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वृश्चिक संक्रान्ति: सूर्य देव का मंगल की राशि में प्रवेश, जानें स्नान-दान और पूजा का महापुण्य

वृश्चिक संक्रांति सोमवार, 16 नवम्बर 2026 को मनाई जाएगी। इस दिन सूर्य देव वृश्चिक राशि में प्रवेश करेंगे, जिसे धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

वृश्चिक संक्रांति पुण्य काल: दोपहर 12:06 बजे से सायं 05:27 बजे तक

अवधि: 05 घंटे 21 मिनट

वृश्चिक संक्रांति महा पुण्य काल: अपराह्न 03:40 बजे से सायं 05:27 बजे तक

अवधि: 01 घंटा 47 मिनट

सनातन हिंदू पंचांग और वैदिक ज्योतिष में ‘सूर्य देव’ (Sun) को ब्रह्मांड की आत्मा और सभी ग्रहों का राजा माना गया है। सूर्य देव हर महीने अपनी राशि बदलते हैं, और उनके एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करने की इस खगोलीय घटना को संक्रान्ति’ (Sankranti) कहा जाता है।

एक वर्ष में कुल 12 संक्रान्तियां होती हैं, और इन्हीं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण संक्रान्ति है- वृश्चिक संक्रान्ति’ (Vrishchika Sankranti)। यह आमतौर पर हर साल मध्य नवंबर (लगभग 16 नवंबर) के आस-पास आती है। यह वह समय होता है जब सर्दियां (हेमंत ऋतु) पूरी तरह से पृथ्वी पर अपना प्रभाव जमाना शुरू कर देती हैं। आइए, वृश्चिक संक्रान्ति के अर्थ, इसके गहरे ज्योतिषीय व धार्मिक महत्व, पौराणिक कथा और मान्यताओं को विस्तार से समझते हैं।

वृश्चिक संक्रांति पर सूर्य देव का वृश्चिक राशि में प्रवेश, स्वर्णिम आभा, स्नान-दान और धार्मिक अनुष्ठानों का दिव्य दृश्य

वृश्चिक संक्रान्ति क्या है? (ज्योतिषीय अर्थ)

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब सूर्य देव अपनी नीच राशि (तुला) की यात्रा पूरी करके राशि चक्र की आठवीं राशि वृश्चिक’ (Scorpio) में प्रवेश करते हैं, तो इस शुभ घड़ी को ‘वृश्चिक संक्रान्ति’ कहा जाता है।

वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल देव (Mars) हैं। सूर्य (अग्नि तत्व) और मंगल (ऊर्जा और साहस का तत्व) दोनों आपस में परम मित्र हैं। हालांकि, वृश्चिक एक ‘जल तत्व’ की राशि है। इसलिए जब अग्नि रूपी सूर्य जल तत्व की वृश्चिक राशि में प्रवेश करते हैं, तो प्रकृति और मानव शरीर में एक विशेष प्रकार का ऊर्जावान और आध्यात्मिक बदलाव आता है। यह गोचर लगभग एक महीने तक रहता है।

 

वृश्चिक संक्रान्ति का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व

इस संक्रान्ति का महत्व केवल ग्रहों के बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन के कई पहलुओं को प्रभावित करता है:

  • पुण्य काल और स्नान-दान: शास्त्रों में किसी भी संक्रान्ति के समय (सूर्य के गोचर से कुछ घंटे पहले और बाद का समय) को पुण्य काल’ कहा जाता है। इस दौरान पवित्र नदियों में स्नान करने और दान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • आत्मबल और साहस में वृद्धि: सूर्य जब अपने मित्र मंगल की राशि में आते हैं, तो यह लोगों के भीतर आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता (Leadership) और साहस में वृद्धि करता है।
  • ऋतु परिवर्तन (सर्दी का आगमन): यह संक्रान्ति हेमंत ऋतु के चरम और शीत ऋतु की शुरुआत का संकेत है। आयुर्वेद के अनुसार, इस समय सूर्य की किरणें शरीर को औषधीय लाभ प्रदान करती हैं और इम्युनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) बढ़ाती हैं।
  • पितरों का आशीर्वाद: वृश्चिक संक्रान्ति के दिन पूर्वजों (पितरों) के नाम पर तर्पण और श्राद्ध कर्म करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है।

वृश्चिक संक्रान्ति की पौराणिक कथा (दान का महत्व)

संक्रान्तियों के अवसर पर दान की महिमा को दर्शाने वाली एक अत्यंत प्रसिद्ध पौराणिक कथा है, जो बताती है कि इस दिन किया गया कर्म कैसे अनंत गुना फल देता है:

प्राचीन काल में एक अत्यंत गरीब लेकिन धर्मनिष्ठ ब्राह्मण रहता था। वह भगवान सूर्य का परम भक्त था, लेकिन गरीबी के कारण वह अपने परिवार का भरण-पोषण ठीक से नहीं कर पाता था। एक बार वृश्चिक संक्रान्ति का पावन दिन आया। उस दिन कड़ाके की ठंड पड़ना शुरू हो गई थी।

ब्राह्मण ने पवित्र नदी में स्नान किया और सूर्य देव को अर्घ्य दिया। तभी उसने देखा कि घाट पर एक अत्यंत वृद्ध और बीमार साधु ठंड से कांप रहा है। साधु के पास पहनने के लिए पर्याप्त वस्त्र नहीं थे।

ब्राह्मण के पास स्वयं केवल एक ही अतिरिक्त गर्म शॉल था, जो उसे किसी ने दान में दिया था। ब्राह्मण ने बिना एक पल सोचे अपना वह शॉल उस कांपते हुए साधु को ओढ़ा दिया और अपने हिस्से का थोड़ा सा अन्न भी उसे दे दिया। साधु ने प्रसन्न होकर ब्राह्मण को आशीर्वाद दिया और अचानक वह साधु साक्षात सूर्य देव के रूप में प्रकट हो गए।

सूर्य देव ने कहा, हे ब्राह्मण! वृश्चिक संक्रान्ति के इस पुण्य काल में, जब सर्दी का प्रकोप बढ़ रहा है, तुमने अपनी परवाह न करते हुए एक जरूरतमंद को गर्म वस्त्र और अन्न का दान किया है। संक्रान्ति के दिन किया गया यह दान कभी व्यर्थ नहीं जाता।”

सूर्य देव के आशीर्वाद से उस ब्राह्मण की सारी दरिद्रता हमेशा के लिए समाप्त हो गई और उसका घर धन-धान्य और सुख-शांति से भर गया। तभी से मान्यता है कि वृश्चिक संक्रान्ति के दिन जो व्यक्ति शीत ऋतु से बचाव के लिए ऊनी वस्त्रों और अन्न का दान करता है, सूर्य देव उसके जीवन के सभी कष्टों को हर लेते हैं।

 

वृश्चिक संक्रान्ति की पूजा विधि और मान्यताएं

इस पवित्र दिन पर सूर्य देव की कृपा पाने के लिए निम्नलिखित नियमों और पूजा विधि का पालन करना चाहिए:

  1. ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: वृश्चिक संक्रान्ति के दिन सूर्योदय से पहले उठकर किसी पवित्र नदी (जैसे गंगा, यमुना या नर्मदा) में स्नान करना सर्वोत्तम माना जाता है। यदि यह संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करें।
  2. सूर्य देव को अर्घ्य: स्नान के बाद तांबे के लोटे में शुद्ध जल, लाल चंदन (रोली), लाल पुष्प, अक्षत (चावल) और थोड़े से काले तिल मिलाकर उगते हुए सूर्य देव को अर्घ्य दें।
  3. सूर्य मंत्र का जाप: अर्घ्य देते समय ॐ सूर्याय नम:’ या ॐ घृणि सूर्याय नम:’ और ‘गायत्री मंत्र’ का जाप अवश्य करें।
  4. दान-पुण्य (Daan): संक्रान्ति के पुण्य काल में दान का सबसे अधिक महत्व है। चूंकि इसके बाद कड़ाके की ठंड शुरू होती है, इसलिए किसी गरीब या ब्राह्मण को ऊनी वस्त्र (कंबल, स्वेटर), गुड़, गेहूं, तांबे के बर्तन और तिल का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  5. पितृ तर्पण: इस दिन दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पितरों (पूर्वजों) के निमित्त काले तिल मिश्रित जल से तर्पण करें। इससे पितृ दोष समाप्त होता है।
  6. सात्विक भोजन: संक्रान्ति के दिन घर में लहसुन, प्याज, मांस और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करें और संभव हो तो एक समय सूर्य अस्त होने से पहले भोजन करें।

निष्कर्ष

वृश्चिक संक्रान्ति केवल एक खगोलीय घटना नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के बदलाव के साथ खुद को ढालने का संदेश है। यह दिन हमें सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य देव अपनी ऊर्जा से समस्त संसार को रोशन करते हैं, उसी प्रकार हमें भी अपने सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करके समाज के कमजोर वर्ग के जीवन में आशा की किरण फैलानी चाहिए। भगवान भास्कर की उपासना और इस दिन किए गए शुभ कर्म मनुष्य के शारीरिक रोगों और मानसिक अंधकार- दोनों का नाश कर देते हैं।

|| ॐ सूर्याय नम: ||

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