Spread the love

Kalashtami Vrat 2026: कालाष्टमी की तिथि, पूजा विधि, व्रत नियम और काल भैरव कथा की पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें।

Kal Bhairav Ashtami Vrat

वैशाख कालाष्टमी कब है?(vaisakh Kalashtami kab hae?)

पंचांग के अनुसार वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि

09 अप्रैल 2026 को रात 09 बजकर 19 मिनट पर प्रारंभ होगी और

10 अप्रैल 2026 को रात 11 बजकर 15 मिनट पर समाप्त होगी।

कालाष्टमी के दिन भगवान काल भैरव की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।

कालाष्टमी क्या है?

कालाष्टमी वह पवित्र तिथि है जो भगवान शिव के अत्यंत उग्र और शक्तिशाली स्वरूप काल भैरव को समर्पित है।

हिंदू पंचांग के अनुसार, हर माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी (या काल भैरवाष्टमी) के रूप में मनाया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण कालाष्टमी मार्गशीर्ष (अगहन) मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आती है, जिसे काल भैरव जयंती के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इसी दिन भगवान काल भैरव का प्राकट्य हुआ था। इस दिन मुख्य रूप से तंत्र-मंत्र के साधक और सामान्य भक्त भय, कष्टों, शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति पाने के लिए काल भैरव की पूजा करते हैं।

काल भैरव के प्राकट्य की कथा

कालाष्टमी का महत्व सीधे तौर पर काल भैरव की उत्पत्ति की कथा से जुड़ा हुआ है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार:

एक बार ब्रह्मा और विष्णु जी के बीच इस बात पर विवाद हुआ कि उन दोनों में से सबसे श्रेष्ठ कौन है। जब अन्य देवताओं और ऋषियों ने विचार-विमर्श करके भगवान शिव को परम श्रेष्ठ माना, तो ब्रह्मा जी इस फैसले से सहमत नहीं हुए। अहंकारवश उन्होंने भगवान शिव की वेशभूषा और उनके गणों की रूप-सज्जा का तिरस्कार किया और उनके प्रति अपमानजनक शब्द कहे। ब्रह्मा जी के इस आचरण से भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो उठे। शिव का क्रोध इतना प्रचंड और विकराल था कि उसी क्षण उनके शरीर से एक तेजस्वी और भयंकर शक्ति प्रकट हुई। यही शक्ति काल भैरव कहलाई, जिनका उद्देश्य ब्रह्मा जी के अहंकार को समाप्त करना था। काल भैरव ने क्रोध में आकर अपने बाएं हाथ की कनिष्ठा (सबसे छोटी) उंगली के नाखून से ब्रह्मा जी के पाँचवें सिर को काट दिया। ब्रह्मा के सिर को काटने के कारण, काल भैरव पर ब्रह्महत्या (ब्राह्मण की हत्या) का पाप लग गया। ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए काल भैरव को कई तीर्थ स्थानों पर भटकना पड़ा। अंततः, काशी नगरी में ही उनके हाथ से ब्रह्मा का कटा हुआ सिर (कपाल) गिर गया और उन्हें पाप से मुक्ति मिली। इस घटना के बाद, भगवान शिव ने काल भैरव को काशी में ही निवास करने और इस नगरी का कोतवाल (रक्षक) बनने का आदेश दिया।

भगवान काल भैरव की पूजा करने से जीवन में अनेक कल्याणकारी फल प्राप्त होते हैं। उनकी उपासना से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और व्यक्ति रोग, दोष और नकारात्मक शक्तियों से मुक्त होता है। भैरव देव अपने भक्तों की सदैव सुरक्षा करते हैं और दुष्कर्म करने वालों को दंड देते हैं। साथ ही, यह पूजा शनि और राहु के प्रकोप से रक्षा करती है तथा दुर्भाग्य को दूर कर सौभाग्य में वृद्धि लाती है

कालाष्टमी का महत्व

कालाष्टमी का महत्व हिंदू धर्म और विशेषकर शैव संप्रदाय में बहुत गहरा है।

  • भय से मुक्ति: काल भैरव को दंडपाणि भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘दंड धारण करने वाला’। इनकी पूजा करने से व्यक्ति के मन से हर प्रकार का भय, अज्ञात डर और नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है।
  • शत्रु बाधा निवारण: यह पूजा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने और कानूनी मामलों में सफलता के लिए अत्यंत प्रभावी मानी जाती है।
  • तंत्र साधना: यह रात्रि (विशेषकर काल भैरव जयंती की रात्रि) तंत्र साधना और गुप्त विद्याओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।
  • काल के नियंत्रक: ‘काल’ का अर्थ है समय। काल भैरव समय को नियंत्रित करने वाले और जीवन के चक्र पर नियंत्रण रखने वाले देव हैं।

मान्यताएँ और पूजा विधि

  • पूजा का समय: काल भैरव की पूजा मुख्य रूप से रात्रि के समय की जाती है, क्योंकि वे भगवान शिव के तामसिक (उग्र) स्वरूप हैं।
  • व्रत और भोग: भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और काल भैरव को सरसों के तेल का दीपक जलाते हैं। उन्हें काले तिल, पुए, उड़द दाल की पकौड़ी, और दूध का भोग लगाया जाता है।
  • श्मशान में पूजा: कई साधक श्मशान घाट (श्मशान भैरव के रूप में) या सुनसान स्थानों पर जाकर विशेष पूजा और साधना करते हैं।
  • कुत्ते को भोजन: काल भैरव का वाहन श्वान (कुत्ता) है। इसलिए इस दिन काले कुत्ते को भोजन कराना या उसकी सेवा करना अत्यंत शुभ माना जाता है, जिससे काल भैरव प्रसन्न होते हैं।
  • मंत्र जाप: इस दिन “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरुकुरु बटुकाय ह्रीं” या “ॐ कालभैरवाय नमः” मंत्र का जाप करना फलदायी होता है।

हर हर महादेव

Scroll to Top