स्कन्द षष्ठी 2026 कब है? जानें तिथि, व्रत की विधि, पूजा का शुभ मुहूर्त, भगवान कार्तिकेय की आराधना का महत्व और कथा
स्कन्द षष्ठी 2026 (वैशाख मास शुक्ल पक्ष)
हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि 22 अप्रैल 2026, बुधवार को पड़ेगी। यह तिथि भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) को समर्पित मानी जाती है।
षष्ठी तिथि का समय:
षष्ठी तिथि का प्रारंभ 22 अप्रैल 2026 को रात 1 बजकर 19 मिनट पर होगा और इसका समापन 22 अप्रैल 2026 को रात 10 बजकर 49 मिनट पर होगा।
इस दिन भगवान कार्तिकेय की पूजा, व्रत और आराधना करने से साहस, शक्ति और विजय की प्राप्ति होती है।
स्कंद षष्ठी: कथा, महत्व और पूजन विधि
स्कन्द षष्ठी भगवान कार्तिकेय (स्कन्द, मुरुगन, कुमार) को समर्पित तिथि है। हर माह शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को स्कन्द षष्ठी मनाई जाती है, लेकिन चैत्र मास की स्कन्द षष्ठी विशेष रूप से अत्यंत शुभ और फलदायी मानी जाती है।
स्कन्द षष्ठी क्या है?
यह तिथि भगवान शिव के पुत्र भगवान स्कन्द को समर्पित है, जो देवताओं के सेनापति माने जाते हैं।इन्हें शक्ति, पराक्रम, साहस और रक्षा के देवता के रूप में पूजा जाता है।
स्कंद षष्ठी की कथा (Skanda Sashti Katha)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय के जन्म और उनकी विजय से जुड़ी है:
जब तारकासुर नामक दैत्य ने अपने बल से तीनों लोकों में आतंक फैला दिया था, तब देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा। ब्रह्मा जी के वरदान के अनुसार, तारकासुर का वध केवल शिव और पार्वती के पुत्र द्वारा ही हो सकता था। देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान शिव के तेज से बालक कार्तिकेय (स्कंद) का जन्म हुआ। पुराणों के अनुसार, छह कृतिकाओं ने उनकी रक्षा और स्तनपान कराया था, इसलिए उन्हें कार्तिकेय कहा जाता है। षष्ठी तिथि के दिन ही भगवान कार्तिकेय ने दैत्य तारकासुर का वध किया और देवताओं को उनका स्थान वापस दिलाया। यह दिन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
महत्व और मान्यताएं (Importance and Beliefs)
स्कंद षष्ठी का व्रत और पूजन करने से भक्तों को कई लाभ मिलते हैं:
- संतान प्राप्ति: यह व्रत संतान प्राप्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे संतान षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है।
- सुख-समृद्धि और सौभाग्य: भगवान कार्तिकेय की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि, सौभाग्य और सफलता की प्राप्ति होती है।
- विजय और आत्मबल: यह दिन विजय और शक्ति का दिन माना जाता है। पूजा से जीवन में मजबूती और आत्मबल आता है।
- रोग निवारण: मान्यता है कि स्कंद षष्ठी की उपासना से च्यवन ऋषि को आँखों की ज्योति प्राप्त हुई थी, और इस व्रत की कृपा से मृत शिशु भी जीवित हो जाता है।
पूजन विधि (Puja Vidhi)
स्कंद षष्ठी का व्रत हर महीने शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को रखा जाता है।
- व्रत संकल्प: सुबह जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर की साफ-सफाई करें और व्रत का संकल्प लें।
- स्थापना: पूजा घर में भगवान कार्तिकेय (स्कंद), शिव जी, और माता गौरी (पार्वती) की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- पूजा सामग्री: पूजन सामग्री (जल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, चंदन, अक्षत, हल्दी, कलावा, मौसमी फल, फूल, मेवा, धूप, दीपक) तैयार करें।
- स्नान: भगवान कार्तिकेय को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर का मिश्रण) से स्नान कराएँ।
- अर्पण: उन्हें नए वस्त्र पहनाएँ, कमल का फूल अर्पित करें (इसे शुभ माना जाता है), धूप-दीप जलाएँ और भोग लगाएँ। भोग में सात्विक मिठाई (जैसे खीर या फल) शामिल करें।
- अखंड दीपक: इस दिन स्कंद देव की स्थापना करके अखंड दीपक जलाना शुभ माना जाता है।
- पाठ और आरती: स्कंद षष्ठी व्रत कथा पढ़ें या सुनें, और अंत में भगवान कार्तिकेय की आरती करें।
- दान: इस दिन दान करना भी शुभ माना जाता है।
- नियम: व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करें और तामसिक भोजन (जैसे मांस, शराब, प्याज, लहसुन) का सेवन न करें।
।। मुरुगन स्वामी की जय ।।
