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माँ तारा: दस महाविद्याओं की दूसरी महाशक्ति, अज्ञान का नाश करने वाली और भवसागर से 'तारने' वाली देवी

वर्ष 2027 में तारा जयंती बुधवार, 14 अप्रैल 2027 को मनाई जाएगी।

नवमी तिथि प्रारंभ: 14 अप्रैल 2027 को अपराह्न 3:23 बजे

नवमी तिथि समाप्त: 15 अप्रैल 2027 को दोपहर 1:20 बजे

सनातन धर्म और तंत्र शास्त्र में ‘दस महाविद्याओं’ की साधना का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। माँ काली के बाद, दस महाविद्याओं में दूसरे स्थान पर विराजमान हैं- माँ तारा (Maa Tara)

दस महाविद्याओं (Ten Mahavidyas) के नाम: माँ काली, माँ तारा, माँ त्रिपुर सुंदरी, माँ भुवनेश्वरी, माँ छिन्नमस्ता, माँ त्रिपुर भैरवी, माँ धूमावती, माँ बगलामुखी, माँ मातंगी, माँ कमला

‘तारा’ शब्द का अर्थ है- तारने वाली (उद्धार करने वाली) या पार लगाने वाली। जो देवी अपने भक्तों को जीवन के भयंकर संकटों, मृत्यु के भय और संसार रूपी भवसागर से सुरक्षित पार निकाल ले, वही माँ तारा हैं। बौद्ध धर्म (विशेषकर तिब्बती बौद्ध धर्म) और हिंदू तंत्र शास्त्र, दोनों में माँ तारा की उपासना सर्वोच्च मानी गई है। उग्र होने के बावजूद यह देवी अपने भक्तों के लिए एक ममतामयी माता के समान हैं। आइए, माँ तारा के रहस्यमयी स्वरूप, उनके प्राकट्य की कथा, आध्यात्मिक महत्व और पूजा के नियमों को विस्तार से समझते हैं।

द्वितीय महाविद्या माँ तारा

माँ तारा कौन हैं?

माँ तारा का स्वरूप पहली दृष्टि में माँ काली के समान ही भयंकर और उग्र प्रतीत होता है, लेकिन इनमें कुछ सूक्ष्म भिन्नताएं हैं। शास्त्रों में इनके स्वरूप का वर्णन इस प्रकार है:

  • रंग और आभा: माता का रंग गहरा नीला (नील वर्ण) है, इसलिए इन्हें नील सरस्वती भी कहा जाता है। उनका शरीर कुछ स्थूल (विशाल) है।
  • अस्त्र-शस्त्र: माँ तारा के चार हाथ हैं। वे अपने हाथों में खड्ग (तलवार), कैंची, खोपड़ी (कपाल) और नीलकमल (Blue Lotus) धारण करती हैं।
  • मुंडमाला और शिव पर आसन: माता ने गले में मुंडों (खोपड़ियों) की माला पहनी है। उनका एक पैर भगवान शिव की छाती पर रखा हुआ है (जो शव रूप में लेटे हैं)।
  • कैंची का रहस्य: माँ तारा के हाथ में मौजूद कैंची अत्यंत प्रतीकात्मक है। यह अज्ञानता, झूठे मोह और सांसारिक बंधनों को काटने का प्रतीक है।

माँ तारा के मुख्य रूप से तीन स्वरूप माने गए हैं: उग्र तारा (संकटों का नाश करने वाली), नील सरस्वती (ज्ञान और विद्या देने वाली), और एकजटा (मोक्ष प्रदान करने वाली)।


माँ तारा के प्राकट्य की पौराणिक कथा (समुद्र मंथन और हलाहल विष)

माँ तारा की उत्पत्ति की सबसे प्रामाणिक और प्रसिद्ध कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है:

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया, तो उसमें से कई बहुमूल्य रत्न निकले। लेकिन अमृत से पहले समुद्र से अत्यंत भयंकर और विनाशकारी हलाहल विष‘ (कालकूट विष) निकला। इस विष की गर्मी और प्रभाव इतना भयंकर था कि पूरी सृष्टि जलने लगी और हाहाकार मच गया।

सृष्टि को बचाने के लिए देवाधिदेव महादेव (भगवान शिव) ने उस हलाहल विष को पी लिया और उसे अपने कंठ (गले) में रोक लिया। विष के भयंकर प्रभाव से शिव जी का कंठ नीला पड़ गया (जिससे वे नीलकंठ कहलाए), लेकिन विष की जलन इतनी असहनीय थी कि भगवान शिव मूर्छित होने लगे और उनके शरीर का ताप बढ़ने लगा।

भगवान शिव की यह पीड़ा देखकर आदिशक्ति माँ भगवती अत्यंत व्याकुल हो गईं। शिव जी को विष की जलन से बचाने के लिए माता ने एक अत्यंत ममतामयी और विशाल स्वरूप धारण किया- यही माँ तारा का प्राकट्य था।

माँ तारा ने एक माता की तरह भगवान शिव को अपनी गोद में उठाया और उन्हें अपना स्तनपान (दूध) कराया। माँ तारा के दूध में वह दिव्य शक्ति थी जिसने हलाहल विष के प्रभाव और जलन को तुरंत शांत कर दिया और भगवान शिव को नवजीवन प्रदान किया। शिव जी को मृत्यु के मुख से ‘तारने’ के कारण ही माता का नाम तारा पड़ा।


माँ तारा की पूजा का महत्व और लाभ

माँ तारा की उपासना मुख्य रूप से तांत्रिक करते हैं, लेकिन सात्विक रूप से गृहस्थ भी इनकी आराधना कर सकते हैं। इनकी पूजा के अद्भुत लाभ इस प्रकार हैं:

संकटों से मुक्ति (उद्धार): यदि व्यक्ति चारों ओर से घोर संकट, कर्ज या शत्रुओं से घिर गया हो, तो माँ तारा तुरंत उसे वहां से पार निकालती हैं।

अतुलनीय ज्ञान और विद्या: ‘नील सरस्वती’ स्वरूप में माँ तारा वाणी, बुद्धि और विद्या की सर्वोच्च देवी हैं। इनकी पूजा से गूढ़ ज्ञान और वाक् सिद्धि प्राप्त होती है।

आर्थिक संपन्नता: तारा साधना से घोर दरिद्रता का नाश होता है और साधक को आकस्मिक धन व अपार ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

भय और मृत्यु पर विजय: माता की उपासना से अकाल मृत्यु का भय और अज्ञात डर हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।


माँ तारा की पूजा विधि (गृहस्थों के लिए)

माँ तारा की तांत्रिक साधना (वाममार्ग) अत्यंत कठिन है और यह केवल श्मशान में गुरु के सानिध्य में होती है। लेकिन गृहस्थ साधक सात्विक (दक्षिण मार्ग) विधि से माता की पूजा कर सकते हैं:

  1. समय और वेदी स्थापना: माता तारा की पूजा के लिए मध्य रात्रि (निशीथ काल) का समय सबसे उत्तम माना जाता है। स्नान कर नीले या सफेद वस्त्र पहनें। एक चौकी पर नीला कपड़ा बिछाकर माँ तारा का चित्र या यंत्र स्थापित करें।
  2. विशेष पूजन सामग्री: माता को नीले फूल (अपराजिता या नीलकमल), अक्षत, कुमकुम और चंदन अर्पित करें।
  3. नैवेद्य (भोग): माँ को सात्विक भोजन, दूध से बनी मिठाइयां, खीर या अनार का भोग लगाएं।
  4. मंत्र जाप: रुद्राक्ष या स्फटिक की माला से माँ तारा के अत्यंत शक्तिशाली और सिद्ध बीज मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें:
    • सिद्ध बीज मंत्र: ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्
    • सरल मंत्र: ॐ तारायै नमः
  5. क्षमा प्रार्थना: पूजा के अंत में माता की आरती करें और अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें, क्योंकि दश महाविद्या की पूजा में त्रुटि होने की संभावना रहती है।

मुख्य मान्यताएं और नियम (क्या करें, क्या न करें)

  • गुरु का महत्व सर्वोपरि: बिना किसी योग्य गुरु से दीक्षा लिए माँ तारा के तांत्रिक या उग्र मंत्रों का जाप कभी नहीं करना चाहिए। गृहस्थ केवल उनके नाम का स्मरण या चालीसा पढ़ सकते हैं।
  • तारापीठ (Tarapith): पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित ‘तारापीठ’ माँ तारा का सबसे प्रमुख और जाग्रत शक्तिपीठ है। मान्यता है कि यहां माता सती का ‘नेत्र’ (आंख) गिरा था। महान संत वामाखेपा ने यहीं माँ तारा की सिद्धि प्राप्त की थी।
  • अहंकार का त्याग: माँ तारा की साधना में साधक को अपने भीतर के ‘मैं’ (अहंकार) को पूरी तरह समाप्त करना होता है। माता केवल उसी पर कृपा करती हैं जो स्वयं को पूर्णतः उनके चरणों में समर्पित कर दे।
  • स्त्रियों का सम्मान: माता तारा स्त्री शक्ति का उग्र रूप हैं। जिस घर में कन्याओं और स्त्रियों का अपमान होता है, वहां महाविद्या की साधना कभी सफल नहीं हो सकती।

निष्कर्ष

माँ तारा केवल एक देवी नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की वह सर्वोच्च ऊर्जा हैं जो विनाश के बीच भी जीवन का सृजन करती हैं। जिस प्रकार उन्होंने हलाहल विष से जलते हुए भगवान शिव को अपनी ममता से बचा लिया था, उसी प्रकार वे आज भी अपने भक्तों को कलयुग के दुखों, बीमारियों और संकटों के विष से बचाती हैं। माँ तारा के एक हाथ में संहार की कैंची है, तो दूसरे हाथ में जीवन का कमल। जो साधक निष्काम भाव से माँ तारा की शरण में जाता है, उसे इस संसार के किसी भी तूफान से डरने की आवश्यकता नहीं रहती।

|| जय माँ तारा ||

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