श्री लक्ष्मी जी की आरती और लक्ष्मी चालीसा अर्थ सहित पढ़ें। जानें शक्तिशाली मंत्र, धन-समृद्धि के लाभ और माता लक्ष्मी की कृपा पाने का सरल तरीका।
माता लक्ष्मी जी का संक्षिप्त परिचय
माता लक्ष्मी हिंदू धर्म में धन, सुख-समृद्धि, सौभाग्य, सौंदर्य और ऐश्वर्य की देवी हैं। वे भगवान विष्णु की अर्धांगिनी (पत्नी) हैं और जब भी भगवान विष्णु पृथ्वी पर अवतार लेते हैं (जैसे राम या कृष्ण), तो माता लक्ष्मी भी उनके साथ (सीता या रुक्मिणी के रूप में) अवतरित होती हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता लक्ष्मी की उत्पत्ति देवताओं और असुरों द्वारा किए गए ‘समुद्र मंथन’ के दौरान हुई थी। उनका स्वरूप अत्यंत मनमोहक और दिव्य है। वे लाल या गुलाबी वस्त्र धारण करती हैं और खिले हुए कमल के फूल पर विराजमान रहती हैं, जो पवित्रता और आध्यात्मिक विकास का प्रतीक है। उनके चार हाथ हैं, जो मानव जीवन के चार लक्ष्यों – धर्म (कर्तव्य), अर्थ (धन), काम (इच्छाओं), और मोक्ष (मुक्ति) को दर्शाते हैं। उनके एक हाथ से सोने के सिक्के गिरते रहते हैं, जो भौतिक और आध्यात्मिक धन की वर्षा का प्रतीक है। उनके साथ अक्सर सफेद हाथी (गज) भी दर्शाए जाते हैं। दीपावली का पावन पर्व मुख्य रूप से माता लक्ष्मी की पूजा के लिए ही समर्पित है।
श्री लक्ष्मी माता की आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निसदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता…
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता…
दुर्गा रूप निरंजनि, सुख-सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता…
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता…
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता…
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता…
शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता…
महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई नर गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
लक्ष्मी आरती के लाभ: माता लक्ष्मी की आरती का नियमित गान करने से घर में धन-धान्य की कभी कमी नहीं होती और आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं। यह आरती घर से नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता (गरीबी) को बाहर निकालती है। माता लक्ष्मी केवल धन ही नहीं, बल्कि घर में सौहार्द और शांति भी लाती हैं। आरती से परिवार के सदस्यों में प्रेम बढ़ता है। व्यापार, नौकरी या किसी भी नए कार्य में माता की कृपा से निरंतर सफलता और सौभाग्य प्राप्त होता है।
श्री लक्ष्मी चालीसा (अर्थ सहित)
श्री लक्ष्मी चालीसा माता की कृपा प्राप्त करने का एक अत्यंत सिद्ध और सरल मार्ग है।
॥ दोहा ॥
मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥
|| सोरठा ||
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥
॥ चौपाई ॥
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही।
ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥
तुम समान नहिं कोई उपकारी।
सब विधि पुरबहु आस हमारी॥
जै जै जगत जननि जगदम्बा।
सबके तुमही हो स्वलम्बा॥
तुम ही हो घट घट के वासी।
विनती यही हमारी खासी॥
जग जननी जय सिन्धु कुमारी।
दीनन की तुम हो हितकारी॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी।
कृपा करौ जग जननि भवानी।
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी।
सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी।
जगत जननि विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता।
संकट हरो हमारी माता॥
क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो।
चौदह रत्न सिंधु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी।
सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा।
रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा।
लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं।
सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनायो तोहि अन्तर्यामी।
विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी।
कहं तक महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई।
मन-इच्छित वांछित फल पाई॥
तजि छल कपट और चतुराई।
पूजहिं विविध भांति मन लाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई।
जो यह पाठ करे मन लाई॥
ताको कोई कष्ट न होई।
मन इच्छित फल पावै फल सोई॥
त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी।
त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥
जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे।
इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥
ताको कोई न रोग सतावै।
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।
पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना।
अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै।
शंका दिल में कभी न लावै॥
पाठ करावै दिन चालीसा।
ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै।
कमी नहीं काहू की आवै॥
बारह मास करै जो पूजा।
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं।
उन सम कोई जग में नाहिं॥
बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई।
लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करैं व्रत नेमा।
होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥
जय जय जय लक्ष्मी महारानी।
सब में व्यापित जो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं।
तुम सम कोउ दयाल कहूं नाहीं॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै।
संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥
भूल चूक करी क्षमा हमारी।
दर्शन दीजै दशा निहारी॥
बिन दरशन व्याकुल अधिकारी।
तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में।
सब जानत हो अपने मन में॥
रूप चतुर्भुज करके धारण।
कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई।
ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥
रामदास अब कहाई पुकारी।
करो दूर तुम विपति हमारी॥
॥ दोहा ॥
त्राहि – त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास।
जयति-जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर॥
|| समाप्त ||
श्री लक्ष्मी चालीसा का अर्थ:
प्रारंभिक दोहा:
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥
दोहे का अर्थ: हे माता लक्ष्मी! मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें और मेरे हृदय में निवास करें। मेरी सभी मनोकामनाओं को सिद्ध (पूरा) करें और मेरी सभी आशाओं को पूर्ण करें।
चालीसा का विस्तृत भावार्थ (मुख्य चौपाइयों का सार):
- महिमा और स्वरूप: चालीसा की शुरुआत माता की स्तुति से होती है। उन्हें सिंधु सुता (समुद्र की पुत्री) और भगवान विष्णु की प्रिय बताया गया है। वे समस्त जगत की माता हैं और उनका रूप कमल के समान सुंदर और कोमल है।
- समस्त सुखों की दाता: माता लक्ष्मी के बिना संसार में कोई भी सुख प्राप्त नहीं किया जा सकता। अन्न, वस्त्र, धन, और यहाँ तक कि यज्ञ और शुभ कार्य भी माता की कृपा के बिना अधूरे हैं। वे ही अष्टसिद्धि और नवनिधि की दाता हैं।
- भक्तों के संकट हरना: जो भी भक्त सच्चे हृदय से माता का ध्यान करता है, उसके जीवन से घोर अंधकार और दरिद्रता मिट जाती है। वे अपने भक्तों के सभी प्रकार के कष्ट, दुख, और आर्थिक संकटों को दूर करके उन्हें राजा के समान वैभवशाली बना देती हैं।
- विष्णु जी के साथ वास: माता लक्ष्मी भगवान नारायण (विष्णु) के चरणों में निवास करती हैं और उनके साथ ही जगत का पालन-पोषण करती हैं। जहाँ विष्णु जी का कीर्तन होता है, वहाँ माता लक्ष्मी स्वतः ही दौड़ी चली आती हैं।
- फलश्रुति (पाठ का फल): अंत में बताया गया है कि जो व्यक्ति शुक्रवार के दिन या नित्य नियम से श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ करता है, उसके घर में कभी क्लेश नहीं होता। उसके घर में कुबेर (धन के देवता) का वास हो जाता है और उसे जीवन के सभी भौतिक सुख और अंत में परम गति प्राप्त होती है।
माता लक्ष्मी के प्रमुख मंत्र और उनके अर्थ
लक्ष्मी बीज मंत्र (धन और संपन्नता को आकर्षित करने के लिए)
ॐ श्रीं श्रियै नमः॥ (या केवल ‘ॐ श्रीं नमः‘)
अर्थ: मैं माता लक्ष्मी को प्रणाम करता हूँ, जो सर्वोच्च ऐश्वर्य, समृद्धि और सौभाग्य की देवी हैं। (यह अत्यंत शक्तिशाली बीज मंत्र है, ‘श्रीं’ माता लक्ष्मी का ध्वनि स्वरूप है)।
महालक्ष्मी गायत्री मंत्र (सफलता और सही दिशा के लिए)
ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम भगवान विष्णु की पत्नी महालक्ष्मी जी को जानते हैं, हम उनका ध्यान करते हैं। हे माता लक्ष्मी! कृपया हमारी बुद्धि को जागृत करें और हमें सही मार्ग (सफलता और समृद्धि की ओर) प्रेरित करें।
धन प्राप्ति और अष्टलक्ष्मी मंत्र (व्यापार और आर्थिक वृद्धि के लिए)
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद।
श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥
अर्थ: हे कमल के फूल पर विराजमान माता लक्ष्मी, मुझ पर प्रसन्न हों, मुझ पर प्रसन्न हों! मैं महालक्ष्मी को नमन करता हूँ। यह मंत्र ब्रह्मांड की सर्वोत्तम ऊर्जा को आकर्षित करता है और अपार धन, वैभव और स्थिरता प्रदान करता है।
ऋणमुक्ति मंत्र (कर्ज से छुटकारा पाने के लिए)
ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं क्रीं क्लीं श्रीं महालक्ष्मी मम गृहे धनं पूरय पूरय चिन्तायै दूरय दूरय स्वाहा॥
अर्थ: हे महालक्ष्मी! कृपया मेरे घर को धन और धान्य से पूर्ण कर दें, पूर्ण कर दें। मेरी सभी चिंताओं और कष्टों (विशेषकर कर्ज और आर्थिक समस्याओं) को दूर कर दें, दूर कर दें। मैं आपको स्वयं को समर्पित करता हूँ।
|| जय माता लक्ष्मी ||
