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गोवर्धन पूजा और अन्नकूट: प्रकृति प्रेम, गोमाता की सेवा और श्रीकृष्ण की लीला का महापर्व

गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) मंगलवार, 10 नवम्बर 2026 को मनाई जाएगी।

गोवर्धन पूजा प्रातःकाल मुहूर्त: प्रातः 06:40 बजे से 08:50 बजे तक

अवधि: 02 घंटे 10 मिनट

प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ: 9 नवम्बर 2026 को दोपहर 12:31 बजे

प्रतिपदा तिथि समाप्त: 10 नवम्बर 2026 को दोपहर 02:00 बजे

दीपावली के भव्य प्रकाशोत्सव के ठीक अगले दिन भारतीय संस्कृति में एक अत्यंत अनूठा और प्रकृति को समर्पित त्योहार मनाया जाता है, जिसे गोवर्धन पूजा’ (Govardhan Puja) या अन्नकूट’ (Annakut) के नाम से जाना जाता है।

हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहले दिन) को मनाया जाता है। यह सनातन धर्म का शायद एकमात्र ऐसा त्योहार है जहाँ किसी मूर्ति या तस्वीर की नहीं, बल्कि प्रकृति (पर्वत), पर्यावरण और पशुधन (गायों) की प्रत्यक्ष रूप से पूजा की जाती है। आइए, इस पावन पर्व के अर्थ, अन्नकूट के गहरे महत्व, भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र का मान मर्दन करने वाली पौराणिक कथा और इससे जुड़ी विशेष मान्यताओं को विस्तार से समझते हैं।

गोवर्धन पूजा पर भगवान श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत धारण करते हुए, अन्नकूट प्रसाद और भक्तों द्वारा पूजा-अर्चना का दिव्य दृश्य

गोवर्धन पूजा और ‘अन्नकूट’ क्या है?

इस त्योहार के दो प्रमुख नाम हैं और दोनों का अपना विशिष्ट अर्थ है:

  • गोवर्धन (Govardhan): यह दो शब्दों से बना है- ‘गो’ (अर्थात् गाय या इंद्रियां) और ‘वर्धन’ (अर्थात् बढ़ाना या पोषण करना)। गोवर्धन का अर्थ है वह जो गायों का पोषण करे और हमारी इंद्रियों को ईश्वरीय आनंद की ओर बढ़ाए।
  • अन्नकूट (Annakut): ‘अन्न’ का अर्थ है अनाज या भोजन, और ‘कूट’ का अर्थ है पहाड़ (Mountain)। भगवान को कृतज्ञता स्वरूप विभिन्न प्रकार के पकवानों, अनाजों और सब्जियों का एक विशाल पहाड़ जैसा ढेर बनाकर अर्पण किया जाता है, इसलिए इसे ‘अन्नकूट’ कहा जाता है।

गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा (इंद्र का मान मर्दन)

गोवर्धन पूजा की शुरुआत द्वापर युग में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने की थी। इसकी अत्यंत रोचक कथा इस प्रकार है:

एक बार बाल कृष्ण ने देखा कि वृंदावन और गोकुल के सभी निवासी तरह-तरह के पकवान बना रहे हैं और एक बड़े यज्ञ की तैयारी में जुटे हैं। कृष्ण ने अपनी माता यशोदा और पिता नंदबाबा से पूछा कि यह कैसी तैयारी हो रही है?

नंदबाबा ने बताया कि वे सभी बादलों और वर्षा के देवता इंद्र की पूजा करने जा रहे हैं। यदि इंद्र प्रसन्न होंगे तो अच्छी बारिश होगी, जिससे गायों के लिए चारा उगेगा और खेती अच्छी होगी।

बाल कृष्ण ने तर्क दिया- पिताजी! इंद्र तो केवल अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। हमें वास्तव में उस गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, जहाँ हमारी गाएं चरती हैं, जो हमें फल, फूल और औषधियां देता है। इंद्र की पूजा से हमें क्या लाभ?” कृष्ण के तर्कों से सहमत होकर सभी ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा रोक दी और 56 प्रकार के पकवान बनाकर ‘गोवर्धन पर्वत’ की पूजा करने लगे।

इंद्र का क्रोध और श्रीकृष्ण का चमत्कार: जब देवराज इंद्र ने देखा कि उनकी पूजा रोककर एक साधारण पर्वत की पूजा हो रही है, तो उनका अहंकार आहत हो गया। क्रोध में आकर इंद्र ने ‘संवर्तक’ नामक प्रलयंकारी बादलों को ब्रज पर मूसलाधार बारिश करने का आदेश दिया। भयंकर आंधी-तूफान और बाढ़ से पूरे ब्रजमंडल में हाहाकार मच गया।

तब ब्रजवासियों की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपने वामहस्त (बाएं हाथ) की सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठा) पर विशाल गोवर्धन पर्वत को एक छाते की तरह उठा लिया। सभी ब्रजवासी और गाएं उस पर्वत के नीचे आ गए।

लगातार सात दिनों तक भयंकर वर्षा होती रही, लेकिन ब्रजवासियों का बाल भी बांका नहीं हुआ। अंततः इंद्र को अपनी भूल का अहसास हुआ और उनका अहंकार टूट गया। इंद्र ने पृथ्वी पर आकर भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी। उसी दिन से कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को ‘गोवर्धन पूजा’ और ‘अन्नकूट’ का उत्सव मनाने की परंपरा शुरू हो गई।

 

 गोवर्धन पूजा का धार्मिक और पर्यावरणीय महत्व

गोवर्धन पूजा केवल एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह मानव और प्रकृति के बीच के गहरे रिश्ते को दर्शाता है:

  • प्रकृति का संरक्षण: भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पूजा के माध्यम से समाज को यह संदेश दिया कि जो प्रकृति (पर्वत, पेड़-पौधे, नदियां) हमें जीवन और भोजन देती है, हमें उसकी रक्षा और वंदना करनी चाहिए।
  • अहंकार का नाश: यह पर्व सिखाता है कि पद या शक्ति का अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो (जैसे देवराज इंद्र का अहंकार), वह ईश्वर के सामने टिक नहीं सकता।
  • पशुधन (गायों) का महत्व: भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था में गायों का असीम योगदान है। यह दिन गोमाता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनकी सेवा करने का दिन है।
  • सामाजिक समरसता: अन्नकूट के प्रसाद में सभी प्रकार की सब्जियां और अनाज मिलाकर बनाए जाते हैं, जो समाज में एकता और समानता का प्रतीक है।

गोवर्धन पूजा की प्रमुख मान्यताएं और पूजा विधि

इस दिन पूरे देश में, विशेषकर ब्रजभूमि (मथुरा, वृंदावन, गोकुल) में, यह पर्व अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इसकी प्रमुख परंपराएं इस प्रकार हैं:

  • गोबर का पर्वत: इस दिन सुबह घर के आंगन या मुख्य द्वार पर गाय के गोबर से लेटे हुए पुरुष के आकार में गोवर्धन पर्वत बनाया जाता है। इसे फूलों और रंगों से सजाया जाता है।
  • परिक्रमा: पूजा के बाद सभी लोग इस गोबर के गोवर्धन की 7 बार परिक्रमा करते हैं। परिक्रमा करते समय लोटे से जल गिराते हुए और जौ (barley) बोते हुए चलते हैं।
  • अन्नकूट और 56 भोग:
    • मान्यता है कि कृष्ण ने 7 दिन तक पर्वत को उंगली पर उठाए रखा और कुछ नहीं खाया। वे दिन में 8 बार भोजन करते थे। इसलिए, ब्रजवासियों ने 7 दिनों के हिसाब से (8 पहर × 7 दिन = 56) 56 प्रकार के व्यंजन (56 Bhog) बनाकर उन्हें खिलाए।
    • आज भी मंदिरों और घरों में ‘अन्नकूट’ की सब्जी (मिक्स वेज) और पूरी-कचौड़ी का भोग लगाया जाता है।
  • विश्वकर्मा पूजा: भारत के कई हिस्सों में इस दिन औजारों, मशीनों और बही-खातों की पूजा भी की जाती है (विशेषकर कारीगर और शिल्पकार वर्ग द्वारा)।

 निष्कर्ष

गोवर्धन पूजा केवल एक ऐतिहासिक घटना की याद नहीं है, बल्कि यह आज के आधुनिक युग के लिए एक बहुत बड़ा सबक है। जब हम जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल बना रहे हैं, तब गोवर्धन पूजा हमें याद दिलाती है कि मनुष्य का अस्तित्व प्रकृति के बिना संभव नहीं है। भगवान ‘गिरधर’ (पर्वत को धारण करने वाले) हमें यह सिखाते हैं कि जब समाज का हर व्यक्ति (ब्रजवासियों की लाठियों की तरह) एक साथ मिलकर सहयोग करता है, तो बड़े से बड़े प्राकृतिक संकट और अहंकार रूपी तूफानों का सामना आसानी से किया जा सकता है।

|| हरे कृष्ण ||

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