धनतेरस: स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि के आगमन का महापर्व
धनतेरस शुक्रवार, 6 नवम्बर 2026 का मनाई जाएगी
- धनतेरस पूजा मुहूर्त: सायं 06:02 बजे से 07:57 बजे तक
- मुहूर्त अवधि: 01 घंटा 56 मिनट
यम दीपदान (यम दीपम) – शुक्रवार, 6 नवम्बर 2026
- यम दीपदान का समय (सायंकाल संध्या): सायं 05:33 बजे से 06:51 बजे तक
- अवधि: 01 घंटा 18 मिनट
प्रदोष काल: सायं 05:33 बजे से 08:09 बजे तक
वृषभ काल: सायं 06:02 बजे से 07:57 बजे तक
त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ: 6 नवम्बर 2026 को प्रातः 10:30 बजे से
त्रयोदशी तिथि समाप्त: 7 नवम्बर 2026 को प्रातः 10:47 बजे तक
धनतेरस के दिन प्रदोष काल और वृषभ काल में भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी तथा भगवान कुबेर की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यम दीपदान करने से अकाल मृत्यु के भय से रक्षा होने की मान्यता है।
भारतवर्ष में दीपावली का उत्सव केवल एक दिन का नहीं, बल्कि पांच दिनों का एक भव्य महा-पर्व है। इस पांच दिवसीय प्रकाशोत्सव की शुरुआत जिस पहले शुभ दिन से होती है, उसे ‘धनतेरस‘ (Dhanteras) कहा जाता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, धनतेरस का पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि (13वें दिन) को मनाया जाता है। आम धारणा है कि धनतेरस केवल सोना-चांदी या बर्तन खरीदने का दिन है, लेकिन शास्त्रों के अनुसार यह दिन मुख्य रूप से ‘स्वास्थ्य’ (आरोग्य) और ‘आयुर्वेद’ के जनक भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य का दिन है। आइए, धनतेरस के वास्तविक अर्थ, इसके गहरे महत्व, पौराणिक कथाओं और मान्यताओं को विस्तार से समझते हैं।
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धनतेरस क्या है?
‘धनतेरस’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘धन‘ (संपत्ति/समृद्धि) और ‘तेरस‘ (हिन्दू पंचांग के अनुसार 13वीं तिथि) । यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि (आयुर्वेद के देवता), माँ लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की पूजा की जाती है।
पौराणिक कथाएँ (Stories)
धनतेरस से जुड़ी मुख्य रूप से दो कथाएँ प्रचलित हैं:
भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने की कथा 1: पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया।कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए।वे अपने हाथों में अमृत से भरा कलश लेकर आए। भगवान धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अंश और देवताओं के वैद्य (चिकित्सा के देवता) माना गया।चूँकि वे अमृत कलश (धन) के साथ त्रयोदशी के दिन प्रकट हुए, इसीलिए यह तिथि “धन” + “तेरस” = धनतेरस कहलाने लगी।इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा करने से स्वास्थ्य, दीर्घायु और रोगों से मुक्ति की प्राप्ति होती है।इसी कारण इसे “धनत्रयोदशी” भी कहा जाता है।
यमराज और राजा हिम के पुत्र की कथा 2: एक समय की बात है, राजा हिम का एक सोलह वर्षीय पुत्र था। ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि विवाह के चौथे दिन उसे साँप के डँसने से मृत्यु हो जाएगी।जब राजकुमार का विवाह हुआ, तो उसकी पत्नी को यह बात पता चली।मृत्यु के दिन उसने अपने पति को सोने नहीं दिया। उसने कमरे के द्वार पर सोने-चाँदी के सिक्के और आभूषणों का ढेर लगा दिया और सैकड़ों दीपक जलाए।वह सारी रात कहानियाँ सुनाती और भक्ति गीत गाती रही।जब यमराज साँप के रूप में प्राण हरने आए, तो दीपों की रोशनी और आभूषणों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं।वे कमरे में प्रवेश नहीं कर सके और सिक्कों के ढेर पर बैठकर सारी रात गीत-संगीत सुनते रहे।प्रातःकाल होते ही यमराज बिना प्राण लिए लौट गए।इस प्रकार पत्नी की बुद्धिमानी और दीपों की रोशनी ने राजकुमार को अकाल मृत्यु से बचा लिया।तभी से इस दिन को अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति और दीर्घायु प्राप्ति के लिए मनाया जाने लगा।धनतेरस की शाम को घर के बाहर “यम दीप” जलाने की परंपरा भी इसी कथा से जुड़ी है।
धनतेरस का धार्मिक और व्यावहारिक महत्व
धनतेरस का पर्व हमें यह सिखाता है कि “पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में माया” (यानी सबसे बड़ा धन अच्छा स्वास्थ्य है, और उसके बाद भौतिक संपत्ति)। इसका महत्व इस प्रकार है:
- आरोग्य की प्राप्ति: इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा करने से गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है और परिवार में सभी को उत्तम स्वास्थ्य का वरदान प्राप्त होता है।
- अकाल मृत्यु से रक्षा (यम दीपदान): धनतेरस के दिन मृत्यु के देवता ‘यमराज’ के निमित्त दीपदान किया जाता है। मान्यता है कि इससे परिवार में अकाल मृत्यु (असमय मौत) का भय समाप्त हो जाता है।
- धन-धान्य में वृद्धि: माता लक्ष्मी और कुबेर देवता की उपासना से घर में स्थिर धन और ऐश्वर्य का वास होता है। इस दिन खरीदी गई वस्तुएं लंबे समय तक शुभ फल देती हैं।
प्रमुख मान्यताएँ और परंपराएँ (Traditions & Beliefs)
धनतेरस पर कुछ विशेष वस्तुओं की खरीदारी और कार्य करना बेहद शुभ माना जाता है:
- बर्तन और धातु खरीदना: इस दिन पीतल, तांबा, चांदी या सोने की वस्तुएँ खरीदना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि भगवान धन्वंतरि कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए बर्तन खरीदने की परंपरा शुरू हुई।
- झाड़ू खरीदना: मत्स्य पुराण के अनुसार, झाड़ू को माँ लक्ष्मी का रूप माना जाता है। धनतेरस पर नई झाड़ू खरीदने से घर से दरिद्रता (गरीबी) दूर होती है और नकारात्मक ऊर्जा बाहर जाती है।
- धनिया (Coriander Seeds): इस दिन सूखा धनिया खरीदना और उसे लक्ष्मी पूजा में चढ़ाना बहुत शुभ होता है। बाद में इसे गमले में बो दिया जाता है।
- यम का दीया: शाम के समय घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके एक चौमुखी दीया (चार बत्तियों वाला) जलाया जाता है। इसे ‘यम दीपक’ कहते हैं।
- खाता बही (Account Books): व्यापारी वर्ग इस दिन अपनी नई खाता बही खरीदते हैं और उसकी पूजा करते हैं।
धनतेरस की संपूर्ण पूजा विधि:
धनतेरस की पूजा को ‘प्रदोष काल’ (सूर्यास्त के बाद का समय) में करना सबसे शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, कुबेर जी, और माँ लक्ष्मी की पूजा की जाती है।
यहाँ धनतेरस की सरल और संपूर्ण पूजा विधि दी गई है:
पूजा सामग्री (आवश्यक वस्तुएँ)
- लकड़ी की चौकी और लाल या पीला कपड़ा।
- भगवान गणेश, माँ लक्ष्मी, कुबेर और भगवान धन्वंतरि की मूर्ति या चित्र।
- गंगाजल, रोली, चावल (अक्षत), चंदन, हल्दी।
- फूल और माला (विशेषकर गेंदा या कमल)।
- दीपक (घी और तेल के), धूप, अगरबत्ती।
- नैवेद्य (मिठाई, बताशे, खीर आदि)।
- विशेष: सूखा खड़ा धनिया, कौड़ियाँ, गोमती चक्र (यदि उपलब्ध हो)।
- धनतेरस पर खरीदी गई नई वस्तु (बर्तन, सोना, चांदी या आभूषण)।
पूजा विधि (Step-by-Step)
चरण 1: स्थापना
- सबसे पहले ईशान कोण (पूर्व-उत्तर दिशा) में चौकी बिछाएं और उस पर लाल कपड़ा डालें।
- गंगाजल छिड़क कर स्थान पवित्र करें।
- चौकी पर गणेश जी, माँ लक्ष्मी, कुबेर जी और भगवान धन्वंतरि की प्रतिमा स्थापित करें।
चरण 2: भगवान धन्वंतरि और कुबेर पूजन
- सबसे पहले गणेश जी का आवाहन करें और उन्हें तिलक व फूल चढ़ाएं।
- इसके बाद भगवान धन्वंतरि (स्वास्थ्य के देवता) को चंदन, फूल और जल अर्पित करें। उनसे अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करें।
- फिर कुबेर जी (धन के देवता) को रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएं। जो आभूषण या पैसा आप पूजा में रखना चाहते हैं, उसे कुबेर जी के प्रतीक के रूप में पूजें।
- मंत्र: “ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥”
चरण 3: माँ लक्ष्मी पूजन
- माँ लक्ष्मी को रोली, हल्दी और सिंदूर का तिलक लगाएं।
- उन्हें कमल का फूल (यदि हो तो) और अन्य सुगंधित फूल अर्पित करें।
- धनतेरस पर सूखा धनिया माँ लक्ष्मी को जरूर चढ़ाएं (इसे समृद्धि का प्रतीक माना जाता है)।
चरण 4: खरीदी गई वस्तु का पूजन
- बाजार से खरीदे गए नए बर्तन या आभूषण को चौकी पर रखें।
- उस पर स्वस्तिक का चिन्ह बनाएं या तिलक लगाएं और अक्षत छोड़ें।
चरण 5: भोग और आरती
- सभी देवी-देवताओं को मिठाई या खीर का भोग लगाएं।
- अंत में कपूर या घी के दीये से आरती करें।
- पूजा के बाद चढ़ाया गया धनिया अपने घर के गमले में बो दें और कुछ तिजोरी में रख लें।
यम दीपदान (शाम की विशेष परंपरा)
धनतेरस की शाम को यमराज के निमित्त दीया जलाना अनिवार्य माना जाता है। इसे ‘यम का दीया‘ कहते हैं।
- दीया कैसा हो: आटे से बना चौमुखी दीया (चार बत्तियों वाला) या पुराना मिट्टी का दीया लें।
- तेल: इसमें सरसों का तेल भरें।
- स्थान: पूजा के बाद घर के मुख्य द्वार के बाहर, दक्षिण दिशा (यम की दिशा) की ओर मुख करके दीया रखें।
- प्रार्थना: दीया रखते समय मन में प्रार्थना करें कि “हे यमराज, मेरे परिवार को अकाल मृत्यु से बचाएं और हम पर कृपा करें।”
निष्कर्ष
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि यदि हमारा शरीर स्वस्थ नहीं है, तो दुनिया की सारी दौलत व्यर्थ है। भगवान धन्वंतरि से उत्तम स्वास्थ्य की कामना और ‘यम दीपक’ जलाकर जीवन की रक्षा की प्रार्थना ही धनतेरस का वास्तविक और सबसे सुंदर उद्देश्य है।
|| जय माता लक्ष्मी ||
