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विकट संकष्टी चतुर्थी: जीवन के सबसे 'विकट' (कठिन) संकटों को हरने वाले श्री गणेश

हिंदू पंचांग के अनुसार संकष्टी चतुर्थी 5 अप्रैल 2026, रविवार को मनाई जाएगी।

चतुर्थी तिथि का प्रारंभ 5 अप्रैल 2026 को सुबह 11 बजकर 59 मिनट पर होगा और इसका समापन 6 अप्रैल 2026 को दोपहर 2 बजकर 10 मिनट पर होगा।

संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा का उदय रात 9 बजकर 58 मिनट पर होगा।

सनातन हिंदू पंचांग में हर महीने दो चतुर्थी तिथियां आती हैं- शुक्ल पक्ष की ‘विनायक चतुर्थी’ और कृष्ण पक्ष की ‘संकष्टी चतुर्थी’। ‘संकष्टी’ का अर्थ ही है- ‘संकटों को हरने वाली’

हिंदू नववर्ष के दूसरे महीने यानी वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को ‘विकट संकष्टी चतुर्थी’ कहा जाता है। भगवान गणेश के 32 विभिन्न स्वरूपों में से एक अत्यंत शक्तिशाली स्वरूप ‘विकट’ है। जब जीवन में परेशानियां अत्यंत विकट (विशाल और जटिल) रूप ले लें और कोई रास्ता नज़र न आए, तब इस चतुर्थी का व्रत और पूजन अचूक फल देता है। आइए, विकट संकष्टी के रहस्य, भगवान गणेश के मयूर वाहन वाले स्वरूप की कथा और पूजा विधि को विस्तार से समझते हैं।

Ganesh Chaturthi Vrat Puja

पौराणिक कथा: ‘विकट’ अवतार और कामासुर की पराजय 

मुद्गल पुराण के अनुसार, विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के ‘विकट अवतार’ की यह अद्भुत कथा सुनी जाती है:

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में कामासुर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था। उसने कठोर तपस्या और अपने पराक्रम के बल पर महान शक्तियाँ प्राप्त कर लीं। शक्ति प्राप्त होते ही वह अहंकारी हो गया और तीनों लोकों में अपना आतंक फैलाने लगा। उसके अत्याचारों से देवता, ऋषि-मुनि और सामान्य प्रजा सभी दुखी हो गए। यज्ञ, तप और धर्म के कार्यों में भी अनेक बाधाएँ उत्पन्न होने लगीं।

सभी देवताओं और ऋषियों ने भगवान गणेश का स्मरण किया और उनसे इस संकट से रक्षा करने की प्रार्थना की। भक्तों की पुकार सुनकर भगवान गणेश ने विकट अवतार धारण किया। इस दिव्य स्वरूप में उनका वाहन मयूर (मोर) था, जो विवेक, सौंदर्य और मन पर नियंत्रण का प्रतीक माना जाता है।

भगवान विकट और कामासुर के बीच घोर युद्ध हुआ। अंततः भगवान गणेश ने अपने दिव्य पराक्रम से कामासुर के अहंकार का नाश कर उसे पराजित कर दिया। अपनी पराजय के बाद कामासुर को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने भगवान गणेश की शरण ग्रहण की और अधर्म का मार्ग छोड़कर धर्म और सदाचार का पालन करने का संकल्प लिया। भगवान गणेश ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर उसे क्षमा कर दिया।

कथा से मिलने वाली शिक्षा

यह कथा केवल एक दैत्य-वध की कहानी नहीं, बल्कि आत्मसंयम और विवेक का संदेश भी देती है। कामासुर मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाली अनियंत्रित इच्छाओं, वासनाओं और अहंकार का प्रतीक है, जबकि भगवान विकट गणेश विवेक, संयम और आत्मबल के प्रतीक हैं। जब व्यक्ति श्रद्धापूर्वक भगवान गणेश की उपासना करता है, तो उसे अपने मन पर नियंत्रण रखने, बुरी प्रवृत्तियों पर विजय पाने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।

विकट संकष्टी चतुर्थी का महत्व

भगवान गणेश का ‘विकट’ अवतार मुख्य रूप से मनुष्य के भीतर के विकारों (विशेषकर काम और वासना) को नष्ट करने के लिए हुआ था। इस दिन व्रत रखने के प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:

महत्व का क्षेत्रविकट संकष्टी व्रत का प्रभाव
जटिल समस्याओं का अंतजीवन में कोर्ट-कचहरी, भारी कर्ज या पारिवारिक कलह जैसी ‘विकट’ बाधाएं इस व्रत के प्रभाव से चमत्कारिक रूप से सुलझने लगती हैं।
बुध और राहु ग्रह की शांतिज्योतिष के अनुसार, भगवान गणेश बुध और राहु ग्रह को नियंत्रित करते हैं। इस दिन दूर्वा चढ़ाने से बुद्धि कुशाग्र होती है और राहु का भ्रम दूर होता है।
मानसिक शांति और निर्णय क्षमताचंद्रोदय के समय चंद्रमा को अर्घ्य देने से मानसिक तनाव (Stress) समाप्त होता है और सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है।
शत्रुओं पर विजयविकट स्वरूप की आराधना साधक को एक अजेय ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे गुप्त शत्रु स्वयं ही परास्त हो जाते हैं।

संकष्टी चतुर्थी का व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक रात में चंद्रमा के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य न दिया जाए। इसकी संपूर्ण सात्विक विधि इस प्रकार है:

  1. सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। लाल या पीले वस्त्र धारण करें और हाथ में जल व अक्षत लेकर निर्जला या फलाहारी व्रत का संकल्प लें।

  2. संकष्टी चतुर्थी की मुख्य पूजा सूर्यास्त के बाद (चंद्रोदय से कुछ समय पहले) की जाती है। घर के मंदिर में उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।

  3. एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा रखें। उन्हें सिंदूर (रोली) का तिलक लगाएं और लाल फूल (विशेषकर गुड़हल) अर्पित करें।

  4. भगवान गणेश को 21 ‘दूर्वा’ (हरी घास) की गांठें अर्पित करें। यह उनके क्रोध को शांत करती है। भोग में तिल के लड्डू या मोदक अवश्य चढ़ाएं।

  5. पूजा के समय रुद्राक्ष या चंदन की माला से ॐ विकटाय नमः या ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का 108 बार जाप करें।

  6. रात में जब चंद्रमा उदित हो जाए, तो एक चांदी या तांबे के लोटे में शुद्ध जल, कच्चा दूध, सफेद फूल और चंदन डालकर चंद्र देव को अर्घ्य दें। इसके बाद ही अपना व्रत खोलें (पारण करें)।

विकट संकष्टी व्रत के नियम (क्या करें, क्या न करें)

  • भगवान गणेश की पूजा में तुलसी के पत्तों का प्रयोग भूलकर भी नहीं करना चाहिए, यह शास्त्रों में निषेध बताया गया है।

  • पूजा के दौरान काले या गहरे नीले रंग के कपड़े पहनने से बचें।

  • यदि मौसम खराब होने के कारण चंद्रमा दिखाई न दे, तो पंचांग में दिए गए चंद्रोदय के समय के अनुसार, उस दिशा (पूर्व) की ओर मुख करके अर्घ्य दे दें, लेकिन बिना अर्घ्य दिए भोजन ग्रहण न करें।

  •  व्रत वाले दिन घर में पूर्ण शांति और सात्विकता का माहौल रखें। लहसुन, प्याज और मांस-मदिरा का सेवन वर्जित है।

निष्कर्ष

विकट संकष्टी चतुर्थी हमें यह सिखाती है कि जीवन की कोई भी समस्या या विकार इतना बड़ा नहीं होता, जिसे संकल्प और ईश्वर की कृपा से पार न किया जा सके। जब हम वैशाख मास की इस पावन चतुर्थी पर भगवान गणेश के ‘विकट’ स्वरूप का ध्यान करते हैं, तो वे हमारे जीवन के मार्ग में आने वाले सभी पत्थरों को हटाकर, सफलता का मार्ग प्रशस्त कर देते हैं। अपनी अनियंत्रित इच्छाओं पर लगाम लगाने और असीम मानसिक शांति पाने के लिए यह व्रत एक अचूक आध्यात्मिक औषधि है।

|| जय जय श्री गणेश ||

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