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जैन संवत्सरी: जानें तिथि, महत्व, क्षमावाणी और पूजा विधि

जैन संवत्सरी पर्व शनिवार, 12 सितम्बर 2026 को मनाया जाएगा।

संवत्सरी पर्व 2026 पंचांग

पर्व तिथि: शनिवार, 12 सितम्बर 2026

सूर्योदय: प्रातः 06:03 बजे, सूर्यास्त: सायं 06:28 बजे

चन्द्रोदय: प्रातः 05:47 बजे, चन्द्रास्त: सायं 06:17 बजे

अयन: दक्षिणायन, ऋतु: शरद ऋतु

तिथि एवं नक्षत्र

शुक प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ: 11 सितम्बर 2026 को प्रातः 08:56 बजे से 

प्रतिपदा तिथि समाप्त: 12 सितम्बर 2026 को प्रातः 07:18 बजे तक 

संवत्सरी (Samvatsari) जैन धर्म का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। यह श्वेतांबर जैन समाज द्वारा मनाए जाने वाले पर्युषण पर्व का अंतिम (आठवां) दिन होता है। इसे क्षमावाणी पर्व या विश्व मैत्री दिवस के रूप में भी जाना जाता है।

सरल शब्दों में, यह आत्मा की शुद्धि और क्षमा मांगने का दिन है।

यहाँ संवत्सरी की कथा, महत्व और मान्यताओं का विवरण दिया गया है:

जैन धर्म का संवत्सरी पर्व, जैन मंदिर में संवत्सरी पूजा

 संवत्सरी का अर्थ और महत्व

  • अर्थ: ‘संवत्सरी’ शब्द का संबंध ‘संवत्सर’ (वर्ष) से है। यह वर्ष में एक बार आने वाला वह दिन है जब व्यक्ति साल भर में की गई अपनी गलतियों का प्रायश्चित करता है।
  • क्षमा का महापर्व: इस दिन का मुख्य उद्देश्य क्षमा‘ (Forgiveness) है। जैन धर्म मानता है कि मन में किसी के प्रति बैर या कड़वाहट रखना आत्मा के लिए बोझ है। इस दिन लोग अपने शत्रुओं और मित्रों, दोनों से क्षमा मांगते हैं और सबको क्षमा करते हैं।
  • कर्मों की निर्जरा: यह दिन तप, त्याग और संयम का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से मांगी गई माफी से पुराने बुरे कर्म (पाप) नष्ट हो जाते हैं।

इससे जुड़ी कथा और इतिहास

संवत्सरी से जुड़ी कोई एक पौराणिक कहानी (जैसे रामायण या महाभारत की तरह) नहीं है, बल्कि यह भगवान महावीर के सिद्धांतों और जैन भिक्षुओं की परंपरा पर आधारित है।

 प्राचीन काल में जैन साधु-संत वर्षा ऋतु के चार महीनों (चातुर्मास) में एक ही स्थान पर रुककर तपस्या करते थे, ताकि बारिश में चलने-फिरने से छोटे जीवों की हिंसा न हो।

पर्युषण पर्व के दौरान साधु और श्रावक (गृहस्थ) दोनों ही गहन तपस्या और आत्म-चिंतन करते हैं। पर्युषण के 7 दिनों तक शास्त्रों (विशेषकर कल्पसूत्र) का वाचन होता है, जिसमें भगवान महावीर और अन्य तीर्थंकरों का जीवन चरित्र सुनाया जाता है।

आठवें दिन यानी संवत्सरी को तपस्या का समापन होता है। इस दिन यह माना जाता है कि अनजाने में भी अगर साल भर में किसी जीव को कष्ट पहुंचाया हो, तो उस पाप का प्रायश्चित कर आत्मा को शुद्ध किया जाए। भगवान महावीर ने कहा था- क्षमा वीरस्य भूषणम्” (क्षमा वीरों का आभूषण है)।

 

 प्रमुख मान्यताएँ और परंपराएँ (Rituals)

  1. उपवास (Fasting): संवत्सरी के दिन जैन धर्मावलंबी कठोर उपवास रखते हैं। कई लोग निर्जला (बिना पानी के) व्रत करते हैं।
  2. प्रतिक्रमण (Pratikraman): यह इस दिन की सबसे महत्वपूर्ण क्रिया है। शाम के समय समाज के सभी लोग एक साथ बैठकर लगभग 2-3 घंटे की विशेष प्रार्थना करते हैं, जिसे ‘सांवत्सरिक प्रतिक्रमण’ कहते हैं। इसमें अपने पापों की आलोचना (स्वीकारोक्ति) की जाती है।
  3. मिच्छामि दुक्कड़म् (Michhami Dukkadam): प्रतिक्रमण के बाद, छोटे-बड़े सभी एक-दूसरे के गले मिलते हैं या हाथ जोड़कर मिच्छामि दुक्कड़म्” कहते हैं।
    • इसका अर्थ है: मेरे द्वारा किए गए सभी बुरे कार्य निष्फल हों (मैं क्षमा मांगता हूँ)।”
  4. 84 लाख योनियों से क्षमा: जैन धर्म में क्षमा केवल इंसानों से नहीं मांगी जाती। इस दिन प्रार्थना की जाती है कि— हवा, पानी, वनस्पति, कीड़े-मकोड़े या किसी भी जीव को मेरे कारण कष्ट हुआ हो, तो मैं उनसे क्षमा मांगता हूँ।”

क्षमापना सूत्र (The Forgiveness Mantra)

संवत्सरी के दिन इस श्लोक का उच्चारण कर माफी मांगी जाती है:

खामेमि सव्व जीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्ती में सव्व भूएसु, वेरं मज्झं न केणई।।

अर्थ: मैं सब जीवों से क्षमा मांगता हूँ, सब जीव मुझे क्षमा करें। मेरी सब जीवों से मित्रता है, किसी से भी मेरा बैर (दुश्मनी) नहीं है।

जैन धर्म मुख्य रूप से दो संप्रदायों में विभाजित है: श्वेतांबर और दिगंबर। यद्यपि दोनों भगवान महावीर के मूल सिद्धांतों को मानते हैं, लेकिन उनके त्योहारों के नाम, तिथियों और मनाने के तरीकों में थोड़ा अंतर है।

पर्युषण पर्व श्वेतांबर समाज का प्रमुख पर्व है, जबकि दशलक्षण पर्व दिगंबर समाज का सबसे बड़ा पर्व है।

यहाँ दोनों के बीच के मुख्य अंतरों का विवरण दिया गया है:

 

1 मुख्य अंतर: एक नज़र में (Comparison Table)

विशेषता

पर्युषण पर्व (श्वेतांबर)

दशलक्षण पर्व (दिगंबर)

कौन मनाता है?

श्वेतांबर जैन समाज

दिगंबर जैन समाज

अवधि (Duration)

8 दिन (अठ्ठाई)

10 दिन

समय (Timing)

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी से शुक्ल पक्ष की पंचमी तक।

पर्युषण समाप्त होने के ठीक बाद (भाद्रपद शुक्ल पंचमी से चतुर्दशी/पूर्णिमा तक)।

मुख्य ग्रंथ

कल्पसूत्र (इसमें भगवान महावीर और तीर्थंकरों का जीवन चरित्र पढ़ा जाता है)।

तत्वार्थ सूत्र (इसमें धर्म के 10 लक्षणों का वर्णन पढ़ा और सुना जाता है)।

अंतिम दिन

संवत्सरी (8वाँ दिन)।

अनंत चतुर्दशी (10वाँ दिन)।

क्षमा दिवस

संवत्सरी के दिन ही ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ कहा जाता है।

पर्व खत्म होने के अगले दिन (पड़वा को) क्षमावाणी मनाई जाती है।

  1. पर्युषण पर्व (विस्तार से)

  • अर्थ: ‘परि’ मतलब चारों ओर से और ‘उषण’ मतलब रहना। यानी, आत्मा में रमना।
  • प्रक्रिया: श्वेतांबर जैन इन 8 दिनों में साधु-संतों के पास रहते हैं।
  • कल्पसूत्र का वाचन: तीसरे दिन से ‘कल्पसूत्र’ का वाचन शुरू होता है, जिसमें भगवान महावीर के जन्म का वर्णन बहुत धूमधाम से किया जाता है (सपनों का वर्णन आदि)।
  • समापन: इसका समापन संवत्सरी पर होता है, जो सबसे पवित्र दिन माना जाता है।
  1. दशलक्षण पर्व (विस्तार से)

  • अर्थ: इसे ‘दशलक्षण’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह धर्म के 10 लक्षणों (गुणों) को अपने जीवन में उतारने का पर्व है।
  • प्रक्रिया: दिगंबर जैन इन 10 दिनों में हर दिन एक विशेष धर्म (गुण) की पूजा और आराधना करते हैं।
  • धर्म के 10 लक्षण:
    1. उत्तम क्षमा: क्रोध न करना।
    2. उत्तम मार्दव: अहंकार (घमंड) का त्याग।
    3. उत्तम आर्जव: कपट (छल) का त्याग, सरलता।
    4. उत्तम शौच: लोभ (लालच) का त्याग।
    5. उत्तम सत्य: सत्य बोलना।
    6. उत्तम संयम: इंद्रियों और मन पर काबू रखना।
    7. उत्तम तप: तपस्या करना (इच्छाओं को रोकना)।
    8. उत्तम त्याग: दान देना और मोह छोड़ना।
    9. उत्तम आकिंचन्य: परिग्रह (संग्रह) न करना, “मेरा कुछ नहीं है” का भाव।
    10. उत्तम ब्रह्मचर्य: शुद्ध आचरण रखना।
  1. समानता (Commonality)

दोनों पर्वों में बाहरी अंतर होने के बावजूद, इनका मूल उद्देश्य (Soul Purpose) एक ही है:

  • आत्म-शुद्धि: अपनी आत्मा को कर्मों के मैल से साफ करना।
  • अहिंसा: किसी भी जीव को कष्ट न देना।
  • क्षमा: अपनी गलतियों के लिए माफी मांगना (चाहे वह ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ कहकर हो या ‘उत्तम क्षमा’ कहकर)

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