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सोमवार व्रत: कथा, महत्व और मान्यता
सम्पूर्ण पूजा विधि व लाभ

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सोमवार व्रत

सोमवार का व्रत (Somvar Vrat) भगवान शिव को समर्पित है। सनातन धर्म में शिव जी को ‘आशुतोष’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है – जो बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते है। सोमवार का संबंध चंद्रमा (सोम) से भी है, जिसे भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण किया हुआ है।

यहाँ सोमवार व्रत की कथा, महत्व और मान्यताओं का विस्तृत विवरण है:

सोमवार व्रत के प्रकार

मुख्य रूप से तीन प्रकार के सोमवार व्रत रखे जाते हैं:

  1. साधारण सोमवार व्रत: यह हर सोमवार को रखा जा सकता है।
  2. सौम्य प्रदोष व्रत: सोमवार के दिन आने वाला प्रदोष व्रत।
  3. सोलह सोमवार व्रत: यह कठिन व्रत होता है, जिसे विशेष मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए लगातार 16 सोमवार तक रखा जाता है।

सोमवार व्रत कथा: (somvar vrat katha)

किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसके घर में धन की कोई कमी नहीं थी लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी जिस वजह से वह बेहद दुखी था। पुत्र प्राप्ति के लिए वह भगवान शिव प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिवालय में जाकर भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता था। उसकी भक्ति देखकर मां पार्वती प्रसन्न हो गई और भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का निवेदन किया। पार्वती जी की इच्छा सुनकर भगवान शिव ने कहा कि “हे पार्वती। इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों के अनुसार फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है।” लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई। माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसके बालक की आयु केवल बारह वर्ष होगी। माता पार्वती और भगवान शिव की इस बातचीत को साहूकार सुन रहा था। उसे ना तो इस बात की खुशी थी और ना ही गम। वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा। कुछ समय उपरांत साहूकार के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया।

साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन दिया और कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाओ और मार्ग में यज्ञ कराओ। जहां भी यज्ञ कराओ वहीं पर ब्राह्मणों को भोजन कराते और दक्षिणा देते हुए जाना। दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते काशी की ओर चल पड़े। राते में एक नगर पड़ा जहां नगर के राजा की कन्या का विवाह था। लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था। राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र के काना होने की बात को छुपाने के लिए एक चाल सोची। साहूकार के पुत्र को देखकर उसके मन में एक विचार आया। उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा।

लड़के को दूल्हे का वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह कर दिया गया। लेकिन साहूकार का पुत्र एक ईमानदार शख्स था। उसे यह बात न्यायसंगत नहीं लगी। उसने अवसर पाकर राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर लिखा कि “तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है। मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं।”
जब राजकुमारी ने चुन्नी पर लिखी बातें पढ़ी तो उसने अपने माता-पिता को यह बात बताई। राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया जिससे बारात वापस चली गई। दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया। जिस दिन लड़के की आयु 12 साल की हुई उसी दिन यज्ञ रखा गया। लड़के ने अपने मामा से कहा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। मामा ने कहा कि तुम अन्दर जाकर सो जाओ।

शिवजी के वरदानुसार कुछ ही क्षणों में उस बालक के प्राण निकल गए। मृत भांजे को देख उसके मामा ने विलाप शुरू किया। संयोगवश उसी समय शिवजी और माता पार्वती उधर से जा रहे थे। पार्वती ने भगवान से कहा- प्राणनाथ, मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहा। आप इस व्यक्ति के कष्ट को अवश्य दूर करें| जब शिवजी मृत बालक के समीप गए तो वह बोले कि यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया। अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है। लेकिन मातृ भाव से विभोर माता पार्वती ने कहा कि हे महादेव आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प-तड़प कर मर जाएंगे। माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया| शिवजी की कृपा से वह लड़का जीवित हो गया। शिक्षा समाप्त करके लड़का मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिए। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां उसका विवाह हुआ था। उस नगर में भी उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया। उस लड़के के ससुर ने उसे पहचान लिया और महल में ले जाकर उसकी आवभगत की और अपनी पुत्री को विदा किया।

इधर भूखे-प्यासे रहकर साहूकार और उसकी पत्नी बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रण कर रखा था कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो वह भी प्राण त्याग देंगे परंतु अपने बेटे के जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद प्रसन्न हुए। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- हे श्रेष्ठी, मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लम्बी आयु प्रदान की है। जो कोई सोमवार व्रत करता है या कथा सुनता और पढ़ता है उसके सभी दुख दूर होते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

सोमवार व्रत का महत्व (Significance)

  1. मानसिक शांति: चंद्रमा मन का कारक है। सोमवार का व्रत करने से कुंडली में चंद्रमा मजबूत होता है, जिससे तनाव दूर होता है और मानसिक एकाग्रता बढ़ती है।
  2. दांपत्य सुख: अविवाहित लड़कियां मनचाहा वर पाने के लिए और विवाहित स्त्रियां अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत रखती हैं।
  3. स्वास्थ्य लाभ: शिव जी को ‘महामृत्युंजय’ माना जाता है। यह व्रत रोगों से मुक्ति और दीर्घायु प्रदान करता है।
  4. पाप मुक्ति: अनजाने में किए गए अपराधों के प्रायश्चित के लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी है।

पूजा विधि (somvar vrat puja vidhi)

सोमवार का व्रत भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे सरल और प्रभावशाली मार्ग माना जाता है। इस व्रत की पूजा विधि में शुद्धता और समर्पण का विशेष महत्व है।

यहाँ सोमवार व्रत की चरण-दर-चरण पूजा विधि दी गई है:

  1. प्रातः काल की तैयारी

  • स्नान: सोमवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। पानी में कुछ काले तिल डालकर स्नान करना और भी शुभ होता है।
  • वस्त्र: इस दिन सफेद या हल्के रंग के कपड़े पहनना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि सफेद रंग शांति का प्रतीक है और चंद्रमा (सोम) को प्रिय है।
  • संकल्प: घर के मंदिर में या शिव मंदिर जाकर हाथ में जल और चावल (अक्षत) लेकर व्रत का संकल्प लें:

हे महादेव, मैं आज आपके निमित्त सोमवार का व्रत रख रहा/रही हूँ। मेरी श्रद्धा स्वीकार करें और मेरी मनोकामना (यदि कोई हो तो बोलें) पूर्ण करें।”

  1. शिव अभिषेक (प्रमुख विधि)

भगवान शिव की पूजा में ‘अभिषेक’ सबसे महत्वपूर्ण है:

  1. शुद्ध जल: सबसे पहले शिवलिंग पर शुद्ध जल चढ़ाएं।
  2. पंचामृत: इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बारी-बारी या मिलाकर अभिषेक करें।
  3. गंगाजल: अंत में पुनः गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान कराएं और शिवलिंग को साफ कपड़े से धीरे से पोंछें।
  1. श्रृंगार और अर्पण

अभिषेक के बाद महादेव का श्रृंगार करें:

  • चंदन: सफेद चंदन का त्रिपुंड (तीन रेखाएं) बनाएं। (शिवलिंग पर रोली या सिंदूर न चढ़ाएं)।
  • अक्षत: बिना टूटे हुए साबुत चावल चढ़ाएं।
  • बेलपत्र: 3, 5 या 11 बेलपत्र चढ़ाएं। ध्यान रहे कि बेलपत्र का चिकना हिस्सा शिवलिंग की ओर हो।
  • धतूरा और फूल: धतूरा, भांग, शमी के पत्ते और सफेद फूल (आक या कनेर) अर्पित करें।
  • धूप-दीप: गाय के घी का दीपक जलाएं और धूप दिखाएं।
  1. कथा और मंत्र जाप

  • व्रत कथा: आसन पर बैठकर ‘सोमवार व्रत कथा’ का पाठ करें या सुनें। बिना कथा के व्रत अधूरा माना जाता है।
  • मंत्र: पूजा के दौरान निरंतर ॐ नमः शिवाय” का मानसिक जाप करते रहें।
  • आरती: अंत में कपूर जलाकर भगवान शिव की आरती करें।
  1. भोजन और पारण के नियम

  • उपवास का प्रकार: सोमवार के व्रत में दिन भर निराहार या फलाहार रहा जाता है।
  • एक समय भोजन: शाम की पूजा के बाद ही भोजन ग्रहण किया जाता है। भोजन पूरी तरह सात्विक (बिना लहसुन-प्याज का) होना चाहिए।
  • नमक का नियम: कई लोग इस व्रत में साधारण नमक की जगह सेंधा नमक खाते हैं, जबकि कुछ लोग बिना नमक का भोजन (मीठा भोजन जैसे खीर या चूरमा) करते है।

पूजा सामग्री सूची (Checklist)

सामग्री

क्यों आवश्यक है?

ताजा जल/गंगाजल

अभिषेक के लिए

गाय का कच्चा दूध

चंद्रमा की शांति और मन की शुद्धि के लिए

बेलपत्र

तीन जन्मों के पापों के नाश के लिए

सफेद चंदन

शांति और शीतलता के लिए

धतूरा/भांग

वैराग्य और समर्पण के प्रतीक

विशेष ध्यान रखने योग्य बातें (Precautions)

  1. वर्जित चीजें: शिवलिंग पर हल्दी, सिंदूर, तुलसी के पत्ते और केतकी का फूल कभी न चढ़ाएं।
  2. तांबे का पात्र: दूध अर्पित करने के लिए तांबे के पात्र का प्रयोग न करें (तांबे में दूध विष के समान माना जाता है), स्टील या चांदी के लोटे का प्रयोग करें।
  3. परिक्रमा: शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा न करें। जहाँ से जल बाहर निकलता है (जलाधारी), उसे लांघना नहीं चाहिए। हमेशा अर्ध-परिक्रमा ही करें।

हर हर महादेव

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