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गोवर्धन परिक्रमा: श्री कृष्ण की लीलास्थली, आस्था का महापथ और मनोकामना पूर्ति का साधन

सनातन हिंदू धर्म और विशेषकर वैष्णव संप्रदाय में ब्रजभूमि (मथुरा-वृंदावन) का स्थान सबसे ऊपर है। ब्रज की इस पावन भूमि के केंद्र में स्थित है- गिरिराज गोवर्धन पर्वत। शास्त्रों में गोवर्धन पर्वत को भगवान श्री कृष्ण का साक्षात स्वरूप माना गया है।

हर साल लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से मथुरा आते हैं और गिरिराज महाराज की परिक्रमा करते हैं। यह परिक्रमा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह श्री कृष्ण के प्रति प्रेम, समर्पण और विश्वास का प्रतीक है। आइए, गोवर्धन परिक्रमा के अर्थ, इसकी लंबाई, भगवान कृष्ण से जुड़ी पौराणिक कथा, पूजा विधि और इसके विशेष नियमों को विस्तार से समझते हैं।

गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर श्रद्धालु और श्रीकृष्ण की लीलास्थली

गिरिराज गोवर्धन परिक्रमा क्या है?

गोवर्धन परिक्रमा का अर्थ है गोवर्धन पर्वत के चारों ओर पैदल या दंडवत चलते हुए उसकी परिक्रमा (चक्कर) लगाना। यह पर्वत उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के गोवर्धन नामक स्थान पर स्थित है।

  • परिक्रमा की कुल दूरी: गोवर्धन परिक्रमा की कुल दूरी लगभग 21 किलोमीटर (7 कोस) है।
  • परिक्रमा के दो भाग: यह परिक्रमा दो भागों में बंटी हुई है।
    1. बड़ी परिक्रमा (12 किमी): यह गोवर्धन के दानघाटी मंदिर से शुरू होकर आन्यौर, जतीपुरा होते हुए वापस गोवर्धन आती है।
    2. छोटी परिक्रमा (9 किमी): यह गोवर्धन से शुरू होकर राधा कुंड, श्याम कुंड, कुसुम सरोवर होते हुए वापस दानघाटी पर समाप्त होती है।

श्रद्धालु अपनी सुविधा के अनुसार इसे एक ही दिन में या रुक-रुक कर पूरा करते हैं।

गिरिराज गोवर्धन परिक्रमा कब लगानी चाहिए?

गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा यूं तो वर्ष के 365 दिन कभी भी की जा सकती है, क्योंकि भगवान की आराधना के लिए हर दिन शुभ होता है। लेकिन शास्त्रों और ब्रज की परंपराओं के अनुसार, कुछ विशेष तिथियों और पर्वों पर यह परिक्रमा करने से इसका फल अनंत गुना बढ़ जाता है।

  1. गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) – दीपावली के अगले दिन

यह गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा का सबसे मुख्य और ऐतिहासिक दिन है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (दीपावली के ठीक अगले दिन) को गोवर्धन पूजा या ‘अन्नकूट’ का पर्व मनाया जाता है। इसी पावन दिन द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र का अंहकार तोड़ने और ब्रजवासियों की रक्षा करने के लिए अपनी कनिष्ठा (सबसे छोटी) उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाया था।

  1. गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ पूर्णिमा / मुड़िया पूनो)

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को ‘गुरु पूर्णिमा’ कहा जाता है, लेकिन गोवर्धन में इसे मुड़िया पूनो‘ (Mudiya Poono) के नाम से जाना जाता है। इस दिन गोवर्धन में साल का सबसे बड़ा मेला लगता है, जिसमें लाखों-करोड़ों श्रद्धालु परिक्रमा करते हैं। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त और चैतन्य महाप्रभु के शिष्य श्री सनातन गोस्वामी जी से जुड़ा है। वे प्रतिदिन नियम से गोवर्धन की परिक्रमा करते थे। जब उनका गोलोक वास (निधन) हुआ, तो ब्रजवासियों ने शोक में अपना सिर मुंडवा लिया था (मुंडन कराया था)। इसी कारण इसे मुड़िया पूनो कहा जाता है।

  1. शरद पूर्णिमा

आश्विन मास की पूर्णिमा को ‘शरद पूर्णिमा’ कहा जाता है। यह रात ब्रजभूमि में अत्यंत रहस्यमयी और अलौकिक मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात को ही भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना तट पर गोपियों के साथ महारास रचाया था। इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और धरती पर अमृत की वर्षा करता है।

  1. एकादशी तिथि

हिंदू पंचांग के अनुसार, हर महीने में दो एकादशी तिथियां (कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष) आती हैं। एकादशी तिथि भगवान श्रीहरि विष्णु (और उनके अवतार श्रीकृष्ण) को सबसे अधिक प्रिय है। एकादशी को ‘हरि वासर’ (भगवान का दिन) कहा जाता है। विशेष रूप से देवशयनी एकादशी (जब भगवान योगनिद्रा में जाते हैं) और देवउठनी एकादशी (जब भगवान निद्रा से जागते हैं) पर परिक्रमा का भारी महत्व है।

  1. अधिक मास (मलमास / पुरुषोत्तम मास)

हिंदू कैलेंडर में हर तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जुड़ता है, जिसे अधिक मास या ‘पुरुषोत्तम मास’ कहा जाता है। यह पूरा महीना भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस महीने में किए गए किसी भी धार्मिक कार्य (दान, स्नान, तप) का फल 10 गुना अधिक मिलता है।

नोट: यदि आप पहली बार गोवर्धन परिक्रमा की योजना बना रहे हैं, तो इनमें से किसी भी अवसर को चुन सकते हैं। हालांकि, इन विशेष दिनों में भारी भीड़ (Lakhs of Devotees) होती है। यदि आप शांत वातावरण में परिक्रमा का आध्यात्मिक आनंद लेना चाहते हैं, तो किसी भी सामान्य दिन (विशेषकर मंगलवार या शनिवार) को भी गिरिराज महाराज का स्मरण कर यह पावन यात्रा शुरू कर सकते हैं। भाव सच्चा हो, तो हर दिन शुभ है।

कथा1: गोवर्धन पर्वत के ब्रज में आने और श्रापकी कथा (सतयुग की घटना)

गोवर्धन पर्वत हमेशा से ब्रज में नहीं था। इसके ब्रज भूमि में स्थापित होने और इसके लगातार घटने के पीछे सतयुग की एक अत्यंत रोचक कथा है:

सतयुग के समय में पर्वतों में उड़ने और अपना आकार बदलने की दिव्य शक्ति होती थी। उस समय द्रोणाचल पर्वत के पुत्र गोवर्धन हिमालय में स्थित थे, जो अत्यंत सुंदर, हरे-भरे और पवित्र थे।

एक दिन महान सप्तऋषि पुलस्त्य हिमालय पहुंचे। उन्होंने गोवर्धन पर्वत की अलौकिक शोभा देखी और अत्यंत मुग्ध हो गए। उन्होंने गोवर्धन को अपने साथ काशी ले जाकर वहां तपस्या करने का संकल्प किया। ऋषि पुलस्त्य ने द्रोणाचल से अनुमति ली और गोवर्धन से अपने साथ चलने को कहा।

गोवर्धन ने ऋषि से कहा- हे मुनिवर! मैं आपके साथ अवश्य चलूंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है। रास्ते में आप जहां भी मुझे पहली बार भूमि पर रख देंगे, मैं वहीं स्थिर हो जाऊंगा और फिर वहां से नहीं उठूंगा।”

ऋषि पुलस्त्य ने यह शर्त मान ली और अपने तपोबल से गोवर्धन को अपनी हथेली पर रखकर यात्रा आरंभ की।

जब ऋषि ब्रजभूमि (मथुरा) के ऊपर से गुजरे, तो गोवर्धन को यह भूमि अत्यंत प्रिय लगी, क्योंकि वे जानते थे कि भविष्य (द्वापर युग) में यह भगवान श्रीकृष्ण की लीलाभूमि बनने वाली है। गोवर्धन ने अपनी माया से ऋषि पुलस्त्य को मूत्रत्याग (शौच) की तीव्र इच्छा उत्पन्न कर दी। विवश होकर ऋषि ने गोवर्धन को भूमि पर रख दिया।

जब ऋषि निवृत्त होकर लौटे और गोवर्धन को उठाने का प्रयास किया, तो पर्वत अपनी शर्त के अनुसार वहीं अचल (स्थिर) हो गया। लाख कोशिशों के बाद भी जब गोवर्धन नहीं उठे, तो क्रोधित होकर पुलस्त्य ऋषि ने उन्हें श्राप दे दिया—

तुमने मेरे साथ छल किया है, इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम्हारा आकार प्रतिदिन एक राई के दाने‘ (Mustard seed) के बराबर घटता जाएगा।”

ऐसी मान्यता है कि पुलस्त्य ऋषि के इसी श्राप के कारण गोवर्धन पर्वत का आकार लगातार घट रहा है। यह कथा दर्शाती है कि भगवान की लीला पहले से ही रची हुई थी और गोवर्धन स्वयं भगवान कृष्ण की लीला का हिस्सा बनने के लिए ब्रज में रुके थे।

भगवान श्रीकृष्ण, गिरिराज गोवर्धन पर्वत

कथा2: भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन धारण और इंद्र का मान-मर्दन (द्वापर युग)

सतयुग के बाद जब द्वापर युग आया, तब गोवर्धन पर्वत बहुत विशाल और ऊंचा हुआ करता था।

गोवर्धन पूजा और इसकी परिक्रमा की शुरुआत द्वापर युग में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने की थी। इसकी कथा श्रीमद्भागवत पुराण में इस प्रकार है:

प्राचीन काल में ब्रजवासी हर साल बारिश और अच्छी फसल के लिए देवराज इंद्र की भव्य पूजा किया करते थे। बाल कृष्ण ने जब यह देखा, तो उन्होंने अपने पिता नंदबाबा और ब्रजवासियों को समझाया कि इंद्र तो केवल अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। हमें पूजा उस गोवर्धन पर्वत की करनी चाहिए जो हमारी गायों को घास और हमें शुद्ध जल व औषधियां प्रदान करता है।

कृष्ण की बात मानकर सभी ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा बंद कर दी और छप्पन भोग बनाकर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। स्वयं श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत के भीतर प्रवेश कर ब्रजवासियों का भोग ग्रहण किया।

इंद्र का क्रोध और गोवर्धन धारण: अपनी पूजा बंद होने से देवराज इंद्र अत्यंत क्रोधित हो गए। अपने अहंकार में उन्होंने ब्रज को डुबाने के लिए ‘सांवर्तक’ नामक भयंकर बादलों को मूसलाधार बारिश करने का आदेश दिया। पूरे ब्रज में हाहाकार मच गया।

तब अपने भक्तों की रक्षा के लिए भगवान श्री कृष्ण ने अपनी हाथ की सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठा) पर पूरे विशाल गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। लगातार 7 दिनों तक ब्रजवासी पर्वत के नीचे सुरक्षित रहे। अंततः इंद्र का अहंकार टूट गया। उन्होंने धरती पर आकर श्री कृष्ण से क्षमा मांगी और कामधेनु गाय के दूध से श्री कृष्ण का अभिषेक किया, जिसके बाद कृष्ण ‘गोविंद’ कहलाए। तभी से गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा की परंपरा शुरू हुई।

गोवर्धन परिक्रमा का धार्मिक महत्व

गिरिराज जी की परिक्रमा का फल चारों धाम की यात्रा से भी अधिक माना गया है:

  • साक्षात् श्री कृष्ण का स्वरूप: गोवर्धन पर्वत को स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का विग्रह (शरीर) माना जाता है। इसकी परिक्रमा करना साक्षात् श्रीकृष्ण की परिक्रमा करने के समान फलदायी होता है।
  • पापों का नाश: यह दृढ़ मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ परिक्रमा करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • मनोकामना पूर्ति: भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति, सुख-शांति, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के लिए यह परिक्रमा करते हैं।
  • भक्ति का प्रदर्शन: यह भक्तों के समर्पण, धैर्य और प्रेम की अभिव्यक्ति है, विशेषकर दंडवत परिक्रमा करने वाले भक्तों का समर्पण अनूठा होता है।
  • आत्मिक शुद्धि: यात्रा के दौरान ‘राधे-राधे’ या ‘गोवर्धन नाथ की जय’ का जाप करने और सांसारिक बातों से बचने से आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

परिक्रमा के प्रकार और पूजा विधि

भक्त अपनी श्रद्धा और शारीरिक क्षमता के अनुसार कई प्रकार से परिक्रमा करते हैं:

  1. पैदल परिक्रमा: यह सबसे सामान्य तरीका है, जिसमें भक्त नंगे पैर चलते हुए ‘राधे-राधे’ का जाप करते हुए परिक्रमा पूरी करते हैं।
  2. दूध की धार की परिक्रमा: इसमें श्रद्धालु एक बर्तन में दूध और जल मिलाकर रखते हैं, जिसके तल में एक छोटा छेद होता है। वे लगातार दूध की धार गिराते हुए परिक्रमा करते हैं।
  3. दंडवत परिक्रमा: यह सबसे कठिन परिक्रमा है। इसमें भक्त जमीन पर लेटकर (प्रणाम की मुद्रा में) अपनी जगह नापते हैं और फिर आगे बढ़ते हैं।

पूजा कैसे शुरू करें?

  • परिक्रमा शुरू करने से पहले मानसी गंगा में स्नान करें या उसका जल मस्तक पर लगाएं।
  • इसके बाद दानघाटी मंदिर में गिरिराज महाराज के दर्शन करें, उन्हें दूध अर्पित करें और परिक्रमा का संकल्प लें।

परिक्रमा के मुख्य नियम और मान्यताएं (क्या करें, क्या न करें)

परिक्रमा का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए कुछ कठोर नियमों का पालन आवश्यक है:

  • पर्वत को दाईं ओर रखें: परिक्रमा हमेशा ‘प्रदक्षिणा’ रूप में होती है। चलते समय गोवर्धन पर्वत हमेशा आपके दाहिने हाथ (Right side) की तरफ होना चाहिए।
  • बीच में न छोड़ें: एक बार परिक्रमा का संकल्प ले लिया, तो उसे उसी दिन (या तय समय में) पूरा करना अनिवार्य है।
  • नंगे पैर परिक्रमा: गोवर्धन की भूमि अत्यंत पवित्र है, इसलिए परिक्रमा नंगे पैर ही करनी चाहिए। चमड़े की कोई भी वस्तु (बेल्ट, पर्स) साथ न रखें।
  • पर्वत के ऊपर न चढ़ें: गोवर्धन पर्वत साक्षात श्री कृष्ण का स्वरूप है, इसलिए इसके ऊपर चढ़ना या पैर रखना महापाप माना जाता है।

निष्कर्ष

गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि जीव का परमात्मा से मिलन का मार्ग है। भले ही पुलस्त्य ऋषि के श्राप के कारण गिरिराज जी का आकार आज एक छोटी पहाड़ी जैसा रह गया हो, लेकिन उनकी आध्यात्मिक महिमा और भक्तों के प्रति उनकी कृपा आज भी हिमालय से भी ऊंची है। जब एक भक्त अटूट विश्वास के साथ ब्रज की उस पवित्र रज पर चलता है, तो वह सीधे भगवान श्रीकृष्ण की उस अलौकिक लीला से जुड़ जाता है, जो युगों पहले रची गई थी।

|| जय श्री राधे! जय गिरिराज महाराज ||

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