Spread the love

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी: हर संकट और बाधा को हरने वाले 'विघ्नराज' की आराधना का महापर्व

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी मंगलवार, 29 सितम्बर 2026 को मनाई जाएगी।

संकष्टी के दिन चन्द्रोदय: रात्रि 07:44 बजे

चतुर्थी तिथि प्रारम्भ: 29 सितम्बर 2026 को सायं 05:09 बजे

चतुर्थी तिथि समाप्त: 30 सितम्बर 2026 को दोपहर 02:55 बजे

सनातन धर्म में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान श्री गणेश की पूजा के बिना अधूरी मानी जाती है। भगवान गणेश के कई नाम हैं, जिनमें से एक अत्यंत प्रभावशाली नाम है- विघ्नराज’ (यानी विघ्नों या बाधाओं के राजा/नियंत्रक)।

हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक महीने में दो चतुर्थी तिथियां आती हैं। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को ‘संकष्टी’ (संकट हरने वाली) और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को ‘विनायक’ चतुर्थी कहा जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष (उत्तर भारतीय पंचांग के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान) में आने वाली संकष्टी चतुर्थी को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी’ (Vighnaraja Sankashti Chaturthi) के नाम से जाना जाता है।

आइए, जीवन के सभी संकटों को पल भर में दूर करने वाले इस परम कल्याणकारी व्रत के अर्थ, इसके गहरे महत्व, विघ्नासुर के वध की पौराणिक कथा और पूजा के नियमों को विस्तार से समझते हैं।

भगवान श्री गणेश जी की आरती एवं श्री गणेश चालीसा का पाठ करने के लिए यहाँ क्लिक करें।

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी क्या है?

‘संकष्टी’ संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है- कठिन समय या संकट से मुक्ति पाना

आश्विन मास की इस चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के विघ्नराज’ स्वरूप की पूजा की जाती है। ‘विघ्न’ का अर्थ है रुकावट या बाधा, और ‘राज’ का अर्थ है स्वामी। भगवान गणेश ही वह परम शक्ति हैं जो किसी भी कार्य में बाधा डाल भी सकते हैं (यदि कार्य अहंकार से किया जाए) और बड़ी से बड़ी बाधा को हटा भी सकते हैं। इस दिन व्रत रखने और रात को चंद्रमा के दर्शन करने से जीवन की रुकी हुई तरक्की के रास्ते खुल जाते हैं।

 

विघ्नराज संकष्टी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

आश्विन मास पितरों (पूर्वजों) के तर्पण का महीना होता है। इस दौरान आने वाली विघ्नराज संकष्टी का महत्व और भी बढ़ जाता है:

  • रुके हुए कार्यों की पूर्णता: यदि आपका कोई काम लंबे समय से अटका हुआ है, कोर्ट-कचहरी का मामला हो या नौकरी में प्रमोशन रुका हो, तो विघ्नराज गणेश की पूजा से वह कार्य निर्विघ्न पूरा होता है।
  • शारीरिक और मानसिक कष्टों का अंत: यह व्रत स्वास्थ्य लाभ के लिए भी किया जाता है। भगवान गणेश बुद्धि के देवता हैं, जो मानसिक तनाव और अज्ञात भय से मुक्ति दिलाते हैं।
  • पितृ दोष से राहत: चूंकि यह संकष्टी पितृ पक्ष के दौरान आती है, इसलिए इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने और चंद्रमा को अर्घ्य देने से परिवार पर पितरों की कृपा बनी रहती है और वंश वृद्धि होती है।

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक व्रत कथा (विघ्नासुर का प्रसंग)

विघ्नराज संकष्टी की यह व्रत कथा अत्यंत रोचक है, जो बताती है कि भगवान गणेश का नाम ‘विघ्नराज’ कैसे पड़ा:

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में अभिनंदन नाम के एक अत्यंत प्रतापी राजा थे। एक बार उन्होंने अपने राज्य में एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। अहंकार के कारण राजा अभिनंदन ने इस यज्ञ में देवराज इंद्र को आमंत्रित नहीं किया।

देवराज इंद्र को यह अपना बहुत बड़ा अपमान लगा। क्रोधित होकर इंद्र ने ‘काल’ (समय पुरुष) को आदेश दिया कि वह जाकर राजा अभिनंदन के यज्ञ को नष्ट कर दे। इंद्र का आदेश पाकर काल ने एक अत्यंत भयंकर और शक्तिशाली असुर (राक्षस) का रूप धारण किया, जिसका नाम विघ्नासुर’ रखा गया।

विघ्नासुर ने धरती पर आते ही हाहाकार मचा दिया। उसने न केवल राजा अभिनंदन के यज्ञ को तहस-नहस कर दिया, बल्कि वह पूरी पृथ्वी पर होने वाले हर शुभ कार्य, पूजा-पाठ और यज्ञों में बाधा डालने लगा। धीरे-धीरे पृथ्वी पर धर्म का नाश होने लगा।

सभी ऋषि-मुनि और देवता घबराकर सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि विघ्नासुर को रोकने की शक्ति केवल भगवान श्री गणेश के पास है। तब सभी देवताओं और ऋषियों ने भगवान गणेश की कठोर तपस्या की।

देवताओं की पुकार सुनकर भगवान गणेश प्रकट हुए और उन्होंने विघ्नासुर को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ, लेकिन विघ्नासुर भगवान गणेश के असीम बल के आगे टिक नहीं सका। जब विघ्नासुर को लगा कि उसकी मृत्यु निश्चित है, तो वह भगवान गणेश के चरणों में गिर पड़ा और क्षमा मांगने लगा।

विघ्नासुर ने हाथ जोड़कर कहा- हे प्रभु! मुझे क्षमा करें। मैं हमेशा के लिए आपके अधीन रहना चाहता हूँ। कृपया मुझे अपने नाम के साथ जोड़ लें।”

भगवान गणेश ने उसकी क्षमा याचना स्वीकार की और कहा— आज से तुम केवल वहीं बाधा (विघ्न) डालोगे जहाँ मेरी पूजा नहीं की जाएगी या जहाँ लोग अहंकार से काम करेंगे। जो भी भक्त मेरी पूजा करेगा, वहाँ तुम कभी फटकोगे भी नहीं।”

चूंकि भगवान गणेश ने विघ्नासुर को अपने अधीन कर लिया था, इसलिए उस दिन से भगवान गणेश को विघ्नराज’ (विघ्नासुर के राजा) कहा जाने लगा। मान्यता है कि आश्विन मास की कृष्ण चतुर्थी को ही यह घटना घटी थी।

 

पूजा विधि और चंद्रमा को अर्घ्य (Arghya) के नियम

संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा की पूजा के बिना अधूरा माना जाता है। इसकी पूजा विधि इस प्रकार है:

  1. प्रातःकाल का संकल्प: सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि कर लें। स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र पहनें और दिन भर के निराहार (या फलाहार) व्रत का संकल्प लें।
  2. संध्याकालीन पूजा: संकष्टी की मुख्य पूजा शाम (सूर्यास्त) के समय की जाती है। एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।
  3. दूर्वा और मोदक का भोग: भगवान विघ्नराज को कुमकुम, अक्षत, और लाल पुष्प अर्पित करें। गणेश जी को 21 दूर्वा (हरी घास) की गांठें अवश्य चढ़ाएं, यह उन्हें सबसे प्रिय है। इसके बाद मोदक, लड्डू और तिल का भोग लगाएं।
  4. कथा का पाठ: विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा (विघ्नासुर की कथा) का पाठ करें और ॐ विघ्नराजाय नमः’ या ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का जाप करें।
  5. चंद्र दर्शन और अर्घ्य: रात के समय जब चंद्रमा उदय हो जाए, तब एक लोटे में शुद्ध जल, थोड़ा सा कच्चा दूध, सफेद फूल और अक्षत डालकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। चंद्रमा से अपने परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें। अर्घ्य देने के बाद ही अन्न या फलाहार ग्रहण कर व्रत का पारण (व्रत खोलें) करें।

निष्कर्ष

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का पावन व्रत हमें यह जीवन-दर्शन सिखाता है कि हमारे जीवन में आने वाली बाधाएं (विघ्न) हमें तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि हमें ईश्वर के और करीब ले जाने के लिए आती हैं। जब हम अहंकार छोड़कर पूर्ण समर्पण के साथ विघ्नहर्ता भगवान गणेश की शरण में जाते हैं, तो बड़ी से बड़ी रुकावट भी सफलता की सीढ़ी बन जाती है। सच्चे मन से किया गया यह व्रत जीवन के हर अंधेरे को मिटाकर उन्नति का नया सवेरा लाता है।

|| जय श्री गणेश ||

Scroll to Top