माँ मातंगी: दस महाविद्याओं की 9वीं देवी, 'तांत्रिक सरस्वती' और वाक् सिद्धि की अधिष्ठात्री
वर्ष 2027 में माँ मातंगी जयंती रविवार, 9 मई 2027 को मनाई जाएगी।
तृतीया तिथि प्रारंभ: 8 मई 2027 को पूर्वाह्न 11:42 बजे
तृतीया तिथि समाप्त: 9 मई 2027 को प्रातः 9:03 बजे
सनातन धर्म और तंत्र शास्त्र में ‘दस महाविद्याओं’ (दश महाशक्तियों) की साधना का सर्वोच्च स्थान है। इन्हीं दस महाविद्याओं में से नौवें स्थान पर विराजमान हैं- माँ मातंगी (Maa Matangi)।
दस महाविद्याओं (Ten Mahavidyas) के नाम: माँ काली, माँ तारा, माँ त्रिपुर सुंदरी, माँ भुवनेश्वरी, माँ छिन्नमस्ता, माँ त्रिपुर भैरवी, माँ धूमावती, माँ बगलामुखी, माँ मातंगी, माँ कमला
माता मातंगी को ‘तांत्रिक सरस्वती‘ भी कहा जाता है, क्योंकि जिस प्रकार सात्विक पूजा में माता सरस्वती ज्ञान, संगीत और वाणी की देवी हैं, उसी प्रकार तंत्र साधना में माँ मातंगी कला, वाक् सिद्धि (Speech), संगीत और वशीकरण की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। इनका स्वरूप अत्यंत रहस्यमयी और कल्याणकारी है। आइए, माँ मातंगी के स्वरूप, उनकी उत्पत्ति की अद्भुत कथा, उनके आध्यात्मिक महत्व और पूजा के नियमों को विस्तार से समझते हैं।
माँ मातंगी कौन हैं?
माँ मातंगी का स्वरूप अत्यंत मनमोहक और अलौकिक है। शास्त्रों में उनके स्वरूप का वर्णन कुछ इस प्रकार किया गया है:
- रंग और आभा: माता का रंग गहरा हरा (श्याम वर्ण) या पन्ना रत्न (Emerald) के समान है, जो प्रकृति और जीवन ऊर्जा का प्रतीक है।
- वाहन और अस्त्र: वे लाल रंग के आभूषणों और वस्त्रों से सुशोभित हैं। उनके चार हाथ हैं, जिनमें वे वीणा, पाश, अंकुश और खड्ग (तलवार) धारण करती हैं। उनके समीप अक्सर एक तोता (Parrot) बैठा होता है, जो वाणी और बुद्धिमत्ता का प्रतीक है।
- उच्छिष्ट चांडालिनी: माँ मातंगी को ‘उच्छिष्ट चांडालिनी’ भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में ‘उच्छिष्ट’ का अर्थ होता है ‘जूठा’ (Leftover)। यह एकमात्र ऐसी देवी हैं जिनकी पूजा में अत्यधिक शुद्धता की बाध्यता नहीं होती और तांत्रिक साधनाओं में इन्हें जूठे मुंह भी पूजा जाता है (हालांकि गृहस्थों के लिए नियम अलग हैं)।
माँ मातंगी की पौराणिक कथा (उत्पत्ति का रहस्य)
माँ मातंगी के प्राकट्य (उत्पत्ति) की मुख्य रूप से दो कथाएं पुराणों और तंत्र शास्त्रों में मिलती हैं:
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उच्छिष्ट (जूठे भोजन) से प्राकट्य की कथा
प्राचीन काल की बात है, एक बार भगवान श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती से मिलने गए। विष्णु जी अपने साथ बहुत ही स्वादिष्ट भोजन और नैवेद्य लेकर गए थे।
कैलाश पर चारों देवताओं (शिव, पार्वती, विष्णु, लक्ष्मी) ने अत्यंत प्रेम और आनंद के साथ भोजन करना आरंभ किया। भोजन करते समय, उनके आनंदित हास-परिहास के बीच कुछ भोजन के कण (जूठा भोजन या उच्छिष्ट) धरती पर गिर गए।
उन चारों दिव्य शक्तियों के गिरे हुए उस पवित्र उच्छिष्ट (Leftover) से एक अत्यंत सुंदर, श्याम वर्ण (हरे रंग) वाली एक कन्या प्रकट हुई। उस कन्या ने उन चारों देवताओं से उनका बचा हुआ (जूठा) भोजन प्रसाद के रूप में मांगा। देवताओं ने प्रसन्न होकर उसे अपना उच्छिष्ट प्रदान किया और उसे आशीर्वाद दिया। जूठे भोजन से प्रकट होने और उसे ग्रहण करने के कारण इस देवी का नाम ‘उच्छिष्ट मातंगिनी‘ पड़ा। शिव जी ने वरदान दिया कि जो भी तुम्हारी उपासना करेगा, उसे सभी कलाओं और वाक् सिद्धि का ज्ञान स्वतः प्राप्त हो जाएगा।
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ऋषि मतंग की तपस्या
एक अन्य कथा के अनुसार, प्राचीन काल में ‘मतंग‘ नाम के एक महान ऋषि थे। वे अपनी नीच जाति के कारण समाज में सम्मान पाना चाहते थे। उन्होंने समाज के बंधनों को तोड़कर कठोर तपस्या की और अपने तपोबल से ब्राह्मणत्व प्राप्त किया। ऋषि मतंग की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति माँ भगवती ने उनके आश्रम में पुत्री के रूप में जन्म लिया। ऋषि मतंग की पुत्री होने के कारण ही माता का नाम ‘मातंगी‘ पड़ा।
माँ मातंगी की पूजा का महत्व और लाभ
माँ मातंगी की साधना गृहस्थ और तांत्रिक दोनों कर सकते हैं। इनकी उपासना के प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:
वाक् सिद्धि और ज्ञान: जो व्यक्ति बोलने में हिचकिचाता है या हकलाता है, माता की पूजा से उसकी वाणी में आकर्षण और ओज आ जाता है। यह वक्ताओं (Speakers) के लिए अमोघ है।
संगीत और कला में सफलता: माता मातंगी के हाथों में वीणा है। संगीतकारों, गायकों, अभिनेताओं और कलाकारों के लिए इनकी पूजा सफलता के द्वार खोलती है।
वशीकरण और आकर्षण: तंत्र शास्त्र में माँ मातंगी को ‘वशीकरण की देवी’ कहा जाता है। इनकी साधना से साधक के व्यक्तित्व में एक चुंबकत्व आ जाता है।
सुखी दांपत्य जीवन: जिन पति-पत्नी के बीच अनबन रहती है, वे यदि माँ मातंगी की पूजा करें, तो उनके रिश्तों में पुनः प्रेम और मधुरता आ जाती है।
माँ मातंगी की पूजा विधि (गृहस्थों के लिए)
माँ मातंगी की विशेष पूजा वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया/मातंगी जयंती) या गुप्त नवरात्रि के दौरान की जाती है। गृहस्थ साधक इस प्रकार पूजा कर सकते हैं:
- स्नान और वेदी स्थापना: प्रातःकाल स्नान कर हरे या सफेद वस्त्र धारण करें। एक लकड़ी की चौकी पर हरा कपड़ा बिछाकर माँ मातंगी का चित्र या यंत्र स्थापित करें।
- हरे रंग का प्रयोग: माता को हरा रंग अत्यंत प्रिय है। उन्हें हरी चूड़ियां, हरे वस्त्र, और हरे रंग के फल (जैसे अमरूद, अंगूर, कच्चा नारियल) अर्पित करें।
- पुष्प और नैवेद्य: माँ को चमेली, बेला या लाल गुड़हल के फूल चढ़ाएं। उन्हें मीठे चावल या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
- मंत्र जाप: रुद्राक्ष या स्फटिक की माला से माँ मातंगी के सिद्ध मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
- सिद्ध मंत्र: ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा
- सरल मंत्र: ॐ ह्रीं भद्रकाल्यै नमः
- आरती और क्षमा याचना: जाप के बाद कपूर और घी के दीपक से माता की आरती करें और अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें।
मुख्य मान्यताएं और नियम (क्या करें, क्या न करें)
- शुद्धता का भ्रम: तंत्र साधना में अघोरी और तांत्रिक माँ मातंगी की पूजा उच्छिष्ट (जूठे मुंह) और बिना स्नान किए भी करते हैं, लेकिन गृहस्थों को माता की पूजा पूर्ण पवित्रता और सात्विकता के साथ ही करनी चाहिए।
- अन्न का अपमान न करें: चूंकि माता का जन्म भोजन के अंश से हुआ है, इसलिए माता के भक्तों को कभी भी भोजन (अन्न) का अपमान नहीं करना चाहिए और थाली में जूठा नहीं छोड़ना चाहिए।
- स्त्रियों का सम्मान: माता मातंगी स्त्रियों और कला की रक्षक हैं। जिस घर में स्त्रियों का सम्मान होता है और कला की कद्र होती है, वहां माँ मातंगी सदैव निवास करती हैं।
निष्कर्ष
माँ मातंगी हमें यह सिखाती हैं कि संसार में कोई भी चीज़ ‘जूठी’ या ‘अपवित्र’ नहीं है; अपवित्रता केवल हमारे मन और विचारों में होती है। समाज जिसे तिरस्कृत कर देता है (चांडालिनी), ईश्वर उसे भी अपने सिरहाने बैठाता है। ज्ञान, कला और वाणी पर केवल किसी एक वर्ग का अधिकार नहीं है, बल्कि जो सच्चे मन से तपस्या करता है, माँ मातंगी उसकी वाणी में सरस्वती बनकर वास करने लगती हैं। गृहस्थ जीवन की उलझनों को सुलझाने और समाज में मान-सम्मान पाने के लिए माँ मातंगी की साधना एक अचूक और कल्याणकारी मार्ग है।
|| जय माँ मातंगी ||
