दीपावली 2026: कब है, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त, पूजा विधि, शुभ समय और महत्व
दीपावली (लक्ष्मी पूजा) रविवार, 8 नवम्बर 2026 को मनाई जाएगी।
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त: सायं 05:54 बजे से 07:50 बजे तक
अवधि: 01 घंटा 56 मिनट
प्रदोष काल मुहूर्त: सायं 05:31 बजे से रात्रि 08:09 बजे तक
वृषभ काल मुहूर्त: सायं 05:54 बजे से 07:50 बजे तक
अमावस्या तिथि प्रारम्भ: 8 नवम्बर 2026 को प्रातः 11:27 बजे से
अमावस्या तिथि समाप्त: 9 नवम्बर 2026 को दोपहर 12:31 बजे तक
दीपावली (दिवाली) 5 दिवसीय महोत्सव का मुख्य और तीसरा दिन है। यह हिंदुओं का सबसे बड़ा और प्रमुख त्योहार है। इसे प्रकाश का पर्व (Festival of Lights) कहा जाता है।
यह पर्व कार्तिक मास की अमावस्या (साल की सबसे काली रात) को मनाया जाता है। अंधेरी रात होने के बावजूद, करोड़ों दीयों की रोशनी से यह रात सबसे ज्यादा जगमगाती है। इस दिन शाम को (प्रदोष काल और स्थिर लग्न में) धन की देवी माँ लक्ष्मी और बुद्धि के देवता भगवान गणेश की विशेष पूजा की जाती है।
यहाँ दीपावली और लक्ष्मी पूजन की विस्तृत जानकारी, कथा, महत्व और मान्यताओं का विवरण दिया गया है:
दीपावली की पौराणिक कथाएं
दीपावली मनाने के पीछे कई ऐतिहासिक और पौराणिक घटनाएं जुड़ी हुई हैं, जिनमें से दो सबसे प्रमुख हैं:
- भगवान श्री राम की अयोध्या वापसी की कथा
दीपावली मनाने का सबसे प्रमुख कारण मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम से जुड़ा है। रामायण के अनुसार, जब भगवान श्री राम ने लंकापति रावण (जो बुराई का प्रतीक था) का वध किया और अपना 14 वर्ष का वनवास पूरा किया, तो वे माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वापस अपनी नगरी ‘अयोध्या‘ लौटे।
भगवान राम के अयोध्या आगमन का दिन कार्तिक मास की अमावस्या का दिन था। अपने प्रिय राजा के 14 साल बाद लौटने की खुशी में पूरे अयोध्यावासियों ने घी के दीये जलाकर उनका भव्य स्वागत किया था। उसी दिन से हर साल बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी में दीपावली मनाई जाने लगी।
- समुद्र मंथन और माता लक्ष्मी का प्राकट्य
दीपावली के दिन माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष कारण ‘समुद्र मंथन’ से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवों और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक अमावस्या के दिन ही धन और ऐश्वर्य की देवी ‘माता लक्ष्मी‘ क्षीरसागर से प्रकट हुई थीं। इसी दिन उनका विवाह भगवान श्रीहरि विष्णु के साथ संपन्न हुआ था। इसलिए इस रात माता लक्ष्मी का स्वागत करने के लिए घर-घर में दीप जलाए जाते हैं।
दीपावली का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
दीपावली केवल दीये जलाने और मिठाइयां बांटने का त्योहार नहीं है; इसका दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व बहुत गहरा है:
- अंतर्मन के अंधकार का नाश: बाहर जलने वाले दीये वास्तव में इस बात का प्रतीक हैं कि हमें अपने भीतर के अज्ञान, क्रोध, ईर्ष्या और लालच रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान और प्रेम का प्रकाश फैलाना है।
- धन, ऐश्वर्य और शांति: इस दिन धन और वैभव की देवी माता लक्ष्मी और बुद्धि के देवता भगवान श्री गणेश की एक साथ पूजा की जाती है। इसका संदेश यह है कि धन (लक्ष्मी) तभी फलदायी होता है जब उसके साथ सद्बुद्धि (गणेश) हो।
- अंधकार पर प्रकाश की विजय: दीपावली का मुख्य संदेश है- “तमसो मा ज्योतिर्गमय” (अंधकार से प्रकाश की ओर)। यह अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान रूपी प्रकाश फैलाने का प्रतीक है।
- बुराई पर अच्छाई की जीत: यह पर्व हमें याद दिलाता है कि बुराई (रावण) कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, जीत हमेशा अच्छाई (राम) की ही होती है।
- व्यापारिक नववर्ष: गुजरात और कई अन्य व्यापारिक समुदायों में दीपावली से ही नए साल की शुरुआत मानी जाती है। इस दिन पुराने बही-खाते बंद करके नए खाते (Chopda Pujan) शुरू किए जाते हैं।
प्रमुख मान्यताएँ और परंपराएँ (Rituals & Beliefs)
- गणेश-लक्ष्मी का साथ पूजन: अक्सर लोग सोचते हैं कि लक्ष्मी जी के साथ विष्णु जी की पूजा होनी चाहिए, लेकिन दिवाली पर गणेश जी पूजे जाते हैं।
- मान्यता: लक्ष्मी (धन) को संभालने के लिए गणेश (बुद्धि/विवेक) की आवश्यकता होती है। बिना बुद्धि के आया हुआ धन विनाश का कारण बन सकता है। इसलिए, धन के साथ सद्बुद्धि मांगने के लिए दोनों की साथ पूजा होती है।
- घर के द्वार खुले रखना: मान्यता है कि दिवाली की रात माँ लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं। जो घर साफ-सुथरा होता है और जहाँ रोशनी होती है, वे वहीं निवास करती हैं। इसलिए लोग पूरी रात घर के मुख्य द्वार खुले रखते हैं और दीये जलाते हैं।
- सफाई और सफेदी: दिवाली से पहले घरों की रंगाई-पुताई और सफाई की जाती है क्योंकि माँ लक्ष्मी को गंदगी पसंद नहीं है। स्वच्छता में ही ईश्वर का वास होता है।
- दीये जलाना: मिट्टी के दीये जलाना शुभ माना जाता है। यह शरीर (मिट्टी का दीया) और आत्मा (ज्योत) के संबंध को भी दर्शाता है।
- पटाखे: हालांकि यह मूल परंपरा का हिस्सा नहीं था, लेकिन खुशी जाहिर करने के लिए आतिशबाजी को इस त्योहार से जोड़ दिया गया है।
दीपावली पूजन की सरल और संपूर्ण विधि:
दीपावली पर महालक्ष्मी पूजन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पूजा प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) और स्थिर लग्न में की जाती है ताकि माँ लक्ष्मी आपके घर में स्थायी रूप से निवास करें।
- पूजन सामग्री (List of Items)
- मूर्तियां: भगवान गणेश, माँ लक्ष्मी (कमल पर बैठी हुईं), माँ सरस्वती और कुबेर जी की तस्वीर या मूर्ति।
- स्थापना के लिए: लकड़ी की चौकी, लाल और पीला कपड़ा।
- पूजा के लिए: रोली, कुमकुम, चावल (अक्षत), हल्दी, चंदन, सिंदूर, केसर, पान, सुपारी, लौंग, इलायची।
- फूल: गेंदा, गुलाब और विशेष रूप से कमल का फूल (माँ लक्ष्मी को अति प्रिय)।
- भोग: खील-बताशे (दीपावली का मुख्य प्रसाद), मिठाई, फल, मेवे।
- अन्य: कलश (तांबे या पीतल का), नारियल, आम के पत्ते, गंगाजल, घी का दीपक, अगरबत्ती, कपूर।
- विशेष: चाँदी का सिक्का (यदि हो), बही-खाते (कलम/डायरी), कुछ नकद रुपए।
- पूजा की तैयारी और स्थापना (Preparation)
- दिशा: पूजा करते समय आपका मुख पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर होना चाहिए।
- चौकी सजाना: एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं।
- मूर्ति स्थापना: चौकी पर बीच में चावल की एक ढेरी बनाएं और उस पर माँ लक्ष्मी और गणेश जी को स्थापित करें। (ध्यान रहे: देखते समय गणेश जी बायीं तरफ और लक्ष्मी जी दाहिनी तरफ होनी चाहिए)।
- कलश स्थापना: मूर्तियों के पास चावल की ढेरी पर तांबे का कलश रखें। उसमें जल, एक सिक्का, सुपारी और आम के पत्ते डालें। उसके ऊपर नारियल रखें।
- पूजा विधि (Step-by-Step Ritual)
चरण 1: पवित्रीकरण और संकल्प
- सबसे पहले अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर गंगाजल छिड़कें।
- हाथ में थोड़ा जल और चावल लेकर संकल्प लें: “मैं (अपना नाम) आज दीपावली के शुभ अवसर पर अपने परिवार के सुख-समृद्धि के लिए गणेश-लक्ष्मी पूजन कर रहा/रही हूँ।” जल जमीन पर छोड़ दें।
चरण 2: भगवान गणेश पूजन
- हर पूजा में सबसे पहले गणेश जी पूजे जाते हैं।
- उन्हें स्नान (जल छिड़कें) कराएं।
- रोली का तिलक लगाएं, अक्षत (चावल), फूल और दूर्वा (घास) चढ़ाएं।
- उन्हें लड्डू या मिठाई का भोग लगाएं।
- मंत्र: “ॐ गं गणपतये नमः”
चरण 3: महालक्ष्मी पूजन (मुख्य पूजा)
- अब माँ लक्ष्मी का आवाहन करें।
- उन्हें जल, दूध या पंचामृत से स्नान कराएं (सांकेतिक रूप से)।
- उन्हें हल्दी, कुमकुम और सिंदूर लगाएं।
- कमल का फूल अर्पित करें (यह सबसे शुभ है)।
- इत्र, वस्त्र (मौली) और आभूषण अर्पित करें।
- खील-बताशे और मिठाई का भोग लगाएं।
- मंत्र: “ॐ महालक्ष्म्यै नमः”
चरण 4: कुबेर, सरस्वती और लेखनी पूजन
- धन के देवता कुबेर और विद्या की देवी सरस्वती को तिलक लगाएं और फूल चढ़ाएं।
- अगर आप व्यापारी हैं, तो अपनी बही-खातों (Account Books) और पेन (Pen) की पूजा करें। विद्यार्थी अपनी किताबों की पूजा करें।
- एक थाली में चांदी के सिक्के या कुछ रुपए रखकर उनकी पूजा करें (इसे धन का प्रतीक माना जाता है)।
चरण 5: दीप मालिका पूजन
- अब एक बड़ा घी का दीपक (जो पूरी रात जल सके) और 5, 7 या 11 छोटे तेल के दीये जलाएं।
- इन दीयों को थाली में रखकर रोली-चावल से पूजें।
- मुख्य दीपक को माँ लक्ष्मी के पास रखें और बाकी दीयों को घर के अलग-अलग हिस्सों (तुलसी, रसोई, मुख्य द्वार) में रख दें।
- आरती और क्षमा प्रार्थना
- अंत में परिवार के सभी सदस्य मिलकर खड़े हों।
- पहले गणेश जी की आरती (“जय गणेश जय गणेश…”) गाएं।
- फिर माँ लक्ष्मी की आरती (“ॐ जय लक्ष्मी माता…”) गाएं।
- आरती के बाद हाथ जोड़कर पूजा में हुई किसी भी गलती के लिए क्षमा मांगें— “हे माँ, हम अज्ञानी हैं, हमारी पूजा स्वीकार करें और हम पर कृपा करें।”
सुझाव: पूजा के बाद घर के हर कोने में दीये जलाएं और मुख्य द्वार को खुला रखें।
निष्कर्ष
दीपावली केवल आतिशबाजी या दिखावे का पर्व नहीं है, यह मन के मिलन और समाज में प्रेम बांटने का उत्सव है। दीये की लौ हमेशा ऊपर की ओर उठती है, जो हमें यह सिखाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां आएं, हमें हमेशा अपनी सोच और कर्मों को ऊँचा रखना चाहिए। आइए, इस दीपावली न केवल अपने घरों को रोशन करें, बल्कि किसी गरीब और जरूरतमंद के जीवन में भी खुशियों का दीप जलाकर इस पर्व की सार्थकता को सिद्ध करें।
|| जय श्री गणेश ||
|| जय माँ लक्ष्मी ||
