मान्यताएं
गजानन संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान श्रीगणेश की कृपा प्राप्त करने और जीवन की बाधाओं को दूर करने के लिए किया जाता है। इस व्रत से जुड़ी प्रमुख धार्मिक मान्यताएं इस प्रकार हैं—
- संतान सुख की कामना: धार्मिक मान्यता है कि जो दंपति संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, वे श्रद्धा और नियमपूर्वक यह व्रत करके भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
- जीवन के संकटों से राहत: मान्यता है कि भगवान गजानन की पूजा करने से जीवन की कठिनाइयों का सामना करने का साहस मिलता है और कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होने लगती हैं।
- मन की शांति: संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रमा को अर्घ्य देने और भगवान गणेश की आराधना करने से मन शांत रहता है तथा मानसिक तनाव कम करने की प्रेरणा मिलती है।
- सुख-समृद्धि की कामना: इस दिन भगवान गणेश को मोदक, गुड़, तिल या अन्य प्रिय नैवेद्य अर्पित कर परिवार के सुख, समृद्धि और आर्थिक उन्नति की प्रार्थना की जाती है।
निष्कर्ष
गजानन संकष्टी चतुर्थी का पर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन में कोई भी शुभ कार्य या नया कदम उठाने से पहले ईश्वर का स्मरण और अपनी जड़ों (प्रथम पूज्य) का सम्मान करना बहुत आवश्यक है। सावन के महीने में शिव और गणेश दोनों की कृपा पाने का यह एक सुनहरा अवसर है। सच्चे मन से किया गया यह व्रत जीवन को हर दिशा में सफल और मंगलमय बनाता है।
|| जय जय श्री गणेश ||
