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भुवनेश्वरी जयन्ती: समूचे ब्रह्मांड की महारानी और महाविद्या माता भुवनेश्वरी के प्राकट्य का पावन पर्व

वर्ष 2026 भुवनेश्वरी जयन्ती बुधवार, सितम्बर 23, 2026 को मनाई जाएगी

द्वादशी तिथि प्रारम्भ – 22 सितम्बर 2026 को रात्रि 9:43 बजे

द्वादशी तिथि समाप्त – 23 सितम्बर 2026 को रात्रि 10:50 बजे

सनातन धर्म की शाक्त (शक्ति) परंपरा में दस महाविद्याओं (Ten Mahavidyas) की साधना को सबसे गुप्त, शक्तिशाली और तुरंत फल देने वाला माना गया है। इन दस महाविद्याओं में से चौथी सर्वोपरि शक्ति हैं- माता भुवनेश्वरी’। वे केवल एक क्षेत्र या लोक की नहीं, बल्कि इस अनंत ब्रह्मांड की आद्याशक्ति, विधाता और परमेश्वरी हैं।

दस महाविद्याओं (Ten Mahavidyas)- माँ काली, माँ तारा, माँ त्रिपुर सुंदरी, माँ भुवनेश्वरी, माँ छिन्नमस्ता, माँ त्रिपुर भैरवी, माँ धूमावती, माँ बगलामुखी, माँ मातंगी, माँ कमला

हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रतिवर्ष भाद्रपद (भादों) मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भुवनेश्वरी जयन्ती’ (Bhuvaneshwari Jayanti) के रूप में बड़े आदर और भक्ति भाव से मनाया जाता है। (यह दिन वामन द्वादशी के साथ ही पड़ता है)। आइए, सृष्टि की मूल आधारस्तंभ माता भुवनेश्वरी की अलौकिक कथा, आध्यात्मिक महत्त्व और इनसे जुड़ी प्रमुख मान्यताओं को विस्तार से जानते हैं।

Maa Bhuvaneshwari hd image

माता भुवनेश्वरी कौन हैं? (नाम का अर्थ और स्वरूप)

‘भुवनेश्वरी’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है- भुवन’ (जिसका अर्थ है संसार या चौदह लोक) और ईश्वरी’ (जिसका अर्थ है स्वामिनी या रानी)। अर्थात्, जो इस पूरे ब्रह्मांड की स्वामिनी हैं, वही माता भुवनेश्वरी हैं।

देवी भागवत पुराण के अनुसार, माता भुवनेश्वरी का स्वरूप अत्यंत दिव्य, सौम्य और ममतामयी है। उनका अंग-वर्ण उदित होते हुए सूर्य के समान लाल है। उनके मस्तक पर चंद्रमा का मुकुट सुशोभित है और उनकी तीन आंखें (त्रिनेत्र) हैं। अपनी चार भुजाओं में वे वरद मुद्रा, अभय मुद्रा, पाश और अंकुश धारण करती हैं। वे इस संसार की रचनाकार भी हैं और इसकी पोषिका भी।

 

भुवनेश्वरी जयन्ती का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व

तंत्र शास्त्र और सामान्य पूजा पद्धति में भी माता भुवनेश्वरी की आराधना को ‘अचूक’ माना गया है। इस जयन्ती पर पूजा करने का महत्त्व निम्नलिखित है:

  • दरिद्रता और ऋण से मुक्ति: माता भुवनेश्वरी को ‘श्री’ (लक्ष्मी) का मूल स्वरूप माना जाता है। इनकी साधना करने से मनुष्य के जीवन से घोर से घोर गरीबी, दरिद्रता और कर्ज (Loan) का नाश होता है।
  • भौतिक सुख और मोक्ष (भोग और मोक्ष दोनों): आमतौर पर माना जाता है कि जो व्रत भौतिक सुख देता है, वह मोक्ष नहीं देता। लेकिन माता भुवनेश्वरी की कृपा ऐसी है कि वे अपने साधक को संसार के सभी ऐश्वर्य (मकान, वाहन, धन) भी देती हैं और अंत में मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं।
  • वाणी और ज्ञान की प्राप्ति: महाविद्या होने के कारण माता भुवनेश्वरी की कृपा से साधक की बुद्धि कुशाग्र होती है, उसकी वाणी में सम्मोहन शक्ति आती है और समाज में उसका मान-सम्मान (Fame) बढ़ता है।

माता भुवनेश्वरी के प्राकट्य की पौराणिक कथा

देवी भागवत महापुराण में माता भुवनेश्वरी के प्राकट्य और सृष्टि के निर्माण की अत्यंत अद्भुत कथा मिलती है:

सृष्टि के आरंभ से पहले न तो आकाश था, न पृथ्वी, न सूर्य, न चंद्रमा और न ही कोई तारा। चारों ओर केवल और केवल अंधकार था, जिसमें कोई गति नहीं थी। उस महाशून्य में केवल एक परम सत्ता ‘सच्चिदानंद’ (निराकार ब्रह्म) विद्यमान थे।

एक समय आया जब उस निराकार शक्ति के भीतर संसार की रचना करने की इच्छा जाग्रत हुई। अपनी इसी इच्छा (संकल्प) को पूरा करने के लिए उन्होंने साकार रूप धारण किया। तब उस महाशून्य से साक्षात आद्याशक्ति माता भुवनेश्वरी प्रकट हुईं। वे ही इस संसार की ‘प्रकृति’ बनीं।

प्रकट होने के बाद माता भुवनेश्वरी ने अपने तीन मुख्य गुणों (सत्व, रज और तम) के माध्यम से तीन मुख्य शक्तियों को जन्म दिया, जिन्हें हम ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) के नाम से जानते हैं।

शुरुआत में जब ये तीनों देव प्रकट हुए, तो उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस महाशून्य में उनका क्या कर्तव्य है। तब माता भुवनेश्वरी ने उन्हें दर्शन दिए और अपनी अलौकिक शक्ति से परिचित कराया। माता ने ब्रह्मा जी को ‘सृजन’ (निर्माण करने), भगवान विष्णु को ‘पालन’ (संसार को चलाने) और भगवान शिव को ‘संहार’ (परिवर्तन करने) का उत्तरदायित्व सौंपा।

इसके बाद, माता ने अपने दिव्य अंश से सूर्य, चंद्रमा, अग्नि, वायु और जल जैसे पंचभूतों का निर्माण किया और चौदह भुवनों (लोकों) की रचना की। चूंकि इन सभी लोकों का निर्माण और नियंत्रण माता ने स्वयं किया, इसलिए वे ‘भुवनेश्वरी’ कहलाईं।

 

मणि द्वीप: माता का अलौकिक निवास स्थान

शास्त्रों में माता भुवनेश्वरी के निवास स्थान के रूप में मणीद्वीप’ (Mani Dweepa) का वर्णन आता है।

मान्यताओं के अनुसार, मणि द्वीप ब्रह्मांड के सबसे ऊपरी हिस्से में स्थित एक अत्यंत गोपनीय और दिव्य लोक है। यह लोक वैकुंठ, कैलाश और गोलोक से भी ऊपर माना गया है।

इस द्वीप पर चिंतामणि के बने महल हैं, जहाँ माता भुवनेश्वरी ब्रह्मांड की महारानी के रूप में सिंहासन पर विराजमान रहती हैं। सृष्टि के तीनों मुख्य देव (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) भी समय-समय पर माता के दर्शनों और ब्रह्मांड के संचालन की शक्ति प्राप्त करने के लिए मणि द्वीप पर जाते हैं।

 

भुवनेश्वरी जयन्ती की पूजा विधि

इस पावन दिन पर माता भुवनेश्वरी की पूजा अत्यंत सरल और सात्विक विधि से की जा सकती है:

  1. प्रातःकाल की शुद्धि: सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त हों और लाल रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें (माता को लाल रंग अत्यंत प्रिय है)।
  2. पूजा स्थान की तैयारी: एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर माता भुवनेश्वरी का चित्र या ‘भुवनेश्वरी यंत्र’ स्थापित करें।
  3. श्रृंगार और अर्पण: माता को कुमकुम, अक्षत (चावल), लाल फूल (विशेषकर गुड़हल या गुलाब) और इत्र अर्पित करें। उन्हें श्रृंगार की सामग्री (सिंदूर, चूड़ियां) चढ़ाएं।
  4. नैवेद्य (भोग): माता को सफेद रंग की मिठाइयां (जैसे पेड़ा या रसगुल्ला), फल और पंचमेवा का भोग लगाएं।
  5. मंत्र जाप: माता का सबसे सिद्ध और सरल बीज मंत्र ह्रीं’ (Hreem) है। इस दिन लाल चंदन की माला या स्फटिक की माला से ॐ भुवनेश्वर्यै नमः’ या केवल ह्रीं’ मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
  6. आरती और क्षमा याचना: पूजा के अंत में धूप-दीप जलाकर माता की आरती करें और अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगें।

निष्कर्ष

भुवनेश्वरी जयन्ती का यह महापर्व हमें यह सिखाता है कि इस दृश्यमान संसार में जो कुछ भी हम देख रहे हैं, वह सब उसी एक परम करुणामयी माता का अंश है। माता भुवनेश्वरी संसार की हर मां के समान दयालु हैं, जो अपने बच्चे (भक्त) को कभी भूखा या दुखी नहीं देख सकतीं। भाद्रपद मास की इस शुक्ल द्वादशी को जो भी व्यक्ति पूरी निष्ठा से माता भुवनेश्वरी की शरण में जाता है, उसके जीवन के सभी संकट, अभाव और अंधकार हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं।

जय मातेश्वरी, जय भुवनेश्वरी!

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