जीवित्पुत्रिका व्रत: जानें तिथि, जिउतिया व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व
जीवित्पुत्रिका व्रत 2026 शनिवार, 03 अक्टूबर को मनाया जाएगा।
अष्टमी तिथि प्रारम्भ – अक्टूबर 03, 2026 को 07:59 बजे से
अष्टमी तिथि समाप्त – अक्टूबर 04, 2026 को 05:51 बजे तक
जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे लोकभाषा में ‘जितिया‘ या ‘जिउतिया‘ भी कहा जाता है, उत्तर भारत (विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड) का एक अत्यंत कठिन और महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं।
यहाँ इस व्रत की कथा, महत्व और मान्यताओं का विस्तृत विवरण है:
यह व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह एक निर्जला व्रत है (बिना अन्न और जल के), जो लगभग 24 घंटे या उससे अधिक समय तक चलता है। इसे ‘छठ पूजा’ जैसा ही पवित्र और कठिन माना जाता है।
पौराणिक कथाएं (katha)
इस व्रत से जुड़ी मुख्य रूप से दो कथाएं प्रचलित हैं:
क. जीमूतवाहन की कथा (सबसे प्रमुख): गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन बहुत परोपकारी थे। एक बार जंगल में भ्रमण करते हुए उन्होंने एक वृद्धा को रोते देखा। पूछने पर पता चला कि वह नागवंश की स्त्री है और पक्षीराज गरुड़ से समझौते के अनुसार, आज उसके इकलौते बेटे की बारी है गरुड़ का भोजन बनने की। जीमूतवाहन ने उस वृद्धा के पुत्र को जीवनदान देने का वचन दिया। वह स्वयं लाल कपड़े में लिपटकर उस शिला पर लेट गए जहाँ गरुड़ आने वाले थे। गरुड़ ने उन्हें उठाया लेकिन यह देखकर हैरान रह गए कि शिकार कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा। जब गरुड़ को सच्चाई पता चली, तो वे जीमूतवाहन के त्याग से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने न केवल उन्हें छोड़ दिया, बल्कि यह वरदान दिया कि जो भी माता जीमूतवाहन की पूजा करेगी, उसकी संतान की रक्षा स्वयं भगवान करेंगे।
ख. महाभारत की कथा (उत्तरा का गर्भ): महाभारत युद्ध के बाद, अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को नष्ट करने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु पर ब्रह्मास्त्र चला दिया। शिशु गर्भ में ही मर गया। तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने पुण्य कर्मों का फल देकर उस मृत शिशु को पुनर्जीवित किया। गर्भ में मृत होकर जीवित होने के कारण उस बालक का नाम ‘जीवित्पुत्रिका‘ (जो बाद में राजा परीक्षित बने) पड़ा। तभी से माताएं अपनी संतान की अकाल मृत्यु से रक्षा के लिए यह व्रत करती हैं।
व्रत का महत्व (Significance)
- संतान रक्षा: यह व्रत संतान को हर प्रकार के संकट, रोग और कष्टों से बचाने के लिए ‘कवच’ का काम करता है।
- वंश वृद्धि: मान्यता है कि जिन माताओं को संतान प्राप्ति में बाधा आ रही हो, उनके लिए भी यह व्रत फलदायी होता है।
- कठिन तपस्या: यह व्रत मां की ममता और त्याग का सर्वोच्च उदाहरण है, क्योंकि महिलाएं अपनी संतान के लिए बूँद भर पानी भी नहीं पीतीं।
मान्यताएं और पूजा विधि (Beliefs & Rituals)
यह पर्व तीन दिनों तक चलता है:
- नहाय-खाए (पहला दिन): इस दिन महिलाएं स्नान कर शुद्ध सात्विक भोजन (अक्सर मडुआ की रोटी और नोनी का साग) ग्रहण करती हैं और व्रत की शुरुआत करती हैं।
- खुर-जितिया (दूसरा दिन – निर्जला व्रत): यह मुख्य व्रत का दिन होता है। पूरे दिन और रात पानी नहीं पिया जाता। प्रदोष काल में जीमूतवाहन, और चील-सियारिन (सियार और चील की एक लोककथा के प्रतीक) की पूजा की जाती है।
- पारण (तीसरा दिन): सूर्योदय के बाद पूजा करके व्रत खोला जाता है।
विशेष मान्यता (चील और सियारिन): एक लोककथा के अनुसार, एक बार जंगल में एक चील और सियारिन ने यह व्रत साथ में रखने का फैसला किया। सियारिन को भूख लगी और उसने चुपके से भोजन कर लिया, जबकि चील ने पूरी निष्ठा से व्रत निभाया। अगले जन्म में चील की संताने जीवित और सुखी रहीं, जबकि सियारिन की संताने जीवित नहीं बचती थीं। इसलिए पूजा में इनका भी स्मरण किया जाता है ताकि व्रत खंडित न हो।
निष्कर्ष
जीवित्पुत्रिका व्रत केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मातृत्व की असीम शक्ति का प्रतीक है। यह विश्वास दिलाता है कि एक मां की प्रार्थना और त्याग में इतनी शक्ति है कि वह अपनी संतान को मृत्यु के मुख से भी वापस ला सकती है।
