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श्री तुलसीदास जयंती 2026: जानें तिथि, जीवन परिचय और महत्व

गोस्वामी तुलसीदास जी की 529वीं जन्म वर्षगांठ बुधवार, 19 अगस्त 2026 को मनाई जाएगी।

सप्तमी तिथि का प्रारम्भ 18 अगस्त 2026 को सायं 05:50 बजे से होगा। 

सप्तमी तिथि का समापन 19 अगस्त 2026 को सायं 07:19 बजे पर होगा।

भारतीय इतिहास और साहित्य में जब भी भक्ति काल‘ (Bhakti Movement) का जिक्र होता है, तो सबसे पहला और सबसे ऊँचा नाम श्री गोस्वामी तुलसीदास जी का आता है। उन्होंने रामचरितमानसके रूप में एक ऐसा महाकाव्य रचा, जिसने संस्कृत के कठिन श्लोकों में बंद भगवान राम की कथा को आम जनमानस की भाषा (अवधी) में घर-घर तक पहुँचा दिया।

हिन्दू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक वर्ष श्रावण (सावन) मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती (Tulsidas Jayanti) अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाती है। आइए, इस महान संत-कवि के जीवन संघर्ष, वैराग्य की रोचक कथा और उनकी कालजयी रचनाओं के बारे में विस्तार से जानते हैं।

रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास

तुलसीदास जी का जन्म और प्रारंभिक जीवन

गोस्वामी तुलसीदास का जीवन बचपन से ही अनेक संघर्षों और कठिनाइयों से भरा रहा। उनके जन्म स्थान और जन्म वर्ष को लेकर विद्वानों में अलग-अलग मत मिलते हैं, लेकिन सामान्य मान्यता के अनुसार उनका जन्म उत्तर प्रदेश के राजापुर गाँव में संवत 1589 (लगभग 1532 ई.) में हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था।

कहा जाता है कि जब तुलसीदास जी का जन्म हुआ, तब वे सामान्य बच्चों की तरह रोए नहीं, बल्कि उनके मुख से पहला शब्द “राम” निकला। इसी कारण उनका बचपन का नाम “रामबोला” रखा गया।

उनके जन्म से जुड़ी कुछ मान्यताओं के कारण उनका बचपन अत्यंत कष्टों में बीता। कहा जाता है कि जन्म के समय उनके मुख में 32 दाँत थे और उनका जन्म अभुक्तमूल नक्षत्र में हुआ था। उस समय इसे अशुभ माना गया और अंधविश्वास के कारण माता-पिता ने उन्हें त्याग दिया।

इसके बाद “चुनिया” नाम की एक दासी ने बड़े प्रेम से उनका पालन-पोषण किया, लेकिन जब रामबोला लगभग साढ़े पाँच वर्ष के हुए, तब चुनिया का भी निधन हो गया। इसके बाद बालक रामबोला अनाथ होकर इधर-उधर भटकने लगे और कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताने लगे।

अंततः भगवान की कृपा से उनकी भेंट महान संत गुरु नरहरिदास से हुई। गुरु नरहरिदास ने उन्हें अपने संरक्षण में लिया, उनका नाम “तुलसीदास” रखा और अयोध्या ले जाकर उन्हें राम कथा, भक्ति और शास्त्रों का ज्ञान दिया। यही से उनके जीवन की नई शुरुआत हुई और आगे चलकर वे भगवान राम के महान भक्त तथा रामचरितमानस जैसे अमर ग्रंथ के रचयिता बने।

जीवन का टर्निंग पॉइंट: पत्नी रत्नावली की वह ‘फटकार’

तुलसीदास जी का विवाह दीनबंधु पाठक की अत्यंत रूपवती पुत्री रत्नावली से हुआ था। तुलसीदास जी अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे और उनके मोह में पूरी तरह बंधे हुए थे।

एक बार रत्नावली अपने मायके चली गईं। पत्नी के बिना तुलसीदास जी का मन नहीं लगा और वे भयंकर बारिश और अंधेरी रात में उनसे मिलने निकल पड़े। कहते हैं कि उफनती नदी को पार करने के लिए उन्होंने एक बहते हुए शव (लाश) को लकड़ी का लट्ठा समझ लिया और पत्नी के कमरे तक पहुँचने के लिए बालकनी से लटक रहे एक सांप को रस्सी समझकर पकड़ लिया।

जब वे भीगे हुए रत्नावली के पास पहुँचे, तो उनकी इस ‘अंधी आसक्ति’ को देखकर रत्नावली ने उन्हें एक ऐसा दोहा कहा जिसने इतिहास बदल दिया:

अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति।

नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत॥

(अर्थात्: मेरे इस हाड़-मांस के शरीर से तुम जितना प्रेम करते हो, यदि उसका आधा प्रेम भी भगवान राम से किया होता, तो तुम्हारा जीवन संवर जाता और भवसागर पार हो जाते।)

पत्नी की यह फटकार तुलसीदास जी के दिल पर तीर की तरह लगी। उसी क्षण उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। उन्होंने तुरंत घर छोड़ दिया और तीर्थों की ओर निकल पड़े। पत्नी के प्रति उनका मोह, अब भगवान राम के प्रति असीम भक्ति में बदल चुका था।

रामचरितमानस: आम जनमानस का महाकाव्य

तुलसीदास जी ने अपना जीवन काशी (वाराणसी), अयोध्या और चित्रकूट में बिताया। भगवान राम और हनुमान जी की प्रेरणा से, उन्होंने वाल्मीकि रामायण (जो संस्कृत में थी) को अवधी भाषा में लिखने का संकल्प लिया।

संवत 1631 (सन् 1574) में रामनवमी के दिन अयोध्या में उन्होंने रामचरितमानस’ की रचना शुरू की, जिसे पूरा होने में 2 वर्ष, 7 महीने और 26 दिन का समय लगा। इस महाकाव्य ने भारतीय समाज को एक सूत्र में बांधने का काम किया। इसमें भाई का भाई से, पत्नी का पति से, और राजा का प्रजा से कैसा व्यवहार होना चाहिए, इसका आदर्श रूप प्रस्तुत किया गया है।

तुलसीदास जी की अन्य प्रमुख रचनाएं

रामचरितमानस के अलावा तुलसीदास जी ने हिंदी और ब्रज भाषा में कई महान ग्रंथों की रचना की, जिनमें प्रमुख हैं:

  1. हनुमान चालीसा: दुनिया भर में करोड़ों लोगों द्वारा प्रतिदिन पढ़ी जाने वाली यह प्रार्थना तुलसीदास जी ने ही रची थी।
  2. विनय पत्रिका: यह भगवान राम के दरबार में तुलसीदास जी द्वारा लिखी गई एक संगीतमय अर्जी (Petition) है।
  3. कवितावली और दोहावली: इसमें भगवान राम के चरित्र और नीति-उपदेशों का सुंदर वर्णन है।
  4. गीतावली: इसमें संगीतमय पदों के माध्यम से राम कथा प्रस्तुत की गई है।
  5. जानकी मंगल और पार्वती मंगल: इनमें क्रमशः सीता-राम और शिव-पार्वती के विवाह का मनोरम वर्णन है।

मान्यताएँ और जयंती पर अनुष्ठान

तुलसीदास जयंती के दिन विशेष रूप से निम्न कार्य किए जाते हैं:

  • रामचरितमानस का पाठ: इस दिन मंदिरों और घरों में पूरे ‘रामचरितमानस’ का, या उसके किसी विशेष कांड का, पाठ किया जाता है।
  • हनुमान चालीसा का पाठ: हनुमान जी की स्तुति करके तुलसीदास जी के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।
  • प्रवचन और संगोष्ठी: विभिन्न स्थानों पर तुलसीदास जी के जीवन, उनकी कृतियों और उनके भक्ति मार्ग पर आधारित धार्मिक प्रवचनों का आयोजन किया जाता है।
  • पुस्तकों का वितरण: ‘रामचरितमानस’ और तुलसीदास जी की अन्य रचनाओं का वितरण करना शुभ माना जाता है।

निष्कर्ष

 गोस्वामी तुलसीदास जी को भारतीय संस्कृति और भक्ति मार्ग का एक ऐसा प्रकाश स्तंभ माना जाता है, जिन्होंने अपनी रचनाओं से समाज को प्रेम, धर्म और मर्यादा का पाठ पढ़ाया।

|| जय श्री राम ||

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