नव पद ओली: जानें तिथि, आयंबिल आराधना, नवपद की महिमा और इस पर्व का महत्व।
नव पद ओली शनिवार, अक्टूबर 17, 2026 को
सप्तमी तिथि प्रारम्भ – अक्टूबर 17, 2026 को 05:54 बजे से
सप्तमी तिथि समाप्त – अक्टूबर 18, 2026 को 08:27 बजे तक
नव पद ओली (Navpad Oli) जैन धर्म का एक अत्यंत पवित्र और शाश्वत पर्व है। यह पर्व आत्मा की शुद्धि और कर्मों के बंधन को काटने के लिए मनाया जाता है। इसे ‘आयंबिल ओली‘ (Ayambil Oli) भी कहा जाता है।
यह पर्व वर्ष में दो बार आता है:
- चैत्र मास (मार्च-अप्रैल) के शुक्ल पक्ष में।
- आश्विन मास (सितंबर-अक्टूबर) के शुक्ल पक्ष में (शारदीय नवरात्रि के साथ)।
यह 9 दिनों तक चलने वाला एक कठोर तप है। यहाँ इसकी कथा, महत्व और मान्यताओं का विस्तृत विवरण है:
‘नव पद‘ क्या हैं? (What are the 9 Pads?)
इस पर्व में ‘सिद्धचक्र यंत्र‘ की पूजा की जाती है, जिसमें 9 सर्वोच्च पद होते हैं। इन्हीं 9 पदों की आराधना 9 दिनों तक की जाती है:
- अरिहंत (Arihant)
- सिद्ध (Siddha)
- आचार्य (Acharya)
- उपाध्याय (Upadhyaya)
- साधु (Sadhu) (ये पांचों ‘पंच परमेष्ठी‘ कहलाते हैं)
- सम्यक दर्शन (Darshan – सही श्रद्धा)
- सम्यक ज्ञान (Gyan – सही ज्ञान)
- सम्यक चारित्र (Charitra – सही आचरण)
- सम्यक तप (Tap – तपस्या)
पौराणिक कथा (राजा श्रीपाल और मयनासुंदरी)
नव पद ओली की महिमा समझाने के लिए राजा श्रीपाल और मैनासुंदरी की कथा सबसे प्रसिद्ध है:
कथा: प्राचीन काल में राजा श्रीपाल नामक एक व्यक्ति थे, जिन्हें कुष्ठ रोग (कोढ़/Leprosy) हो गया था। इस रोग के कारण उन्हें अपना राज्य गंवाना पड़ा और वे बहुत कष्ट में थे। दूसरी ओर, एक राजकुमारी थी जिसका नाम मैनासुंदरी था। वह जैन धर्म में बहुत विश्वास रखती थी। उसके पिता ने उसकी परीक्षा लेने के लिए (या क्रोध में आकर) उसका विवाह रोगी श्रीपाल से कर दिया।
मैनासुंदरी ने अपने पति के रोग को ठीक करने के लिए जैन मुनि के बताए अनुसार पूर्ण श्रद्धा भाव से ‘नव पद ओली‘ का तप शुरू किया। उसने 9 दिनों तक कठोर ‘आयंबिल’ व्रत रखा और सिद्धचक्र महायंत्र की पूजा की। उसने यंत्र के अभिषेक का जल (गंधोदक) अपने पति के शरीर पर लगाया।
परिणाम: नव पद ओली के प्रभाव और मैनासुंदरी की भक्ति से राजा श्रीपाल का कुष्ठ रोग पूरी तरह ठीक हो गया। उनका शरीर कंचन (सोने) जैसा चमकने लगा। बाद में उन्होंने अपना खोया हुआ राज्य भी पुनः प्राप्त कर लिया और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हुए।
नव पद ओली का महत्व (Significance)
- इंद्रिय निग्रह (Control over Senses): इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता ‘आयंबिल‘ (Ayambil) भोजन है। इसमें साधक दिन में केवल एक बार भोजन करता है।
- भोजन में विगई (दूध, दही, घी, तेल, शक्कर/गुड़ और तली हुई चीजें) का पूर्ण त्याग होता है।
- भोजन बिना स्वाद (उबला हुआ अनाज) का होता है। यह जीभ के स्वाद को जीतने का अभ्यास है।
- कर्म निर्जरा: यह तप पुराने और बुरे कर्मों को नष्ट करने (निर्जरा) के लिए सबसे शक्तिशाली माना जाता है।
- स्वास्थ्य लाभ: वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो साल में दो बार (ऋतु परिवर्तन के समय) 9 दिनों तक तेल, घी, चीनी और मसालों का त्याग करने से शरीर पूरी तरह डिटॉक्स (Detox) हो जाता है और पाचन तंत्र मजबूत होता है।
मान्यताएं और विधि (Rituals & Beliefs)
- 9 दिन, 9 रंग: हर दिन नव पद के एक विशिष्ट पद की पूजा होती है। उस पद से संबंधित रंग के कपड़े पहनने और उसी रंग के अनाज (जैसे- चावल, गेहूं, चना) का आयंबिल करने की मान्यता है।
- ब्रह्मचर्य: इन 9 दिनों में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य होता है।
- सामायिक और प्रतिक्रमण: व्रती (तप करने वाले) सुबह-शाम सामायिक (ध्यान) और प्रतिक्रमण (क्षमा प्रार्थना) करते हैं।
- शाश्वत पर्व: जैन मान्यता के अनुसार, यह पर्व अनादि काल से चला आ रहा है और अनंत काल तक चलता रहेगा।
निष्कर्ष:
नव पद ओली केवल भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह स्वाद पर विजय प्राप्त करके आत्मा को परमात्मा के करीब ले जाने की एक साधना है। यह सिखाता है कि सच्चा सुख भोजन के स्वाद में नहीं, बल्कि आत्मा की शांति में है।
