गजानन संकष्टी चतुर्थी 2026: तिथि, चंद्र दर्शन समय, पूजा विधि, नियम और पौराणिक व्रत कथा
गजानन संकष्टी चतुर्थी व्रत रविवार, 2 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा।
वहीं, संकष्टी चतुर्थी के दिन चन्द्रोदय रात्रि 09:24 बजे होगा। इसके बाद भक्त चंद्र दर्शन करके व्रत का पारण करेंगे।
पंचांग के अनुसार, चतुर्थी तिथि का प्रारम्भ 01 अगस्त 2026 को रात्रि 11:07 बजे से होगा। वहीं, चतुर्थी तिथि का समापन 02 अगस्त 2026 को रात्रि 11:15 बजे पर होगा।
चतुर्थी व्रत क्या है?
हिन्दू पंचांग के अनुसार, चंद्र मास की चौथी तिथि को चतुर्थी कहते हैं। यह तिथि भगवान श्री गणेश को समर्पित है, जो बुद्धि, समृद्धि और विघ्नहर्ता के रूप में पूजे जाते हैं।
चतुर्थी व्रत मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं, जो हर महीने आते हैं:
- संकष्टी चतुर्थी (Sankashti Chaturthi): यह कृष्ण पक्ष (अंधेरे पखवाड़े) की चतुर्थी को होती है। ‘संकष्टी’ का अर्थ है संकट को हरने वाला। यह व्रत संकटों से मुक्ति दिलाने के लिए रखा जाता है।
- विनायक चतुर्थी (Vinayaka Chaturthi): यह शुक्ल पक्ष (उज्जवल पखवाड़े) की चतुर्थी को होती है। यह व्रत विशेष रूप से विजय, ज्ञान और सफलता की प्राप्ति के लिए रखा जाता है। (भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी या गणेशोत्सव कहते हैं, जो सबसे बड़ी चतुर्थी होती है)।
भगवान शिव के सबसे प्रिय महीने ‘श्रावण‘ (सावन) के कृष्ण पक्ष में आने वाली संकष्टी चतुर्थी को ‘गजानन संकष्टी चतुर्थी‘ (Gajanan Sankashti Chaturthi) के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान गणेश के ‘गजानन’ स्वरूप (विष्णु पीठ पर) की आराधना की जाती है। शिव के मास में उनके पुत्र गणेश की पूजा का यह संयोग अत्यंत मंगलकारी माना जाता है। आइए, साल 2026 में आने वाले इस पवित्र व्रत के महत्व, पूजा विधि और पौराणिक कथा को विस्तार से समझते हैं।
भगवान गणेश जी की आरती और चालीसा का पाठ करने के लिए यहाँ क्लिक करें।
गजानन संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक व्रत कथा
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे वासुदेव! श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को कौन सी संकष्टी होती है, और इस दिन किस देवता की पूजा करनी चाहिए? कृपया इसकी कथा सुनाएं।”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे युधिष्ठिर! श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को ‘गजानन संकष्टी चतुर्थी’ कहा जाता है। इस दिन श्री गणेश के ‘गजानन’ स्वरूप की पूजा की जाती है। मैं तुम्हें एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ, ध्यान से सुनो।”
प्राचीन काल में देवलोक में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विवाह समारोह आयोजित किया जा रहा था। इस विवाह में ब्रह्मा जी, शिव जी सहित सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन किसी कारणवश भगवान गणेश को निमंत्रण नहीं दिया गया (या कुछ कथाओं के अनुसार, उन्हें बालक समझकर द्वारपाल के रूप में खड़ा कर दिया गया)।
जब बारात निकलने का समय हुआ, तो भगवान गणेश को इस बात का बहुत बुरा लगा। उन्होंने क्रोधित होकर अपने मूषक (चूहे) सेनापति को आदेश दिया कि वह जाकर विवाह के मार्ग को भीतर से खोखला कर दे। चूहों ने ऐसा ही किया।
जब भगवान विष्णु का रथ उस मार्ग से गुजरा, तो रथ के पहिए धरती में धंस गए। लाख कोशिशों के बाद भी पहिए नहीं निकले और बारात वहीं रुक गई। सभी देवता परेशान हो गए। तब किसी ज्ञानी ने बताया कि आपने प्रथम पूज्य भगवान गणेश का अपमान किया है, यह उन्हीं के क्रोध का परिणाम है।
अपनी भूल का अहसास होने पर सभी देवता भगवान गणेश के पास गए और उनकी स्तुति कर क्षमा मांगी। देवताओं के आग्रह पर भगवान गणेश ने उन्हें क्षमा कर दिया और अपने ‘गजानन’ स्वरूप में आकर स्वयं अपने हाथों से रथ के पहियों को गड्ढे से बाहर निकाला। इसके बाद ही भगवान विष्णु का विवाह निर्विघ्न संपन्न हो सका।
श्रीकृष्ण ने कहा, “हे युधिष्ठिर! जो भी मनुष्य सावन के इस पवित्र महीने में गजानन संकष्टी चतुर्थी का व्रत करता है, उसके जीवन के रथ के पहिए कभी भी संकटों के गड्ढे में नहीं धंसते। भगवान गजानन स्वयं उसके मार्ग की सारी बाधाएं दूर कर देते हैं।”
‘गजानन‘ स्वरूप का अर्थ और व्रत का महत्व
‘गजानन’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘गज’ (हाथी) और ‘आनन’ (मुख)। अर्थात् जिनका मुख हाथी के समान है, वे गजानन हैं। हाथी को विशालता, बुद्धि, धैर्य और असीम शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
सावन मास की इस गजानन संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से जीवन में अनेक दिव्य लाभ प्राप्त होते हैं:
- सभी कष्टों का अंत: सावन के महीने में भगवान शिव के साथ-साथ श्री गणेश की कृपा बरसती है, जिससे जीवन के बड़े से बड़े संकट और बाधाएं दूर हो जाती हैं।
- बुद्धि और विवेक की प्राप्ति: गजानन स्वरूप की पूजा छात्रों और ज्ञान अर्जन करने वाले लोगों के लिए अत्यंत फलदायी है। इससे बुद्धि कुशाग्र होती है और एकाग्रता बढ़ती है।
- शत्रु बाधा से मुक्ति: यह व्रत नकारात्मक शक्तियों और विरोधियों के प्रभाव को क्षीण करता है।
- सुख-समृद्धि का वास: गजानन भगवान की सच्चे मन से की गई उपासना घर में धन-धान्य, शांति और समृद्धि लेकर आती है।
गजानन संकष्टी चतुर्थी की संपूर्ण पूजा विधि
संकष्टी चतुर्थी का व्रत निर्जला या फलाहार रहकर किया जाता है और इसकी मुख्य पूजा गोधूलि बेला (शाम के समय) व चंद्रोदय के समय होती है। इसकी पूजा विधि इस प्रकार है:
- प्रातः कालीन स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नानादि कर लें। स्वच्छ वस्त्र (लाल या हरे रंग के) धारण करें। हाथ में जल और दूर्वा लेकर व्रत का संकल्प लें।
- दिनचर्या: दिनभर भगवान गणेश के मंत्रों का मन ही मन जाप करें। तामसिक विचारों और क्रोध से पूरी तरह दूर रहें।
- संध्याकालीन पूजा की तैयारी: शाम के समय चंद्रोदय से पहले घर के मंदिर में एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। (चूंकि यह सावन का महीना है, इसलिए पास में शिवलिंग भी अवश्य रखें)।
- अभिषेक और श्रृंगार: गणपति बाप्पा को पंचामृत और शुद्ध जल से स्नान कराएं। उन्हें कुमकुम का तिलक लगाएं।
- प्रिय वस्तुएं अर्पित करना: भगवान गणेश को 21 दूर्वा (हरी घास), लाल पुष्प, जनेऊ और अक्षत अर्पित करें।
- नैवेद्य (भोग): गजानन को मोदक, मोतीचूर के लड्डू, तिल और मौसमी फलों (विशेषकर केले) का भोग लगाएं।
- मंत्र जाप और कथा: “ॐ गजाननाय नमः” या “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें और इसके बाद गजानन संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें।
- चंद्रमा को अर्घ्य: रात्रि में जब चंद्रोदय हो जाए, तो एक तांबे के लोटे में शुद्ध जल, थोड़ा सा दूध, सफेद फूल और चंदन डालकर चंद्र देव को अर्घ्य दें। चंद्र दर्शन के बिना यह व्रत पूर्ण नहीं माना जाता।
निष्कर्ष
गजानन संकष्टी चतुर्थी का पर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन में कोई भी शुभ कार्य या नया कदम उठाने से पहले ईश्वर का स्मरण और अपनी जड़ों (प्रथम पूज्य) का सम्मान करना बहुत आवश्यक है। सावन के महीने में शिव और गणेश दोनों की कृपा पाने का यह एक सुनहरा अवसर है। सच्चे मन से किया गया यह व्रत जीवन को हर दिशा में सफल और मंगलमय बनाता है।
|| जय जय श्री गणेश ||
