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मेष संक्रांति: जानें तिथि, पुण्यकाल, महापुण्यकाल, स्नान-दान, पूजा विधि और महत्व

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मेष संक्रांति क्या है?

मेष संक्रांति वह तिथि है जब सूर्य देव अपनी राशि बदलकर मीन से मेष राशि में प्रवेश करते हैं। यह परिवर्तन हिंदू पंचांग में एक विशेष संक्रांति मानी जाती है क्योंकि इसे सूर्य के नए चक्र की शुरुआत माना जाता है।

  • यह सामान्यतः 14 अप्रैल के दिन आती है।
  • इसी दिन से सूर्य का उत्तरायण प्रभाव और अधिक प्रबल होता है।
  • विभिन्न नाम: भारत के अलग-अलग राज्यों में इसे कई नामों से जाना जाता है, जैसे:
    • पंजाब में बैसाखी
    • बंगाल में पोइला बोइशाख (पहला बोइशाख)।
    • केरल में विशु
    • तमिलनाडु में पुथांडु
    • ओडिशा में पाना संक्रांति
    • उत्तर भारत में सतुआ संक्रांति

मेष संक्रांति का पुण्यकाल

मेष संक्रांति के दिन स्नान-दान का विशेष महत्व होता है। इस दिन पुण्यकाल में किए गए जप, तप, दान और स्नान का फल कई गुना अधिक माना जाता है।

पंचांग के अनुसार मेष संक्रांति पर पुण्यकाल सुबह 6 बजकर 29 मिनट से दोपहर 1 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। वहीं महापुण्यकाल सुबह 7 बजकर 33 मिनट से 11 बजकर 45 मिनट तक रहेगा।

इन शुभ मुहूर्तों में पवित्र नदी में स्नान करना, भगवान सूर्य को अर्घ्य देना तथा दान-पुण्य करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

मेष संक्रांति से जुड़ी कथा और मान्यताएँ

मेष संक्रांति से जुड़ी कुछ प्रमुख कथाएं और मान्यताएं इस प्रकार हैं:

  1. धार्मिक मान्यताएँ

  • भगवान राम का आरंभ: एक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान श्री राम ने दक्षिण की ओर रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए अपनी यात्रा का आरंभ किया था।
  • भगवान विष्णु का आराधना काल: यह भी कहा जाता है कि इस दिन से भगवान विष्णु का आराधना काल (पूजा-पाठ और शुभ कार्यों का समय) फिर से शुरू होता है।
  • देवी काली की पूजा: इस दिन कई क्षेत्रों में भगवान सूर्य के अलावा शक्ति स्वरूपा माँ काली और भगवान शिव का भी पूजन किया जाता है।
  1. सतुआ संक्रांति की कथा

  • मेष संक्रांति को सतुआ संक्रांति भी कहते हैं क्योंकि इस दिन जौ या चने का सत्तू खाने और दान करने का विशेष महत्व है।
  • यह पर्व गर्मी के आगमन का संकेत देता है, और इस समय सत्तू, जल से भरा घड़ा, ककड़ी, और पंखा दान करने की परंपरा है ताकि आने वाले दिनों में शरीर की ठंडक बनी रहे और दान करने वाले को अगले जन्म में भी इन सुखों की प्राप्ति हो।

 मेष संक्रांति का महत्व

मेष संक्रांति का हिंदू धर्म और ज्योतिष में बहुत विशेष महत्व है:

महत्व का क्षेत्र

विवरण

ज्योतिषीय

मेष राशि को 12 राशियों में पहला स्थान प्राप्त है। सूर्य का इसमें प्रवेश नए सौर वर्ष की शुरुआत और एक नए चक्र का प्रतीक है।

आध्यात्मिक

यह दिन आत्मिक उन्नति और भीतरी परिवर्तन के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

धार्मिक

खरमास की समाप्ति के कारण यह दिन विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि जैसे सभी मांगलिक कार्यों की शुरुआत के लिए आदर्श होता है।

दान-पुण्य

इस दिन स्नान, दान (सत्तू, जल, वस्त्र) और सूर्य को अर्घ्य देने का विशेष फल बताया गया है। संक्रांति से चार घंटे पहले और चार घंटे बाद का समय पुण्यकाल माना जाता है।

कृषि

यह पर्व नई फसल के मौसम की शुरुआत का भी प्रतीक है।

मेष संक्रांति पर क्या करें? (सरल नियम)

  • स्नान: किसी पवित्र नदी में या घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान करना शुभ माना जाता है।
  • दान: इस दिन सत्तू, ककड़ी, गुड़, जल से भरा घड़ा, और पंखा दान करना अत्यंत फलदायी होता है।
  • पूजा: सूर्य देव को अर्घ्य दें और भगवान विष्णु, भगवान शिव और माँ काली की पूजा करें।
  • व्रत: कई लोग इस दिन व्रत रखते हैं और सत्तू तथा गुड़ का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
  • आयोजन: गांवों और नगरों में इस दिन मेले, कथा-प्रवचन, हवन-यज्ञ और रुद्राभिषेक जैसे आयोजन होते हैं।

|| हर हर महादेव ||

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