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शुक्रवार व्रत: कथा, महत्व और मान्यता

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शुक्रवार व्रत

संतोषी माता का शुक्रवार व्रत महिलाओं और पुरुषों दोनों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। यह व्रत विशेष रूप से मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। संतोषी माता को भगवान गणेश की पुत्री माना जाता है, जो संतोष‘ (Satisfaction) की अधिष्ठात्री देवी हैं।

यहाँ संतोषी माता व्रत की कथा, महत्व और नियमों का संपूर्ण विवरण है:

 

संतोषी माता व्रत का महत्व और मान्यता (Significance)

इस व्रत को करने के पीछे गहरी धार्मिक मान्यताएं हैं:

  • मनोकामना पूर्ति: मान्यता है कि लगातार 16 शुक्रवार तक यह व्रत विधि-विधान से करने पर विवाह में आ रही बाधाएं, संतान सुख, और धन संबंधी समस्याएं दूर हो जाती हैं।
  • शांति और संतोष: जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह व्रत जीवन में असंतोष को मिटाकर शांति लाता है।
  • कठिन नियम: इस व्रत की सबसे बड़ी मान्यता यह है कि व्रत करने वाले व्यक्ति और उसके परिवार के सदस्यों को उस दिन खट्टी चीजों का स्पर्श भी नहीं करना चाहिए।

संतोषी माता व्रत कथा (Vrat Katha)

बहुत समय पहले की बात है। एक बुढ़िया के सात पुत्र थे। उनमें से छह बेटे कमाते थे, जबकि सातवां बेटा बेरोजगार था। बुढ़िया अपने छह बेटों को प्रेम से खाना खिलाती और सातवें बेटे को उनकी थाली में बची हुई जूठन खिला देती। सातवें बेटे की पत्नी इस अन्याय से दुखी थी, परंतु उसका भोला-भाला पति इस पर ध्यान नहीं देता था।

एक दिन बहू ने यह बात अपने पति से कही। पति ने सच्चाई जानने के लिए सिरदर्द का बहाना बनाया और रसोई में जाकर छुपकर देखा। जब उसे सच्चाई का पता चला, तो उसने अपने घर से दूर किसी और राज्य में जाकर काम करने का निश्चय किया। घर छोड़ते समय उसने अपनी पत्नी को एक अंगूठी दी और विदा हो गया।

दूसरे राज्य में उसे एक सेठ की दुकान पर काम मिल गया। अपनी मेहनत के बल पर उसने सेठ के व्यापार में जल्दी ही अपनी जगह बना ली। उधर, बेटे के घर से चले जाने के बाद सास-ससुर ने बहू पर और अधिक अत्याचार करना शुरू कर दिया। बहू से घर का सारा काम करवाया जाता और उसे भूसे की रोटी और नारियल के खोल में पानी दिया जाता।

एक दिन लकड़ी बीनने जाते समय बहू ने कुछ महिलाओं को संतोषी माता की पूजा करते देखा। उनसे पूजा विधि जानकर उसने कुछ लकड़ियां बेच दीं और सवा रुपए का गुड़-चना खरीदकर संतोषी माता का व्रत रखने का संकल्प लिया। दो शुक्रवार बीतते ही बहू को उसके पति द्वारा भेजे गए पैसे मिल गए।

 

मां संतोषी का आशीर्वाद

बहू ने संतोषी माता के मंदिर में जाकर प्रार्थना की कि उसका पति वापस लौट आए। माता ने स्वप्न में उसके पति को दर्शन दिए और बहू के कष्टों के बारे में बताया। माता की कृपा से अगले ही दिन पति का सारा लेन-देन निपट गया, और वह गहने और कपड़े लेकर घर लौट आया।

उधर, बहू ने रोज लकड़ियां बीनते हुए संतोषी माता के मंदिर में दर्शन किए और अपनी समस्याओं को माता के साथ साझा किया। एक दिन माता ने स्वप्न में उसे बताया कि उसका पति जल्द ही लौट आएगा।

जब पति घर आया, तो उसने अपनी पत्नी की हालत देखी और अपनी मां से प्रश्न किया। बहू ने घर के बाहर से आवाज लगाई और भूसे की रोटी और नारियल के खोल में पानी मांगा। यह सुनकर सास ने झूठ बोलकर बहू पर आरोप लगाए, लेकिन बेटा सच समझ गया और अपनी पत्नी को अलग ले जाकर सुख से रहने लगा।

 

 व्रत की परीक्षा और सफलता

कुछ समय बाद बहू ने शुक्रवार व्रत के उद्यापन (पूजा समापन) की इच्छा जताई। पति की अनुमति लेकर उसने अपने जेठ के बच्चों को निमंत्रण दिया। लेकिन जेठानी ने बच्चों को सिखा दिया कि खटाई मांगना। व्रत में खटाई खाना मना था, परंतु बच्चों ने जिद पकड़ ली और इमली खा ली। इस वजह से संतोषी माता नाराज हो गईं और बहू के पति को राजा के सैनिक पकड़कर ले गए।

बहू ने माता से क्षमा मांगी और दोबारा व्रत करने का संकल्प लिया। माता के आशीर्वाद से उसका पति रिहा हो गया। अगले शुक्रवार को बहू ने ब्राह्मण के बच्चों को भोजन कराया और दक्षिणा में पैसे देने की बजाय फल दिए। इस पर संतोषी माता प्रसन्न हुईं और बहू को सुंदर पुत्र का आशीर्वाद दिया।

इस घटना के बाद पूरे परिवार ने संतोषी माता की विधिवत पूजा शुरू कर दी और सुख-समृद्धि के साथ अपना जीवन व्यतीत किया।

 

पूजा विधि और नियम (Rules & Rituals)

संतोषी माता के व्रत में सादगी और शुद्धता का बड़ा महत्व है:

  • प्रसाद: इस पूजा का मुख्य प्रसाद गुड़ और भुना हुआ चना है।
  • कलश स्थापना: एक पात्र में जल भरकर रखें और उस पर गुड़-चने का कटोरा रखें।
  • पूजा: माता की प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं, कथा पढ़ें और आरती करें। पूजा के बाद कलश के जल को घर के कोनों में छिड़कें और बाकी जल तुलसी में डाल दें।
  • भोजन: व्रत करने वाला व्यक्ति दिन में एक बार भोजन करे।

सबसे महत्वपूर्ण नियम: खटाई का निषेध

संतोषी माता के व्रत में कुछ विशेष सावधानियां बरतना अनिवार्य है, अन्यथा व्रत निष्फल माना जाता है:

  1. खट्टा न खाएं: व्रत के दिन नींबू, इमली, दही, अचार या कोई भी खट्टी चीज न खाएं।
  2. खट्टा न छुएं: न केवल व्रत करने वाला, बल्कि परिवार का कोई भी सदस्य उस दिन घर में खटाई न लाए और न ही खाए।
  3. उद्यापन में सावधानी: उद्यापन के दिन जो बच्चे भोजन करने आएं, उन्हें भी खटाई वाली कोई चीज न खिलाएं।

उद्यापन विधि (Conclusion)

जब 16 शुक्रवार पूरे हो जाएं, तो अंतिम शुक्रवार को उद्यापन किया जाता है। इसमें 8 बालकों को भोजन कराया जाता है। भोजन में खीर-पूरी का भोग लगाया जाता है। याद रहे, बालकों को दक्षिणा में पैसे न देकर फल या कोई उपहार दें, ताकि वे बाहर जाकर कोई खट्टी चीज (जैसे टॉफी या अचार) न खरीद सकें।

।। जय माता संतोषी ।।

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